समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
मंगलवार व शनिवार
उद्देश्य:राम-भक्ति (Devotion)बुद्धि व वाणी (Knowledge)रक्षा (Protection)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं हनुमते रामदूताय नमः — यह हनुमान जी के रामदूत स्वरूप का साधना मंत्र है, जिसमें “ऐं” (वाग्-बीज) और “ह्रीं” (माया-बीज) जुड़े हैं। “रामदूत” सम्बोधन प्रमाणित है — मनोजवं श्लोक का चौथा चरण ही “श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये” है। एक विस्तृत रूप “श्री रामदूताय” सहित भी प्रचलित है।
FAQ
ॐ ऐं ह्रीं हनुमते रामदूताय नमः — सामान्य प्रश्न
यह पूरी तरह प्रमाणित है। "मनोजवं मारुततुल्यवेगम्" श्लोक — हनुमान स्तुति का सबसे प्रसिद्ध पद — उसका चौथा चरण ही है "श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये"। हनुमत्सहस्रनाम परंपरा में भी "हनुमते रामदूताय" विन्यास मिलता है।
"ऐं" वाग्-बीज है, जिसे वाणी व बुद्धि से जोड़ा जाता है; और "ह्रीं" माया-बीज है। बीज मंत्रों में शब्द-अर्थ नहीं, ध्वनि स्वयं शक्ति मानी जाती है।
एक रूप "ॐ ऐं ह्रीं हनुमते रामदूताय नमः" है और दूसरा "श्री" उपसर्ग सहित — "ॐ ऐं ह्रीं हनुमते श्री रामदूताय नमः"। दोनों प्रचलित हैं और अर्थ में भेद नहीं; इस पृष्ठ पर दोनों दिए गए हैं।
"रामदूत" सम्बोधन प्रमाणित है, पर यह बीजाक्षर-सहित मंत्र-रूप शास्त्रीय मंत्र-सूचियों में नहीं मिला — यह हनुमान साधना परंपरा का मंत्र है। इससे लंबा एक साधना मंत्र भी है, जिसका इस संग्रह में अलग पृष्ठ है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय मंगलवार प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए मंगलवार व शनिवार विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय मंगलवार प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — मंगलवार व शनिवार को; हनुमान जयंती व रामनवमी पर; सुंदरकांड के पाठ के साथ; किसी संदेश, वार्ता या यात्रा के आरंभ पर। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
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