समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
मंगलवार व शनिवार
उद्देश्य:शक्ति व साहस (Strength)रक्षा (Protection)संकट मोचन (Relief from Crisis)
✓ संपूर्ण मूल मंत्र
ॐ श्री हनुमते नमः हनुमान जी का मूल मंत्र है — उनकी उपासना का प्रधान मंत्र। इसका अर्थ है “श्री हनुमान को नमस्कार”। सरल उच्चारण और बिना किसी विशेष विधान की आवश्यकता के कारण यह दैनिक हनुमान उपासना का सबसे सुलभ मंत्र माना जाता है। मंगलवार व शनिवार इसके जप के लिए विशेष हैं।
FAQ
ॐ श्री हनुमते नमः — सामान्य प्रश्न
"ॐ श्री हनुमते नमः॥" — यही हनुमान जी का मूल मंत्र है, अर्थात् उनकी उपासना का प्रधान मंत्र। इसका अर्थ है "श्री हनुमान को नमस्कार"।
"ॐ हं हनुमते नमः" बीज मंत्र है, जिसमें "हं" बीजाक्षर जुड़ा है। यह मूल मंत्र है, जिसमें बीजाक्षर के स्थान पर आदर-सूचक "श्री" आता है। दोनों अलग हैं और इस संग्रह में दोनों के अलग पृष्ठ हैं।
शुद्ध रूप "हनुमते" है। "हनुमत्" शब्द का चतुर्थी विभक्ति रूप "हनुमते" बनता है — "हनुमानाय" व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है।
परंपरा में कहा जाता है कि जिनके पास लंबे पाठ का समय न हो, वे इसी मूल मंत्र की एक माला (108 बार) से नित्य उपासना पूरी कर सकते हैं। हनुमान चालीसा स्तुति-रचना है, यह जप-मंत्र — दोनों की अपनी जगह है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष या तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या, विशेषतः मंगलवार है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए मंगलवार व शनिवार विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या, विशेषतः मंगलवार है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — मंगलवार व शनिवार को; प्रातः-संध्या नित्य पूजा में; हनुमान जयंती पर; भय, संकट या यात्रा-आरंभ के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह मूल मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
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