सुमिरन कामाख्या करुँ,
सकल सिद्धि की खानि।
होइ प्रसन्न सत करहु माँ,
जो मैं कहौं बखानि॥
मैं कामाख्या का स्मरण करता हूँ, जो सब सिद्धियों की खान हैं। हे माँ, प्रसन्न होकर इसे सत्य कीजिए जो मैं बखान कर रहा हूँ।
1जै जै कामाख्या महारानी।
दात्री सब सुख सिद्धि भवानी॥
हे कामाख्या महारानी, आपकी जय हो, जय हो; हे भवानी, आप सब सुख और सिद्धि देने वाली हैं।
2कामरुप है वास तुम्हारो।
जहँ ते मन नहिं टरत है टारो॥
कामरूप में आपका वास है — जहाँ से मन हटाए नहीं हटता।
3ऊँचे गिरि पर करहुँ निवासा।
पुरवहु सदा भगत मन आसा॥
आप ऊँचे पर्वत पर निवास करती हैं और भक्तों के मन की आस सदा पूरी करती हैं।
4ऋद्धि सिद्धि तुरतै मिलि जाई।
जो जन ध्यान धरै मनलाई॥
जो जन मन लगाकर ध्यान धरता है, उसे ऋद्धि और सिद्धि तुरंत मिल जाती हैं।
5जो देवी का दर्शन चाहे।
हृदय बीच याही अवगाहे॥
जो देवी का दर्शन चाहे, वह पहले हृदय में इसी का मनन करे —
6प्रेम सहित पंडित बुलवावे।
शुभ मुहूर्त निश्चित विचारवे॥
प्रेम सहित पंडित को बुलवाए और शुभ मुहूर्त निश्चित करवाए।
7अपने गुरु से आज्ञा लेकर।
यात्रा विधान करे निश्चय धर॥
अपने गुरु से आज्ञा लेकर, निश्चय धरकर यात्रा का विधान करे।
8पूजन गौरि गणेश करावे।
नान्दीमुख भी श्राद्ध जिमावे॥
गौरी और गणेश का पूजन करवाए, और नांदीमुख श्राद्ध में भी भोजन करवाए।
9शुक्र को बाँयें व पाछे कर।
गुरु अरु शुक्र उचित रहने पर॥
शुक्र को बाएँ और पीछे रखकर, जब गुरु और शुक्र उचित स्थिति में हों —
10जब सब ग्रह होवें अनुकूला।
गुरु पितु मातु आदि सब हूला॥
जब सब ग्रह अनुकूल हों, और गुरु, पिता, माता आदि सब प्रसन्न हों —
11नौ ब्राह्मण बुलवाय जिमावे।
आशीर्वाद जब उनसे पावे॥
नौ ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन करवाए, और जब उनसे आशीर्वाद पाए —
12सबहिं प्रकार शकुन शुभ होई।
यात्रा तबहिं करे सुख होई॥
जब हर प्रकार के शकुन शुभ हों, तभी यात्रा करे — तो सुख होता है।
13जो चह सिद्धि करन कछु भाई।
मंत्र लेइ देवी कहँ जाई॥
हे भाई, जो कोई सिद्धि पाना चाहे, वह मंत्र लेकर देवी के पास जाए।
14आदर पूर्वक गुरु बुलावे।
मन्त्र लेन हित दिन ठहरावे॥
आदरपूर्वक गुरु को बुलाए और मंत्र लेने के लिए दिन निश्चित करे।
15शुभ मुहूर्त में दीक्षा लेवे।
प्रसन्न होई दक्षिणा देवै॥
शुभ मुहूर्त में दीक्षा ले, और प्रसन्न होकर दक्षिणा दे।
16ॐ का नमः करे उच्चारण।
मातृका न्यास करे सिर धारण॥
ॐ और नमः का उच्चारण करे; मातृका-न्यास को सिर पर धारण करे।
17षडङ्ग न्यास करे सो भाई।
माँ कामाक्षा धर उर लाई॥
हे भाई, षडंग-न्यास करे और माँ कामाख्या को हृदय में धरे।
18देवी मन्त्र करे मन सुमिरन।
सन्मुख मुद्रा करे प्रदर्शन॥
देवी-मंत्र का मन में स्मरण करे और सामने मुद्रा का प्रदर्शन करे —
19जिससे होई प्रसन्न भवानी।
मन चाहत वर देवे आनी॥
जिससे भवानी प्रसन्न होती हैं और मनचाहा वर लाकर देती हैं।
20जबहिं भगत दीक्षित होइ जाई।
दान देय ऋत्विज कहँ जाई॥
जब भक्त दीक्षित हो जाए, तब ऋत्विजों (पुरोहितों) के पास जाकर दान दे।
21विप्रबंधु भोजन करवावे।
विप्र नारि कन्या जिमवावे॥
ब्राह्मण-बंधुओं को भोजन करवाए, ब्राह्मण-स्त्रियों और कन्याओं को भी जिमाए।
22दीन अनाथ दरिद्र बुलावे।
धन की कृपणता नहीं दिखावे॥
दीन, अनाथ और दरिद्र को बुलाए — धन की कृपणता न दिखाए।
23एहि विधि समझ कृतारथ होवे।
गुरु मन्त्र नित जप कर सोवे॥
इस विधि से अपने को कृतार्थ समझे, और नित्य गुरु-मंत्र जपकर सोए।
24देवी चरण का बने पुजारी।
एहि ते धरम न है कोई भारी॥
वह देवी के चरणों का पुजारी बने — इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।
25सकल ऋद्धि – सिद्धि मिल जावे।
जो देवी का ध्यान लगावे॥
जो देवी का ध्यान लगाता है, उसे सब ऋद्धि-सिद्धि मिल जाती हैं।
26तू ही दुर्गा तू ही काली।
माँग में सोहे मातु के लाली॥
तू ही दुर्गा है, तू ही काली; माता की माँग में लाली शोभित है।
27वाक् सरस्वती विद्या गौरी।
मातु के सोहैं सिर पर मौरी॥
वाणी की सरस्वती, विद्या और गौरी तू ही है; माता के सिर पर मौर (मुकुट) शोभित है।
28क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा तृष्णा।
तन का रंग है मातु का कृष्णा॥
क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा और तृष्णा तू ही है; माता के तन का रंग कृष्ण (श्याम) है।
29कामधेनु सुभगा और सुन्दरी।
मातु अँगुलिया में है मुंदरी॥
कामधेनु, सुभगा और सुंदरी तू ही है; माता की अँगुली में मुँदरी है।
30कालरात्रि वेदगर्भा धीश्वरि।
कंठमाल माता ने ले धरि॥
कालरात्रि, वेदगर्भा और अधीश्वरी तू ही है; माता ने कंठ में माला धारण की है।
31तृषा सती एक वीरा अक्षरा।
देह तजी जानु रही नश्वरा॥
तृषा, सती, वीरा और अक्षरा तू ही है — जिसने नश्वर जानकर देह त्याग दी।
32स्वरा महा श्री चण्डी।
मातु न जाना जो रहे पाखण्डी॥
स्वरा, महाश्री और चंडी तू ही है; जो पाखंडी हैं, वे माता को नहीं जान पाए।
33महामारी भारती आर्या।
शिवजी की ओ रहीं भार्या॥
महामारी, भारती और आर्या तू ही है; तू ही शिवजी की भार्या है।
34पद्मा, कमला, लक्ष्मी, शिवा।
तेज मातु तन जैसे दिवा॥
पद्मा, कमला, लक्ष्मी और शिवा तू ही है; माता के तन का तेज दिन जैसा है।
35उमा, जयी, ब्राह्मी भाषा।
पुर हिं भगतन की अभिलाषा॥
उमा, जया और ब्राह्मी भाषा तू ही है; तू भक्तों की अभिलाषा पूरी करती है।
36रजस्वला जब रुप दिखावे।
देवता सकल पर्वतहिं जावें॥
जब माता रजस्वला रूप दिखाती हैं, तब सब देवता पर्वत पर चले जाते हैं।
37रुप गौरि धरि करहिं निवासा।
जब लग होइ न तेज प्रकाशा॥
वे गौरी का रूप धरकर वहाँ निवास करते हैं, जब तक (माता का) तेज फिर प्रकाशित नहीं होता।
38एहि ते सिद्ध पीठ कहलाई।
जउन चहै जन सो होई जाई॥
इसी से यह सिद्ध पीठ कहलाया — यहाँ जन जो चाहे, वही हो जाता है।
39जो जन यह चालीसा गावे।
सब सुख भोग देवि पद पावे॥
जो जन यह चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर देवी का पद पाता है।
40होहिं प्रसन्न महेश भवानी।
कृपा करहु निज – जन असवानी॥
महेश और भवानी प्रसन्न हों; हे माँ, अपने जनों पर कृपा कीजिए।
कहे गोपाल सुमिर मन,
कामाख्या सुख खानि।
जग हित माँ प्रगटत भई,
सके न कोऊ खानि॥
गोपाल कहता है — हे मन, सुख की खान कामाख्या का स्मरण कर; वे जगत के हित के लिए प्रकट हुईं, उनका पार कोई नहीं पा सकता।