यज्ञ क्या है: अग्नि, यजमान और वेदी
ऋग्वेद का पहला ही मंत्र यज्ञ की पूरी व्यवस्था की झलक देता है: "मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो पुरोहित है, यज्ञ का देव है, ऋत्विज है, होता है और रत्न देने वालों में श्रेष्ठ है।" यहाँ अग्नि स्वयं यज्ञ का पुरोहित है, यानी वह जो आगे रखा जाता है, और वही देवताओं तक हवि पहुँचाता है। पुरोहित, ऋत्विज और होता, ये तीनों शब्द आगे चलकर यज्ञ के पदों के नाम बने।
Macdonell बताते हैं कि श्रौत यज्ञ कभी सामूहिक नहीं होते थे; वे हमेशा एक व्यक्ति, "यजमान", की ओर से होते थे, जो स्वयं उनमें बहुत कम भाग लेता था, और उन्हें ब्राह्मण ऋत्विज करते थे, जिनकी संख्या कर्म के अनुसार एक से सोलह तक होती थी। इन सब यज्ञों में "वेदी" के चारों ओर की तीन पवित्र अग्नियाँ मुख्य हैं; वेदी थोड़ी खोदी हुई जगह होती है जिस पर देवताओं के लिए आहुतियाँ रखने को घास बिछाई जाती है। सबसे पहला कर्म "अग्न्याधेय" है, जिसमें यजमान और उसकी पत्नी अरणि (मंथन की लकड़ियों) से अग्नियाँ जलाते हैं, जिन्हें फिर नियम से सदा जलाए रखना होता है।
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ, जो पुरोहित है, यज्ञ का देव है, ऋत्विज है, होता है और रत्नों का सबसे बड़ा दाता है।
ऋत्विज: यज्ञ के चार प्रकार के पुरोहित
ऋग्वेद का एक मंत्र यज्ञ में चार अलग भूमिकाएँ गिनाता है: "एक ऋचाओं को पुष्ट करता बैठा है, एक शक्वरी छंदों में गायत्र गाता है, एक, ब्रह्मा, उत्पन्न हुई विद्या को कहता है, और एक यज्ञ की मात्रा (माप) तय करता है।" यज्ञ एक सामूहिक प्रस्तुति थी, जिसमें हर भूमिका का अपना वेद और अपना कौशल था।
Macdonell के अनुसार हर वेद के ब्राह्मण ग्रंथ उसी वेद के पुरोहित के कर्तव्य बताते हैं। ऋग्वेद के ब्राह्मण "होता" (पढ़ने वाले) के, जिसका काम हर कर्म के लिए सूक्तों में से उपयुक्त मंत्र चुनकर "शस्त्र" बनाना था; सामवेद के ब्राह्मण "उद्गाता" (गाने वाले) के; और यजुर्वेद के ब्राह्मण "अध्वर्यु" के, जो वास्तव में यज्ञ की क्रियाएँ करता है। चौथा पुरोहित "ब्रह्मा" है, और अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद और इसी चौथे पुरोहित की महिमा बताता है।
इसी कारण Macdonell लिखते हैं कि कोई एक श्रौत सूत्र यज्ञ का पूरा चित्र नहीं देता, क्योंकि हर सूत्र, ब्राह्मण ग्रंथों की तरह, केवल अपने वेद के पुरोहितों के कर्तव्य बताता है; किसी यज्ञ का पूरा विवरण पाने के लिए एक सूत्र के वर्णन को बाक़ी सूत्रों से पूरा करना पड़ता है।
| ऋत्विज | काम | वेद | स्रोत |
|---|---|---|---|
| होता | ऋचाएँ पढ़ना; हर कर्म के लिए मंत्र चुनकर "शस्त्र" बनाना | ऋग्वेद | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. II |
| उद्गाता | सामों का गान | सामवेद | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. II |
| अध्वर्यु | यज्ञ की वास्तविक क्रियाएँ करना | यजुर्वेद | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. II |
| ब्रह्मा | चौथा पुरोहित | अथर्ववेद (गोपथ ब्राह्मण इसकी महिमा बताता है) | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII, Gopatha Brahmana; ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), 10.71.11 |
श्रौत यज्ञ: अग्निहोत्र से सोमयाग और अग्निचयन तक
Macdonell के अनुसार श्रौत यज्ञ चौदह हैं, जो दो समूहों में बँटते हैं: सात "हविर्यज्ञ" और सात "सोमयज्ञ"; पशु-यज्ञ के अलग-अलग रूप दोनों समूहों में गिने जाते हैं। हविर्यज्ञों में दूध, घी, खीर, अन्न, पुरोडाश आदि की आहुति होती है। सबसे सामान्य "अग्निहोत्र" है, तीनों अग्नियों में सुबह और शाम दूध की दैनिक आहुति। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण हैं अमावस्या और पूर्णिमा के "दर्श-पूर्णमास" यज्ञ, और तीनों ऋतुओं के आरंभ के "चातुर्मास्य"।
सोमयज्ञ कहीं अधिक जटिल थे। उनका सबसे सरल और मूल रूप "अग्निष्टोम" (अग्नि की स्तुति) है, जिसमें भी सोलह ऋत्विज लगते थे। यह एक ही दिन का था, जिसमें सुबह, दोपहर और शाम, तीन बार सोम का रस निकाला जाता था; पर उस दिन से पहले बहुत विस्तृत तैयारी होती थी, जिसमें यजमान और उसकी पत्नी की "दीक्षा" भी है। दूसरे सोमयज्ञ कई दिनों से बारह दिनों तक चलते थे, और "सत्र" कहलाने वाले यज्ञ एक वर्ष या उससे भी अधिक।
सोमयज्ञ से जुड़ा एक बहुत पवित्र कर्म "अग्निचयन" है, यानी अग्नि-वेदी की चिनाई, जो एक वर्ष तक चलता है। इसमें "उखा" नाम का मिट्टी का पात्र बनाया जाता है जिसमें साल भर अग्नि रखी जाती है, और फिर अलग-अलग नाप की ईंटें तय क्रम में चिनी जाती हैं: पाँच परतें, सबसे नीचे की परत में 1,950 और कुल 10,800 ईंटें, जिनमें बहुतों का अपना नाम और अर्थ है। Macdonell ने लिखा कि इस विशाल जटिलता और सूक्ष्म नियमों जैसा किसी और धर्म ने कभी नहीं जाना।
हर वेद के अपने श्रौत सूत्र
श्रौत सूत्र "श्रुति" पर, यानी मुख्यतः ब्राह्मण ग्रंथों पर, आधारित हैं, और उन बड़े यज्ञों की विधि बताते हैं जिनमें तीन या अधिक पवित्र अग्नियाँ और ऋत्विज ज़रूरी हैं। ऋग्वेद के दो सूत्र-संप्रदाय हैं: शांखायन (अठारह पुस्तकें; बड़े राजकीय यज्ञों का विवरण इसमें अधिक है) और आश्वलायन (बारह पुस्तकें, ऐतरेय ब्राह्मण से जुड़ा; परंपरा से आश्वलायन शौनक के शिष्य थे)। सामवेद के तीन बचे हैं: मशक (आर्षेय-कल्प), लाट्यायन (कौथुम शाखा का मान्य ग्रंथ) और द्राह्यायण (राणायनीय शाखा का)।
शुक्ल यजुर्वेद का श्रौत सूत्र कात्यायन का है, छब्बीस अध्यायों में, जो शतपथ ब्राह्मण के यज्ञ-क्रम का पालन करता है। कृष्ण यजुर्वेद के छह श्रौत सूत्र बचे हैं, जिनमें आपस्तंब, हिरण्यकेशी, बौधायन (आपस्तंब से पुराने), भारद्वाज, और मैत्रायणी संहिता से जुड़ा मानव श्रौत सूत्र हैं। अथर्ववेद का श्रौत सूत्र "वैतान सूत्र" है; "वैतान" का अर्थ है तीन यज्ञ-अग्नियों से संबंधित, और Macdonell के अनुसार यह न पुराना है न मौलिक, बल्कि अथर्ववेद को भी बाक़ी वेदों की तरह अपना सूत्र देने के लिए संकलित हुआ।
गृह्य कर्म: घर की अग्नि और जीवन के संस्कार
यज्ञ-परंपरा की दूसरी धारा "गृह्य सूत्र" (घर के सूत्र) हैं, जो "स्मृति", यानी परंपरा, पर आधारित हैं और घर की अग्नि से रोज़ के जीवन में होने वाले कर्म बताते हैं। Macdonell के अनुसार ये कर्म आमतौर पर पुरोहित नहीं, स्वयं गृहस्थ अपनी पत्नी के साथ करता है, और इनके लिए तीन अग्नियों की नहीं, केवल एक घरेलू अग्नि (आवसथ्य या वैवाहिक अग्नि) की ज़रूरत होती है। इसीलिए अलग-अलग गृह्य सूत्रों में कोई मूल अंतर नहीं, सिवाय इसके कि मंत्र अपने-अपने वेद से लिए जाते हैं।
गृह्य सूत्र चालीस संस्कार बताते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर होते हैं: गर्भाधान से विवाह तक के पहले अठारह "शरीर-संस्कार" कहलाते हैं, और बाक़ी बाईस यज्ञ हैं। इनमें पुंसवन, जातकर्म, नामकरण (आमतौर पर जन्म के दसवें दिन; दो नाम, एक गुप्त जिसे केवल माता-पिता जानें), तीसरे वर्ष चूडाकरण, सोलहवें वर्ष गोदान, और सबसे महत्वपूर्ण उपनयन हैं। गृह्य सूत्र नाम के नियम तक देते हैं: नाम में सम संख्या में अक्षर हों, और ब्राह्मण के नाम के अंत में "शर्मा", क्षत्रिय के "वर्मा" और वैश्य के "गुप्त"।
उपनयन में आचार्य शिष्य का आध्यात्मिक पिता और सावित्री मंत्र उसकी माता मानी जाती है, और इसी से वह "द्विज" बनता है। Macdonell के अनुसार यह संस्कार भारत में आज भी होता है, और ज़रथुश्त्री समुदाय में पंद्रह वर्ष के लड़के को पवित्र धागा पहनाने की प्रथा दिखाती है कि इसकी जड़ें भारत-ईरानी काल तक जाती हैं। ब्रह्मचर्य बारह वर्ष, या वेद पूरा होने तक, चलता था, जिसके बाद "समावर्तन" स्नान से वह "स्नातक" बनता था।
विवाह: सात पग, अग्नि के फेरे और ध्रुव तारा
गृह्य संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण विवाह है, और Macdonell के अनुसार यही एकमात्र संस्कार था जिसमें कन्याओं का भी भाग था। पाणिग्रहण (हाथ थामना), वधू का पत्थर पर पैर रखना ताकि उसमें दृढ़ता आए, पति के साथ सात पग चलना और साथ भोजन करना, जो मित्रता और साझेदारी की शुरुआत थे, और अग्नि की तीन परिक्रमा, जिससे विवाह का संस्कृत नाम "परिणय" (चारों ओर ले जाना) बना। नई जलाई घरेलू अग्नि जीवन भर दंपती के साथ रहनी थी।
सूर्यास्त के बाद पति वधू को बाहर ले जाकर ध्रुव तारा और अरुंधती तारा दिखाता है, और दोनों एक-दूसरे से सदा स्थिर और अविभाजित रहने का वचन लेते हैं। Macdonell लिखते हैं कि सूत्रों में जैसे ये विवाह-कर्म बताए गए हैं, लगभग वैसे ही वे आज के भारत में भी व्यापक रूप से प्रचलित हैं, और लगभग बारह संस्कार आज भी होते हैं, जिनमें विवाह के बाद उपनयन सबसे महत्वपूर्ण है।
पंच महायज्ञ: हर गृहस्थ के पाँच दैनिक यज्ञ
नए गृहस्थ का सबसे महत्वपूर्ण दैनिक कर्तव्य पाँच "महायज्ञ" हैं: ब्रह्म-यज्ञ (वेद का पाठ), देव-यज्ञ (अग्नि में घी की आहुति, होम), पितृ-यज्ञ (पितरों को तर्पण), भूत-यज्ञ (सब प्राणियों के लिए अलग-अलग स्थानों पर बलि रखना) और मनुष्य-यज्ञ (अतिथि-सत्कार, विशेषकर भिक्षु ब्राह्मणों का)। इनमें पहला, वेद-पाठ, सबसे ऊँचा माना गया है, और सुबह-शाम की उपासना में सावित्री का जप वेद पढ़ने जितना पुण्यकारी है।
गृह्य कर्मों में और भी समय-समय के कर्म हैं: अमावस्या-पूर्णिमा पर पका हुआ अन्न (पाकयज्ञ) चढ़ाना, वर्षा के आरंभ में साँपों को आहुति (और उस समय ऊँचे बिस्तर पर सोने का नियम), नए घर के निर्माण और उसमें प्रवेश के कर्म (पश्चिम में द्वार न रखने जैसे नियमों के साथ), पहली फ़सल चढ़ाना, हल चलाने के कर्म, और समुदाय के लाभ के लिए एक युवा बैल को छोड़ना। यज्ञ इस तरह केवल वेदी तक नहीं, खेत, घर और पशुओं तक फैला हुआ था।
आगे पढ़ें
- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
- वेद-पाठ की परंपरा — संहिता, पद, क्रम, जटा और घन पाठ; उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर; शिक्षा, प्रातिशाख्य और अनुक्रमणियाँ: स्मृति की रक्षा का एक पूरा विज्ञान
- गोत्र और प्रवर — वैदिक कर्मों में गोत्र-प्रवर
स्रोत एवं संदर्भ
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 1.1.1, 10.71.11
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. IX, The Sutras, ch. II, ch. VIII, Gopatha Brahmana
