वेद एक किताब नहीं, एक पुस्तकालय है
जब कोई कहता है "मैंने यजुर्वेद पढ़ा", तो असल में उसने किस ग्रंथ को पढ़ा? वाजसनेयी संहिता के चालीस अध्याय? सौ अध्यायों वाला शतपथ ब्राह्मण? या उसके अंत का बृहदारण्यक उपनिषद? हर वेद ग्रंथों का पूरा परिवार है, सदियों में बना हुआ, और उसमें एक के बाद एक परतें जुड़ती गईं। परंपरा और विद्वान, दोनों इन परतों को चार नामों से पहचानते हैं: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद।
इन चारों को समझने का एक सरल तरीका यह है कि इन्हें एक यात्रा की तरह देखें। पहले ऋषि देवताओं को मंत्रों से पुकारते हैं (संहिता)। फिर उन मंत्रों से बड़े-बड़े यज्ञ बनते हैं, और उनकी विधि और अर्थ समझाने वाले ग्रंथ लिखे जाते हैं (ब्राह्मण)। फिर यज्ञ के बाहरी कर्म से मन भीतर मुड़ता है, और उसके प्रतीकों पर ध्यान होता है (आरण्यक)। और अंत में प्रश्न उठता है कि यज्ञ करने वाला, यानी "मैं", स्वयं कौन है (उपनिषद)। बाहर से भीतर की ओर, कर्म से ज्ञान की ओर।
संहिता: मंत्रों का संग्रह
"संहिता" का अर्थ है जोड़ा हुआ, इकट्ठा किया हुआ। हर वेद की संहिता उसके मंत्रों का संग्रह है। ये मंत्र छंद में भी हो सकते हैं और गद्य में भी; ऋग्वेद पूरा छंद में है, जबकि यजुर्वेद में बहुत-से गद्य के सूत्र हैं, और अथर्ववेद का लगभग छठा भाग भी गद्य है। संहिता का पाठ स्वर के साथ होता है, और उसकी शुद्धता बचाने के लिए पद, क्रम, जटा और घन जैसे पाठ बने।
संहिता शब्द का दूसरा अर्थ भी है: वह पाठ जिसमें शब्द संधि के साथ जुड़कर बोले जाते हैं, जैसे "अग्निमीळे"। इसके उलट "पद पाठ" में हर शब्द अलग किया जाता है, "अग्निम् ईळे"। Macdonell बताते हैं कि ऋग्वेद का संहिता-पाठ ऋषियों के मूल उच्चारण से कई जगह अलग है, क्योंकि उसमें बाद के संधि-नियम लागू किए गए, पर उसके शब्द लगभग हमेशा वही हैं जो प्राचीन ऋषियों ने कहे थे।
ब्राह्मण: यज्ञ को समझाने वाला गद्य
संहिताओं के बाद एक बिल्कुल अलग तरह का साहित्य बना: ब्राह्मण। Macdonell के अनुसार इनकी दो पहचान हैं: रूप में ये गद्य हैं, और विषय में यज्ञ-कर्म। इनका काम यज्ञ का पूरा विवरण देना नहीं, बल्कि उन लोगों को यज्ञ का पवित्र अर्थ समझाना था जो यज्ञ पहले से जानते थे। इसीलिए वे कई बातें केवल संकेत में कहते हैं, या छोड़ देते हैं। ध्यान रहे, यहाँ "ब्राह्मण" एक ग्रंथ-प्रकार का नाम है, वर्ण का नहीं।
Macdonell ब्राह्मणों की सामग्री को तीन भागों में बाँटते हैं। पहला "विधि", यानी यज्ञ करने के व्यावहारिक निर्देश। दूसरा "अर्थवाद", यानी व्याख्या: किसी क्रिया का अर्थ, उससे जुड़ी कथा, या किसी दूसरे मत का खंडन। और तीसरा वह दार्शनिक चिंतन जो चीज़ों के स्वरूप पर है, और जिसे वे "उपनिषद" कहते हैं। यानी उपनिषद का बीज ब्राह्मणों के भीतर ही था।
अर्थवाद की कथाएँ भारतीय कथा-परंपरा की नींव बनीं। ऐतरेय ब्राह्मण में शुनःशेप की कथा है, शतपथ में मनु और मत्स्य की जल-प्रलय कथा, पुरूरवा और उर्वशी, और शकुंतला के पुत्र भरत; तैत्तिरीय ब्राह्मण में नचिकेता। Macdonell के अनुसार ब्राह्मणों में कुछ छंदबद्ध "गाथाएँ" भी हैं, जो आसपास के गद्य से पुरानी लगती हैं।
सब ब्राह्मण एक समय के नहीं। Macdonell भाषा के आधार पर एक मोटा क्रम देते हैं: यजुर्वेद की संहिताओं के गद्य के बाद पंचविंश और तैत्तिरीय सबसे पुराने हैं; फिर जैमिनीय, कौषीतकि और ऐतरेय; फिर शतपथ; और सबसे बाद में अथर्ववेद का गोपथ और सामवेद के छोटे ब्राह्मण। वे यह भी बताते हैं कि जो ब्राह्मण बचे हैं, उनमें बहुत-से ऐसे ब्राह्मणों के नाम और उद्धरण हैं जो आज नहीं मिलते, यानी इस साहित्य का बड़ा भाग खो गया।
आरण्यक: वन के ग्रंथ
"आरण्यक" का अर्थ है अरण्य, यानी वन, से जुड़ा। Macdonell बताते हैं कि ये ब्राह्मणों के अंत में आते हैं और उनका स्वभाव अधिक दार्शनिक है, और यही दोनों बातें बताती हैं कि ये बाद के हैं। इन्हें आमतौर पर ऐसे धर्मनिष्ठ लोगों के लिए बताया जाता है जो गृहस्थी छोड़कर वन में रहने लगे थे और अब यज्ञ नहीं करते थे।
पर Macdonell एक दूसरा मत भी देते हैं, विद्वान Oldenberg का: आरण्यक ऐसे ग्रंथ थे जिनकी सामग्री इतनी गूढ़ और पवित्र मानी जाती थी कि गुरु उन्हें गाँव में नहीं, वन के एकांत में शिष्य को सिखाता था। दोनों मतों में एक बात साझा है: आरण्यक यज्ञ के बाहरी कर्म से हटकर उसके भीतरी, प्रतीकात्मक अर्थ पर ध्यान देते हैं।
एक उदाहरण इसे साफ़ करता है। ऐतरेय आरण्यक का तीसरा भाग वेद-पाठ के तीन तरीकों, संहिता, पद और क्रम, और वर्णमाला के अक्षरों के गूढ़, प्रतीकात्मक अर्थ पर है। यानी जो चीज़ ब्राह्मण के लिए "कैसे पढ़ें" का नियम थी, वह आरण्यक के लिए "इसका भीतरी अर्थ क्या है" का ध्यान बन गई। Macdonell के शब्दों में, स्वर और विषय दोनों में आरण्यक उपनिषदों की ओर एक पुल हैं।
उपनिषद: आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान
"उपनिषद" शब्द तीन हिस्सों से बना है: उप (पास), नि (नीचे) और सद् (बैठना)। Macdonell बताते हैं कि इसका पहला अर्थ था "पास बैठना", फिर "गोपनीय सभा", और फिर "रहस्य-विद्या"; क्योंकि ये ग्रंथ चुने हुए शिष्यों को, शायद उनकी पढ़ाई के अंत में, ऐसी कक्षाओं में सिखाए जाते थे जिनमें बाकी लोग नहीं होते थे। यानी उपनिषद गुरु के चरणों में बैठकर पाई गई गुप्त, गहरी विद्या है।
उपनिषद पूरी तरह दार्शनिक चिंतन को समर्पित हैं, और Macdonell उन्हें ब्राह्मण-साहित्य के विकास की अंतिम अवस्था मानते हैं। उनके अनुसार सभी पुराने उपनिषदों का विषय मूल रूप से एक ही है: आत्मा, या ब्रह्म, का स्वरूप। "मैं कौन हूँ?" और "यह सब किससे बना है?" इन दोनों प्रश्नों का एक ही उत्तर, कि आत्मा और ब्रह्म एक हैं, उपनिषदों का केंद्र है। छान्दोग्य का "तत्त्वमसि" इसी का सबसे प्रसिद्ध रूप है।
क्योंकि उपनिषद आमतौर पर ब्राह्मण-साहित्य के अंत में आते हैं, इन्हें "वेदांत" भी कहा जाता है। Macdonell बताते हैं कि पहले इसका अर्थ था "वेद का अंत", और बाद में इसकी व्याख्या "वेद का अंतिम लक्ष्य" के रूप में की गई। मुण्डक उपनिषद इसी विचार को साहस के साथ कहता है: चारों वेद और छहों वेदांग "अपरा" विद्या हैं, और "परा" विद्या वह है जिससे अविनाशी ब्रह्म जाना जाता है।
परतों की सीमाएँ पक्की क्यों नहीं
चार परतों का यह क्रम समझने के लिए बहुत उपयोगी है, पर उसे एक सख़्त दीवार या समय की सीधी रेखा मानना गलत होगा। कई जगह एक परत दूसरी के भीतर बैठी है। ईश उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता का अंतिम, चालीसवाँ अध्याय है, यानी एक उपनिषद संहिता के भीतर। उसी संहिता के चौंतीसवें अध्याय के पहले छह मंत्र "शिवसंकल्प उपनिषद" कहलाते हैं।
केन उपनिषद जैमिनीय ब्राह्मण के चौथे भाग, "उपनिषद् ब्राह्मण", के भीतर है, यानी एक ब्राह्मण के अंदर। बृहदारण्यक उपनिषद शतपथ ब्राह्मण के अंतिम काण्ड, जो आरण्यक है, के अंतिम छह अध्याय हैं। ऐतरेय उपनिषद ऐतरेय आरण्यक के दूसरे भाग के अंतिम चार खंड हैं। और कृष्ण यजुर्वेद में ब्राह्मण का गद्य संहिता के भीतर ही मिला हुआ है; कठ और मैत्रायणी शाखाओं के पास अलग ब्राह्मण है ही नहीं।
Macdonell तैत्तिरीय शाखा के बारे में एक और रोचक बात कहते हैं: वहाँ "ब्राह्मण" और "आरण्यक" के नाम से सामग्री में कोई ख़ास अंतर नहीं दिखता, सिवाय उपनिषद वाले अंतिम चार भागों के; ये नाम दूसरे वेदों की नक़ल में बाद में दिए गए लगते हैं। इसलिए सबसे सही समझ यह है: चार परतें चार तरह के विषय हैं, स्तुति, कर्म-व्याख्या, प्रतीक-चिंतन और आत्म-ज्ञान, जो हर वेद में अलग-अलग अनुपात में, कभी अलग ग्रंथों में और कभी एक ही ग्रंथ में, मिलते हैं।
चारों वेदों में चारों परतें
नीचे की तालिका हर वेद की चारों परतों के प्रमुख ग्रंथ एक साथ दिखाती है। हर वेद के अपने पृष्ठ पर इन ग्रंथों का विस्तार है। ध्यान रहे, यह पूरी सूची नहीं, केवल प्रमुख और उपलब्ध ग्रंथों की है।
| वेद | संहिता | ब्राह्मण | आरण्यक | उपनिषद | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | शाकल | ऐतरेय, कौषीतकि | ऐतरेय, कौषीतकि | ऐतरेय, कौषीतकि | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII |
| सामवेद | कौथुम, राणायनीय, जैमिनीय | पंचविंश, छान्दोग्य, जैमिनीय | जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण | छान्दोग्य, केन | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII |
| शुक्ल यजुर्वेद | वाजसनेयी | शतपथ | शतपथ का अंतिम काण्ड | बृहदारण्यक, ईश | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII |
| कृष्ण यजुर्वेद | तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक | संहिता का गद्य; तैत्तिरीय ब्राह्मण | तैत्तिरीय आरण्यक | तैत्तिरीय, महानारायण, कठ, मैत्रायणी | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII |
| अथर्ववेद | शौनक, पैप्पलाद | गोपथ | (अलग आरण्यक नहीं) | मुण्डक, प्रश्न, माण्डूक्य | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII |
श्रुति और स्मृति: वेद कहाँ ख़त्म होता है
परंपरा संहिता से उपनिषद तक, चारों परतों को "श्रुति" मानती है: वह ज्ञान जो सुना गया, यानी प्रकट हुआ। Macdonell बताते हैं कि उपनिषद भी श्रुति में गिने गए, जबकि उनके बाद के सूत्र-ग्रंथ "स्मृति", यानी परंपरा से याद रखे गए ज्ञान, के क्षेत्र में माने गए। इसीलिए धर्म के प्रमाण के रूप में किसी उपनिषद-वाक्य का दर्जा किसी सूत्र या पुराण-वाक्य से ऊँचा माना जाता है।
वेद की परतों के बाद का साहित्य, यानी वेदांग, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराण, वेद की ही व्याख्या और विस्तार के रूप में देखा गया। मुण्डक उपनिषद की कुछ पांडुलिपियाँ, जैसा Max Müller अपनी टिप्पणी में बताते हैं, अपरा विद्या की सूची में इतिहास-पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र भी जोड़ती हैं। पुराणों की दुनिया का परिचय इस ज्ञानकोश के पुराण-खंड में है।
आगे पढ़ें
- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
- यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
- अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- नचिकेता और यम — कठ उपनिषद की कथा
- जनक की सभा — बृहदारण्यक का शास्त्रार्थ
- योग उपनिषद — उपनिषदों में योग
स्रोत एवं संदर्भ
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. VII, VIII, ch. VIII, The Brahmanas, ch. III, VII, ch. III, The Rigveda, ch. VIII
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 1.1.1
- छान्दोग्य उपनिषद्, शांकरभाष्य सहित — GRETIL e-text — GRETIL (2020) · 6.8.7
- The Upanishads, Part II (Sacred Books of the East, vol. 15) — मुण्डक उपनिषद — F. Max Müller (अनु.) (1884) · Mundaka Upanishad I.1.4–5, Mundaka Upanishad I.1.5, टिप्पणी
- The Texts of the White Yajurveda (Vājasaneyi Saṃhitā) — Ralph T. H. Griffith (अनु.) (1899) · Books XXXIV, XL
