कितने देवता, और किसके कितने सूक्त
ऋग्वेद स्वयं देवताओं की संख्या तैंतीस बताता है, और कई बार इसे "तीन गुना ग्यारह" कहता है, यानी तीनों लोकों (द्युलोक, अंतरिक्ष और पृथ्वी) में ग्यारह-ग्यारह। Macdonell के अनुसार यह संख्या हमेशा पूरी नहीं मानी गई, क्योंकि कभी-कभी तैंतीस के अलावा और देवता भी गिनाए जाते हैं, और मरुतों जैसे देव-समूह तो इसमें आ ही नहीं सकते।
पर ऐसे देवता मुश्किल से बीस हैं जिनके कम से कम तीन पूरे सूक्त हों। सबसे प्रमुख हैं इंद्र, कम से कम 250 सूक्तों के साथ, अग्नि लगभग 200 के साथ, और सोम 100 से अधिक के साथ; जबकि वर्षा के देवता पर्जन्य और मृतकों के देवता यम के केवल तीन-तीन सूक्त हैं। Macdonell एक रोचक बात कहते हैं: आज के हिंदू धर्म के दो सबसे बड़े देवता, विष्णु और शिव, ऋग्वेद में भी एक ही स्तर पर थे, पर प्रमुख देवताओं से बहुत नीचे, विष्णु और रुद्र (शिव का पुराना रूप) के रूप में; और तब भी उनका स्वभाव वैसा ही था, विष्णु विशेष रूप से कृपालु और रुद्र भयंकर।
| देवता | लोक | स्वभाव | सूक्त | स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| इंद्र | अंतरिक्ष | वृत्र का वध करके जल मुक्त करने वाले, युद्ध के देवता | कम से कम 250 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| अग्नि | पृथ्वी | यज्ञ की अग्नि, देवताओं का दूत और पुरोहित, घर का स्वामी | लगभग 200 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| सोम | पृथ्वी | अमृत देने वाला पेय और "पौधों का राजा"; बाद में चंद्रमा | 100 से अधिक | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| उषा | द्युलोक | भोर की देवी | लगभग 20 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| पूषा | द्युलोक | पथ और पशुओं के रक्षक, मृतकों को पितरों तक ले जाने वाले | लगभग 8 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| द्यौस-पृथ्वी | द्युलोक | जगत के माता-पिता | 6 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| रुद्र | अंतरिक्ष | भयंकर, पर सबसे बड़े वैद्य; "शिव" विशेषण | 3–4 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
| पर्जन्य, यम | अंतरिक्ष, (मृत्यु-लोक) | वर्षा के देवता; मृतकों के राजा | 3-3 | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. IV |
द्युलोक के देवता: वरुण, सविता, विष्णु और उषा
आकाश के देवताओं में सबसे पुराने द्यौस (यूनानी ज़्यूस के समान) हैं, जो पृथ्वी के साथ जगत के माता-पिता कहे जाते हैं। पर उनसे कहीं महत्वपूर्ण वरुण हैं। Macdonell के अनुसार वरुण के सूक्त इंद्र, अग्नि या सोम से बहुत कम हैं, फिर भी इंद्र के बाद वही सबसे बड़े वैदिक देवता हैं: इंद्र महान योद्धा हैं, तो वरुण भौतिक और नैतिक व्यवस्था, "ऋत", के महान रक्षक। उनके नियम से द्युलोक और पृथ्वी अलग टिके हैं, नदियाँ बहती हैं, और रात में चंद्रमा और तारे चलते हैं।
वरुण सर्वज्ञ हैं: वे आकाश में पक्षियों की उड़ान, समुद्र में जहाज़ों का मार्ग और मनुष्यों का सच-झूठ, सब जानते हैं, और उनके बिना कोई पलक भी नहीं झपका सकता। उनके नियम तोड़ना पाप है, जिसकी वे कड़ी सज़ा देते हैं, पर पछताने वाले पर कृपा करते हैं, और मनुष्य को उसके पूर्वजों के पापों से भी मुक्त करते हैं। Macdonell के अनुसार वरुण का कोई ऐसा सूक्त नहीं जिसमें पाप की क्षमा की प्रार्थना न हो। बाद में प्रजापति के सर्वोच्च देवता बनने पर वरुण के पास केवल जल का अधिकार रह गया, और पुराणों में वे समुद्र के देवता हैं।
सविता "प्रेरक" सूर्य हैं: सुनहरे रथ में, सुनहरे हाथों वाले, जो बुरे सपनों और राक्षसों को भगाते हैं और कोई देवता, इंद्र और वरुण भी, जिनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता। ऋग्वेद का सबसे प्रसिद्ध मंत्र, सावित्री या गायत्री, इन्हीं को संबोधित है, जिससे प्राचीन काल में वेद-अध्ययन शुरू होता था और जिसे Macdonell के समय भी हर धर्मनिष्ठ हिंदू सुबह की प्रार्थना में दोहराता था। विष्णु, सूक्तों की गिनती में "चौथे दर्जे" के होकर भी, सौर देवताओं में ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हैं; उनकी पहचान तीन पगों से है, जिनका सबसे ऊँचा पग वह लोक है जहाँ देवता और पितर रहते हैं। ब्राह्मण ग्रंथों में यही तीन पग वामन की कथा बने, और बाद में अवतारों का सिद्धांत।
भोर की देवी उषा लगभग अकेली देवी हैं जिन्हें पूरे सूक्त समर्पित हैं, लगभग बीस। उनका नाम "चमकने वाली" के अर्थ का है, और लैटिन "ऑरोरा" और यूनानी "ईओस" से जुड़ा है। उन्हें सोम में भाग नहीं मिलता, फिर भी ऋषि बड़े स्नेह से उनके गीत गाते हैं: वे द्युलोक की पुत्री हैं, और उनके चमकते ही पक्षी अपने घोंसलों से उड़ने लगते हैं। पूषा पथों और पशुओं के रक्षक हैं, जो बकरियों वाले रथ में चलते हैं और मृतकों को पितरों तक का मार्ग दिखाते हैं।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥हम सविता देव के उस वरणीय तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे।
अंतरिक्ष के देवता: इंद्र, रुद्र और मरुत
अंतरिक्ष के प्रमुख देवता इंद्र हैं, और ऋग्वेद के सबसे लोकप्रिय भी। उनकी मुख्य कथा वृत्र-वध की है: वृत्र नाम के नाग ने जल को रोक रखा है, और इंद्र मरुतों के साथ वज्र लेकर उससे लड़ते हैं, उसे मारकर जल को मुक्त करते हैं, और सूर्य को आकाश में स्थापित करते हैं। एक मंत्र पूरी कथा एक साथ कहता है: "इंद्र ने वृत्र को मारा, किले तोड़े, नदियों के लिए मार्ग बनाया, पर्वत को भेदा, और गायें अपने मित्रों को दीं।" इसीलिए उनका मुख्य विशेषण "वृत्रहन्" (वृत्र को मारने वाला) है, और वे युद्ध में सहायता के लिए सबसे अधिक पुकारे जाने वाले देवता हैं।
रुद्र की स्थिति ऋग्वेद में उनके बाद के रूप से बहुत अलग है। उनके केवल तीन या चार सूक्त हैं; वे धनुष-बाण वाले, भयंकर, "द्युलोक के लाल वराह" कहे गए हैं, और उनके सूक्त मुख्यतः उनके बाणों के डर और उनके क्रोध को शांत करने की प्रार्थना हैं। फिर भी वे केवल विनाशक नहीं: उनसे कल्याण माँगा जाता है, और उन्हें "सबसे बड़ा वैद्य" कहा गया है। उनका एक विशेषण "शिव" (मंगलकारी) ऋग्वेद में भी है, जो वेदों के बाद उनका मुख्य नाम बन गया। मरुत, आँधी के देवता, उन्हीं के पुत्र हैं, जो सोने के बाज़ूबंद पहने युवा योद्धाओं का दल हैं, "बिजली की हँसी से जन्मे"।
पृथ्वी के देवता: अग्नि और सोम
पृथ्वी के देवताओं में सबसे महत्वपूर्ण अग्नि हैं, जो इंद्र के बाद सबसे प्रमुख वैदिक देवता हैं। वे यज्ञ की अग्नि हैं, जिसके चारों ओर पूरी वैदिक काव्य-परंपरा घूमती है। ऋषि उन्हें "घृत-पृष्ठ", "धूम-केतु" (धुएँ के ध्वज वाले) और "सहस् के पुत्र" कहते हैं, क्योंकि उन्हें ज़ोर से मंथन करके उत्पन्न किया जाता है; दस उँगलियाँ उनकी "दस कुमारियाँ" हैं जो उन्हें जन्म देती हैं। वे घर-घर के "अतिथि" हैं, और "गृहपति" (घर के स्वामी) विशेषण केवल उन्हीं के लिए आता है। जैसे इंद्र महान योद्धा हैं, वैसे अग्नि महान पुरोहित, जो देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत हैं।
अग्नि के तीन जन्म बताए गए हैं: द्युलोक में (सूर्य), जल में (बिजली), और मनुष्यों के बीच (यज्ञ की अग्नि)। Macdonell के अनुसार यह "सबसे प्राचीन भारतीय त्रयी" वैदिक युग के बहुत-से रहस्य-चिंतन का आधार है, और शायद यही बाद की ब्रह्मा-विष्णु-शिव त्रिमूर्ति की ऐतिहासिक पूर्वज भी है; यही यज्ञ की एक अग्नि को तीन अग्नियों में बाँटने का कारण भी हो सकती है। अग्नि अनेक स्थानों पर जलकर भी एक ही हैं, और उनमें सब देवता समाए हैं, जैसे पहिये की नेमि में अरे।
सोम, यज्ञ का पवित्र पेय और उसके देवता, ऋग्वेद के पूरे नौवें मंडल के विषय हैं; Macdonell के अनुसार उस मंडल की एकता इसी से है कि उसके सब सूक्त अकेले सोम को समर्पित हैं। सोम "अमृत" है, जिसने देवताओं को अमरता दी; वह रोगी की औषधि है और "पौधों का राजा"। उसके उपासक कहते हैं: "हमने सोम पिया, हम अमर हो गए, हम ज्योति में पहुँच गए, हमने देवताओं को जान लिया।" ऋग्वेद के सबसे बाद के सूक्तों में सोम का संबंध चंद्रमा से जुड़ने लगता है; अथर्ववेद में सोम कई बार चंद्रमा का अर्थ देता है, और बाद के साहित्य में "सोम" चंद्रमा का सामान्य नाम ही बन गया।
"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति": अनेक देवताओं में एक
ऋग्वेद के बाद के सूक्तों में एक बहुत गहरा विचार उभरता है: अलग-अलग देवता एक ही दिव्य सत्ता के अलग-अलग रूप हैं। पहले मंडल के एक सूक्त में कहा गया: "उसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि कहते हैं, और वह दिव्य सुपर्ण गरुत्मान है; एक ही सत् को विप्र अनेक प्रकार से कहते हैं, उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा कहते हैं।" दसवें मंडल का एक ऋषि कहता है कि पुरोहित और कवि अपने शब्दों से एक ही पक्षी (सूर्य) को अनेक बना देते हैं। Macdonell के अनुसार ऐसे कथन बताते हैं कि ऋग्वेद-काल के अंत तक ऋषियों के बहुदेववाद में एकेश्वरवाद का रंग आ चुका था।
कुछ जगह यह विचार और आगे जाता है: एक सूक्त में अदिति को सब देवता, मनुष्य, जो हुआ और जो होगा, वायु और द्युलोक, सब कहा गया है, और सृष्टि के एक सूक्त (10.121) में प्रजापति केवल देवताओं के ऊपर का एक देवता नहीं, सब कुछ को समेटने वाले बताए गए हैं। Macdonell के अनुसार यही बीज बाद के वैदिक साहित्य में बढ़ता हुआ वेदांत दर्शन के रूप में पूरा हुआ।
ऋषि जिस देवता की स्तुति करते हैं, उसे उस समय सबसे बड़ा बताते हैं। Max Müller ने इसे "हीनोथीज़्म" कहा, यानी बारी-बारी से हर देवता को सर्वोच्च मानना। पर Macdonell का मत था कि यह वैसा ही बढ़ा-चढ़ाकर कहना है जैसा कोई भी गायक अपने आराध्य के लिए करता है, क्योंकि ऋषि सोम-यज्ञ में हर देवता का ठीक-ठीक स्थान जानते थे। वैदिक कवियों की दृष्टि में देवताओं का भी आरंभ हुआ था, वे द्यौस और पृथ्वी जैसे माता-पिता की संतान थे, और उन्हें अमरता अग्नि या सविता जैसे देवताओं के वरदान से, या सोम पीकर मिली।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥उसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि कहते हैं, और वह दिव्य सुंदर पंखों वाला गरुत्मान है। एक ही सत् को ज्ञानी अनेक प्रकार से कहते हैं: उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा कहते हैं।
आगे पढ़ें
- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
- वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
- यज्ञ की परंपरा — तीन अग्नियों वाले बड़े श्रौत यज्ञ और घर की एक अग्नि वाले गृह्य संस्कार: सोलह ऋत्विज, चौदह श्रौत यज्ञ, चालीस संस्कार और पाँच महायज्ञ
- सरस्वती — वैदिक नदी-देवी से विद्या की देवी तक
स्रोत एवं संदर्भ
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. IV, Poetry of the Rigveda, ch. IV
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 7.89.1, 3.62.10, 1.154.5, 1.32, 10.89.7, 1.164.46, 10.121.10, 3.62.10
