सामवेद: गान का वेद, आर्चिक, साम-गान और उपनिषद

ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ

संक्षेप में

सामवेद गान का वेद है। इसके लगभग सारे मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, पर यज्ञ में उन्हें उद्गाता नाम का पुरोहित विशेष स्वर-लहरी में गाता है, और गाई गई ऋचा "साम" कहलाती है। कौथुम शाखा की संहिता में 1,875 मंत्र हैं, जो पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बँटे हैं।

एक नज़र में

नाम का अर्थ
साम = गान, वह स्वर-लहरी जिसमें ऋचा गाई जाती है
यज्ञ में ऋत्विज
उद्गाता
व्यास के शिष्य
जैमिनि (विष्णु पुराण 3.4)
संरचना (कौथुम)
पूर्वार्चिक 650 + उत्तरार्चिक 1,225 = 1,875 मंत्र
अनोखे मंत्र
Macdonell: 1,549 मंत्रों में से केवल 75 ऋग्वेद में नहीं
शाखाएँ
कौथुम, राणायनीय, जैमिनीय (तलवकार)
गान-ग्रंथ
ग्रामगेय, आरण्यक गान, ऊह गान, ऊह्य गान
ब्राह्मण
पंचविंश (ताण्ड्य), छान्दोग्य ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण
उपनिषद
छान्दोग्य, केन
गीता में
"वेदानां सामवेदोऽस्मि" (10.22)

सामवेद क्या है?

किसी बड़े सोम-यज्ञ की कल्पना कीजिए। एक ओर होता ऋग्वेद की ऋचाएँ पढ़ रहा है, बीच में अध्वर्यु यजुस् बोलते हुए आहुतियाँ दे रहा है, और फिर एक पुरोहित खड़ा होकर वही पुरानी ऋचा गाने लगता है, शब्दों को खींचते, दोहराते, ऊँचे-नीचे स्वरों में ढालते हुए। वह उद्गाता है, और वह जो गा रहा है, वह साम है। सामवेद इन्हीं गाए जाने वाले मंत्रों का वेद है।

"साम" शब्द का अर्थ है गान, वह विशेष धुन जिसमें कोई ऋचा गाई जाती है। ऋचा शब्द है, साम उसका गाया हुआ रूप। इसीलिए एक ही ऋचा पर कई साम हो सकते हैं, जैसे एक कविता को कई धुनों में गाया जा सकता है। Griffith अपनी भूमिका में सामवेद को "Veda of Holy Songs", यानी पवित्र गीतों का वेद, कहते हैं, और लिखते हैं कि पवित्रता और यज्ञ में महत्व में यह ऋग्वेद के बाद आता है।

परंपरा के अनुसार व्यास ने जब एक वेद को चार भागों में बाँटा, तो सामवेद अपने शिष्य जैमिनि को सौंपा। विष्णु पुराण आगे की कथा भी देता है। जैमिनि के पुत्र सुमन्तु हुए, और सुमन्तु के पुत्र सुकर्मा ने साम-संहिता के हज़ार भेद किए। सुकर्मा के दो शिष्य हिरण्यनाभ कौसल्य और पौष्पिञ्जि हुए, और पौष्पिञ्जि के शिष्यों में लोकाक्षि, कुथुमि, कुषीदी और लांगलि थे। आज की "कौथुम" शाखा का नाम इसी कुथुमि से जुड़ता है।

चारों वेदों में सामवेद का स्थान

सामवेद की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसके मंत्र नए नहीं हैं। Macdonell के अनुसार सामवेद के 1,549 अनोखे मंत्रों में से केवल 75 ऐसे हैं जो ऋग्वेद में नहीं मिलते; बाकी सब ऋग्वेद से लिए गए हैं। इसलिए इतिहासकार की नज़र से सामवेद में नया पाठ बहुत कम है। पर यही उसकी असली ख़ूबी है: उसका योगदान शब्द में नहीं, संगीत में है।

Griffith एक रोचक बात बताते हैं। सामवेद में ऋग्वेद की ऋचाओं के पाठ में अक्सर छोटे-छोटे अंतर मिलते हैं, और इनमें से कुछ अंतर ऋग्वेद के आज के पाठ से भी पुराने और मौलिक लगते हैं। Macdonell भी मानते हैं कि सामवेद का संग्रह यजुर्वेद की तैत्तिरीय और वाजसनेयी संहिताओं से पुराना हो सकता है। यानी सामवेद केवल ऋग्वेद की "नकल" नहीं, उसकी एक स्वतंत्र, पुरानी गवाही भी है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अपनी विभूतियाँ गिनाते हुए कहते हैं: "वेदों में मैं सामवेद हूँ" (10.22)। आगे वे कहते हैं: "सामों में मैं बृहत्साम हूँ, और छंदों में गायत्री" (10.35)। गान के वेद को यह सम्मान बताता है कि परंपरा में स्तुति को गाकर अर्पित करना सबसे ऊँचा भाव माना गया।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥

वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवताओं में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ, और प्राणियों में चेतना हूँ।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), भगवद्गीता 10.22

संरचना: पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक

सामवेद-संहिता दो बड़े भागों में बँटी है, जिन्हें "आर्चिक" कहते हैं, यानी ऋचाओं का संग्रह। पहला भाग "पूर्वार्चिक" है, और दूसरा "उत्तरार्चिक"। हमने GRETIL पर उपलब्ध कौथुम शाखा की संहिता के पाठ में मंत्रों को स्वयं गिना। उसमें मंत्र 1 से 1,875 तक लगातार गिने गए हैं, और भागों की सीमाएँ पाठ के भीतर के "इति…" वाले वाक्यों से साफ़ दिखती हैं।

पूर्वार्चिक के भीतर मंत्र देवताओं के अनुसार सजे हैं। पहले "आग्नेय काण्ड" में अग्नि के मंत्र हैं (1–114), फिर "ऐन्द्र काण्ड" में इंद्र के (115–466), फिर "पावमान काण्ड" में सोम पवमान के (467–585)। इसके बाद "आरण्यक" मंत्र (586–640) आते हैं, जो गाँव से बाहर, वन में गाए जाने वाले सामों के आधार हैं, और अंत में दस "महानाम्नी" ऋचाएँ (641–650)। यानी पूर्वार्चिक में कुल 650 मंत्र हैं।

उत्तरार्चिक में 651 से 1,875 तक, यानी 1,225 मंत्र हैं। Griffith बताते हैं कि यह भाग पूर्वार्चिक से कम बिखरा हुआ है, और आमतौर पर तीन-तीन मंत्रों के समूहों (तृच) में सजा है, जिनका पहला मंत्र अक्सर वही होता है जो पूर्वार्चिक में पहले आ चुका है। समझने का सरल तरीका यह है: पूर्वार्चिक धुनों की "सूची" है, जहाँ हर धुन एक मंत्र पर सिखाई जाती है, और उत्तरार्चिक वे पूरे समूह देता है जिन पर यज्ञ में वह धुन सचमुच गाई जाती है।

1,875 और 1,549 के अंतर का कारण भी यही है। उत्तरार्चिक में पूर्वार्चिक के बहुत-से मंत्र दोबारा आते हैं। सब मंत्रों को गिनें तो 1,875 होते हैं, और हर मंत्र को एक ही बार गिनें तो लगभग 1,549, जो संख्या Macdonell देते हैं। दोनों सही हैं, बस गिनने का ढंग अलग है।

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

हे अग्नि, स्तुति सुनकर हवि ग्रहण करने और उसे देवताओं तक पहुँचाने के लिए आओ, और होता बनकर कुशा के आसन पर विराजो। (सामवेद का पहला मंत्र)

— सामवेद-संहिता, कौथुम शाखा — GRETIL e-text, पूर्वार्चिक 1.1.1.1 (मंत्र 1)
सामवेद (कौथुम संहिता) की संरचना: स्वयं गिनती
भागकाण्डमंत्र-क्रमांकमंत्रस्रोत
पूर्वार्चिकआग्नेय (अग्नि)1–114114सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 1–114
पूर्वार्चिकऐन्द्र (इंद्र)115–466352सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 115–466
पूर्वार्चिकपावमान (सोम)467–585119सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 467–585
पूर्वार्चिकआरण्यक586–64055सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 586–640
पूर्वार्चिकमहानाम्नी ऋचाएँ641–65010सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 641–650
उत्तरार्चिकनौ प्रपाठक, अधिकतर तृच651–1,8751,225सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), 651–1,875
कुल1–1,8751,875सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), पूरा पाठ

साम-गान: एक ऋचा, जो गीत बनती है

संहिता में जो छपा है, वह केवल ऋचा है। वह साम कैसे बनती है, यह अलग ग्रंथ बताते हैं, जिन्हें "गान" कहते हैं। Griffith लिखते हैं कि गाते समय मंत्र के अक्षर और भी बदल जाते हैं: किसी अक्षर को लंबा खींचा जाता है, किसी को दोहराया जाता है, बीच में नए अक्षर जोड़े जाते हैं, और विराम और स्वर-परिवर्तन होते हैं। ये सब नियम पुरोहितों के मार्गदर्शन के लिए गान-ग्रंथों में लिखे हैं।

गान-ग्रंथ चार हैं। "ग्रामगेय गान" वे साम हैं जो गाँव में, यानी सामान्य यज्ञ में, गाए जाते हैं, और "आरण्यक गान" वे जो वन में गाए जाते हैं। ये दोनों पूर्वार्चिक के क्रम पर चलते हैं। "ऊह गान" और "ऊह्य गान" उत्तरार्चिक के क्रम पर चलते हैं, और वहाँ बताते हैं कि पूर्वार्चिक में सीखी धुन को यज्ञ के पूरे तृच पर कैसे ढाला जाए। यानी पूर्वार्चिक और उसके गान "सीखने" के लिए हैं, और उत्तरार्चिक और उसके गान यज्ञ में "प्रयोग" के लिए।

Griffith जिन "जोड़े गए अक्षरों" की बात करते हैं, वे साम-गान की सबसे पहचानी जाने वाली चीज़ हैं। मंत्र के शब्दों के बीच ऐसे अक्षर गाए जाते हैं जिनका कोई शब्द-अर्थ नहीं होता, बस स्वर होता है। इनसे गान लंबा, गूँजता और लयबद्ध बनता है, और यही साम को साधारण मंत्र-पाठ से अलग करता है। इसी कारण Griffith सामवेद की संहिता को केवल उसका "मंत्र-भाग" (metrical portion) कहते हैं: पूरा सामवेद तो तब बनता है जब वह गाया जाए।

एक साम के भाग: हिंकार से निधन तक

एक साम एक लंबी, अखंड धुन नहीं होता। छान्दोग्य उपनिषद बताता है कि उसके हिस्से होते हैं, और हर हिस्से का अपना नाम है। पाँच भागों वाले साम में पहले "हिंकार" आता है, यानी "हुम्" की आरंभिक ध्वनि; फिर "प्रस्ताव", यानी भूमिका; फिर "उद्गीथ", गान का मुख्य और सबसे ऊँचा भाग; फिर "प्रतिहार", यानी उत्तर देने वाला भाग; और अंत में "निधन", यानी समापन। उपनिषद इन पाँचों की तुलना लोकों से करता है: पृथ्वी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव, अंतरिक्ष उद्गीथ, आदित्य प्रतिहार, और द्युलोक निधन। और फिर उलटे क्रम में भी, ऊपर से नीचे।

सात भागों वाले साम में दो भाग और जुड़ते हैं: "आदि" और "उपद्रव"। उपनिषद इनकी पहचान वाणी के अक्षरों से कराता है: वाणी में जो "हुम्" है वह हिंकार है, जो "प्र" है वह प्रस्ताव, जो "आ" है वह आदि, जो "उत्" है वह उद्गीथ, जो "प्रति" है वह प्रतिहार, जो "उप" है वह उपद्रव, और जो "नि" है वह निधन। यानी साम के भागों के नाम ही उनके उपसर्गों से बने हैं, और गान की बनावट भाषा की बनावट से जुड़ी है।

साम के ये भाग अलग-अलग गायक गाते थे, और यहीं से सामवेद के तीन मुख्य पुरोहित निकलते हैं। "प्रस्तोता" प्रस्ताव गाता है, "उद्गाता" उद्गीथ, और "प्रतिहर्ता" प्रतिहार। छान्दोग्य की एक कथा, जो नीचे दी गई है, इन्हीं तीनों के बारे में है। यानी उद्गाता अकेला नहीं गाता; साम एक मिला-जुला, कई स्वरों वाला गान है।

लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत । पृथिवी हिङ्कारः । अग्निः प्रस्तावः । अन्तरिक्षमुद्गीथः । आदित्यः प्रतिहारः । द्यौर्निधनम् ॥

लोकों में पाँच प्रकार के साम की उपासना करनी चाहिए: पृथ्वी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव, अंतरिक्ष उद्गीथ, आदित्य प्रतिहार और द्युलोक निधन।

— छान्दोग्य उपनिषद्, शांकरभाष्य सहित — GRETIL e-text, पृष्ठ 2.2.1

उषस्ति चाक्रायण की कथा: भूखा विद्वान और यज्ञ के गायक

छान्दोग्य उपनिषद में सामवेद से जुड़ी एक बहुत मानवीय कथा है। कुरु देश में फ़सलें नष्ट हो गई थीं और अकाल पड़ा था। उस समय उषस्ति चाक्रायण नाम के एक विद्वान अपनी छोटी-सी पत्नी आटिकी के साथ एक धनी व्यक्ति के गाँव में बहुत दरिद्र दशा में रह रहे थे। भूख से व्याकुल होकर उन्होंने उस धनी व्यक्ति से भिक्षा माँगी, जो उस समय उड़द खा रहा था। उसने कहा कि मेरे पास इन जूठे उड़दों के सिवा कुछ नहीं। उषस्ति ने वही माँग लिए।

जब उस व्यक्ति ने साथ में पानी देना चाहा, तो उषस्ति ने मना कर दिया: "यह जूठा होगा।" उसने पूछा, "क्या उड़द जूठे नहीं थे?" उषस्ति ने उत्तर दिया: "उन्हें न खाता तो जीवित न रहता; पर पानी मुझे और जगह भी मिल सकता है।" यानी आपत्ति में धर्म का नियम ढीला होता है, पर उतना ही, जितना जीवन बचाने को ज़रूरी हो। बचे हुए उड़द वे पत्नी के लिए ले गए, पर पत्नी को पहले ही भिक्षा मिल चुकी थी, और उसने उन्हें रख लिया। अगली सुबह वही उड़द खाकर उषस्ति राजा के यज्ञ में पहुँचे।

यज्ञ में साम के गायक स्तुति शुरू करने वाले थे। उषस्ति ने प्रस्तोता, उद्गाता और प्रतिहर्ता, तीनों से एक-एक कर कहा: "जिस देवता से तुम्हारा भाग जुड़ा है, उसे जाने बिना गाओगे, तो तुम्हारा सिर गिर जाएगा।" तीनों चुप होकर बैठ गए। यजमान राजा ने पूछा कि आप कौन हैं, और जानकर सब ऋत्विजों का काम उन्हें सौंपना चाहा। उषस्ति ने कहा: "ये ही गाएँ, बस जितनी दक्षिणा इन्हें दो, उतनी मुझे भी देना।"

फिर तीनों गायक एक-एक कर उनके पास आए और पूछा कि वह देवता कौन है। उषस्ति ने बताया। प्रस्ताव का देवता प्राण है, क्योंकि सब प्राणी प्राण में ही लीन होते हैं और प्राण से ही उठते हैं। उद्गीथ का देवता आदित्य है, क्योंकि सब प्राणी ऊँचे पर स्थित सूर्य का ही गान करते हैं। और प्रतिहार का देवता अन्न है, क्योंकि सब प्राणी अन्न लेकर ही जीते हैं। कथा की सीख साफ़ है: केवल सुंदर गाना काफ़ी नहीं, जो गा रहे हो उसका अर्थ जानना चाहिए। और ज्ञान का सम्मान भूख और दरिद्रता के बीच भी बना रहता है।

देव, असुर और उद्गीथ: मुख्य प्राण की कथा

छान्दोग्य उपनिषद का दूसरा खंड उद्गीथ की महिमा एक कथा से समझाता है। प्रजापति की संतान देव और असुर आपस में लड़ रहे थे। देवताओं ने सोचा कि उद्गीथ के सहारे असुरों को हराएँगे। उन्होंने पहले नाक के प्राण, यानी सूँघने की शक्ति, को उद्गीथ मानकर उसकी उपासना की, पर असुरों ने उसे पाप से बेध दिया। इसी कारण नाक सुगंध भी सूँघती है और दुर्गंध भी।

फिर देवताओं ने वाणी की उपासना की, पर असुरों ने उसे भी पाप से बेध दिया, इसलिए वाणी सच भी बोलती है और झूठ भी। आँख के साथ भी यही हुआ, इसलिए वह देखने योग्य भी देखती है और न देखने योग्य भी; कान के साथ भी, इसलिए वह सुनने योग्य भी सुनता है और न सुनने योग्य भी; और मन के साथ भी, इसलिए वह अच्छे संकल्प भी करता है और बुरे भी।

अंत में देवताओं ने मुख में रहने वाले "मुख्य प्राण" की उपासना की। असुर उसे भी बेधने आए, पर वे ऐसे बिखर गए जैसे मिट्टी का ढेला पत्थर से टकराकर चूर हो जाता है। उपनिषद कहता है कि जो इसे जानता है, उसका बुरा चाहने वाला भी इसी तरह बिखर जाता है। कथा का अर्थ यह है कि इंद्रियाँ और मन अच्छे-बुरे दोनों में बँट जाते हैं, पर जीवन की मूल शक्ति, प्राण, शुद्ध रहती है, और सच्चा गान उसी से उठता है।

उद्गाता: साम गाने वाला ऋत्विज

यज्ञ के चार मुख्य ऋत्विजों में उद्गाता सामवेद का है। Griffith के शब्दों में सामवेद-संहिता के मंत्र मुख्य रूप से उन सोम-यज्ञों में उद्गाता पुरोहितों के गाने के लिए हैं, जिनमें सोम-लता का रस, छानकर और दूध आदि मिलाकर, अलग-अलग देवताओं को अर्पित किया जाता था। इसीलिए सामवेद का सबसे बड़ा भाग सोम पवमान से जुड़ा है।

उद्गाता का काम केवल अच्छा गाना नहीं था। हर साम का एक तय समय था, यज्ञ के एक तय क्षण पर, एक तय स्तोत्र के रूप में। गलत समय पर गलत साम गाना भूल मानी जाती थी। सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ, ख़ासकर पंचविंश ब्राह्मण, इन्हीं स्तोत्रों और यज्ञ में उनके स्थान की व्याख्या करते हैं। Macdonell बताते हैं कि यह ब्राह्मण, जैसा इसका नाम कहता है, पच्चीस भागों का है।

सामवेद की शाखाएँ: कौथुम, राणायनीय और जैमिनीय

Griffith के समय सामवेद की तीन शाखाएँ जानी जाती थीं: कौथुम, जो गुजरात में प्रचलित थी; जैमिनीय, कर्नाटक में; और राणायनीय, महाराष्ट्र में। Macdonell भी कौथुम और राणायनीय का उल्लेख करते हैं, और कहते हैं कि कौथुमों के बारे में कहा जाता है कि वे अब भी गुजरात में हैं। ये क्षेत्र उस समय की जानकारी हैं; आज इन परंपराओं के पाठी कहाँ-कहाँ हैं, यह अलग विषय है।

इस पृष्ठ की गिनती कौथुम संहिता की है। अंग्रेज़ी में सबसे पहले जो संस्करण छपे, वे राणायनीय पाठ के थे: Stevenson का अनुवाद (1842) और Benfey का संस्करण (1848)। आगे सत्यव्रत सामश्रमी ने 1874–78 में सायण के भाष्य और गान-ग्रंथों के अंशों के साथ संहिता छापी। Griffith ने अपना अनुवाद Benfey के पाठ पर किया।

जैमिनीय शाखा का महत्व उसके ब्राह्मण के कारण बहुत बड़ा है। Macdonell बताते हैं कि सामवेद की दो स्वतंत्र परंपराओं के ब्राह्मण बचे हैं: ताण्डियों के और तलवकारों, यानी जैमिनीयों के। जैमिनीय ब्राह्मण के चौथे भाग, "उपनिषद् ब्राह्मण", में ही छोटा-सा पर बहुत प्रसिद्ध केन उपनिषद है।

सामवेद के देवता: अग्नि, इंद्र और सोम

सामवेद के देवता वही हैं जो ऋग्वेद के, क्योंकि मंत्र वहीं से आए हैं। पर किन देवताओं को चुना गया, यह सामवेद की संरचना ही बता देती है। पूर्वार्चिक के तीन मुख्य काण्ड तीन देवताओं के हैं: अग्नि, इंद्र और सोम। सबसे बड़ा काण्ड इंद्र का है, 352 मंत्रों का; फिर सोम पवमान का, 119 का; और अग्नि का, 114 का।

यह चुनाव यज्ञ की ज़रूरत से आया। सोम-यज्ञ में सोम का रस छाना जाता था, अग्नि में अर्पित किया जाता था, और इंद्र उसके सबसे बड़े पान करने वाले माने जाते थे। इसलिए उद्गाता के गीतों में यही तीन छाए रहते हैं। सामवेद का पहला मंत्र ही अग्नि को बुलाता है, "अग्न आ याहि वीतये", और यह ऋग्वेद के छठे मंडल (6.16.10) का मंत्र है।

सामवेद और भारतीय संगीत: परंपरा क्या कहती है

अक्सर सुनने को मिलता है कि "सारा भारतीय शास्त्रीय संगीत सामवेद से निकला है।" इस बात को सावधानी से समझना ज़रूरी है। जो पक्का है, वह यह है कि सामवेद संसार की सबसे पुरानी जीवित गान-परंपराओं में से है, और परंपरा स्वयं संगीत को सामवेद से जोड़ती है। पर आज के राग, ताल और घरानों का सीधा इतिहास सामवेद से एक रेखा में जोड़ना इतिहास से सिद्ध नहीं है; बीच में हज़ारों साल की लंबी और जटिल यात्रा है।

परंपरा यह संबंध कैसे बताती है, इसका सबसे पुराना और साफ़ उदाहरण भरत का नाट्यशास्त्र है। उसके पहले अध्याय में कथा है कि ब्रह्मा ने सब लोगों के लिए "पाँचवाँ वेद", नाट्यवेद, बनाया, और उसके चार अंग चार वेदों से लिए: पाठ (संवाद) ऋग्वेद से, गीत सामों से, अभिनय यजुर्वेद से, और रस अथर्ववेद से। यानी नाट्य-परंपरा स्वयं मानती है कि उसका "गीत" सामवेद से आया। यह परंपरा का अपने बारे में कथन है, और इसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए।

एक और बात साफ़ दिखती है: सामवेद ने भारत को सिखाया कि शब्द और स्वर एक-दूसरे में मिलकर साधना बन सकते हैं। मंत्र को गाकर, स्वर के उतार-चढ़ाव में भाव भरकर, भगवान तक पहुँचाने का विचार आगे भजन, कीर्तन और संतों की पद-परंपरा तक दिखता है। सामवेद इस धारा का सबसे पुराना स्रोत है, चाहे बीच की हर कड़ी आज इतिहास से जोड़ी न जा सके।

जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च । यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥

(ब्रह्मा ने नाट्यवेद बनाते हुए) पाठ ऋग्वेद से लिया, गीत सामों से, अभिनय यजुर्वेद से और रस अथर्ववेद से।

— भरत, नाट्यशास्त्र — GRETIL e-text, नाट्यशास्त्र 1.17

छान्दोग्य उपनिषद: साम का सार, ॐ

सामवेद का सबसे बड़ा दार्शनिक उपहार छान्दोग्य उपनिषद है। Macdonell बताते हैं कि छान्दोग्य ब्राह्मण के अंतिम आठ भाग ही छान्दोग्य उपनिषद हैं। यह उपनिषद गान से ही शुरू होता है: "ॐ, इस अक्षर की उद्गीथ के रूप में उपासना करो, क्योंकि उद्गाता ॐ कहकर ही गाना शुरू करता है।" यानी साम-गान का पहला स्वर ही सबसे बड़ा तत्त्व बन जाता है।

फिर उपनिषद एक सुंदर सीढ़ी बनाता है, जिसमें हर चीज़ अपने से पहले वाली का "रस", यानी सार है। सब प्राणियों का सार पृथ्वी है, पृथ्वी का जल, जल का औषधियाँ, औषधियों का मनुष्य, मनुष्य का वाणी, वाणी का ऋचा, ऋचा का साम, और साम का सार उद्गीथ, यानी ॐ। यानी पूरे संसार का निचोड़ गान में है, और गान का निचोड़ ॐ में। सामवेद के उपासकों के लिए यह केवल दर्शन नहीं, उनकी साधना का केंद्र है।

छान्दोग्य उपनिषद का सबसे प्रसिद्ध उपदेश उसके छठे अध्याय में है। उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को, जो बारह वर्ष पढ़कर घमंड के साथ लौटा था, एक-एक उदाहरण से समझाते हैं: नमक पानी में घुलकर दिखता नहीं पर हर घूँट में है; बरगद के छोटे-से बीज के भीतर का "अणिमा" दिखता नहीं पर उसी से विशाल पेड़ बनता है। और हर उदाहरण के अंत में वे कहते हैं: "वही सूक्ष्म तत्त्व इस सबकी आत्मा है, वही सत्य है, वही आत्मा है; और श्वेतकेतु, तुम वही हो" (तत्त्वमसि)। भारत के सबसे बड़े दार्शनिक वाक्यों में से एक, सामवेद की परंपरा का फल है।

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति । तस्योपव्याख्यानम् ॥

ॐ, इस अक्षर की उद्गीथ के रूप में उपासना करनी चाहिए, क्योंकि उद्गाता "ॐ" कहकर ही गाना शुरू करता है। आगे इसी की व्याख्या है।

— छान्दोग्य उपनिषद्, शांकरभाष्य सहित — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.1.1
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वम् । तत्सत्यम् । स आत्मा । तत्त्वमसि श्वेतकेतो ॥

वह जो यह सूक्ष्म तत्त्व (अणिमा) है, यह सब उसी का स्वरूप है। वही सत्य है, वही आत्मा है; और श्वेतकेतु, तुम वही हो।

— छान्दोग्य उपनिषद्, शांकरभाष्य सहित — GRETIL e-text, पृष्ठ 6.8.7
एषां भूतानां पृथिवी रसः । पृथिव्या आपो रसः । अपामोषधयो रसः । ओषधीनां पुरुषो रसः । पुरुषस्य वाग्रसः । वाच ऋग्रसः । ऋचः साम रसः । साम्न उद्गीथो रसः ॥

इन सब प्राणियों का सार पृथ्वी है, पृथ्वी का सार जल, जल का औषधियाँ, औषधियों का मनुष्य, मनुष्य का वाणी, वाणी का ऋचा, ऋचा का साम, और साम का सार उद्गीथ (ॐ) है।

— छान्दोग्य उपनिषद्, शांकरभाष्य सहित — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.1.2

सत्यकाम जाबाल: सत्य ही पहचान है

छान्दोग्य उपनिषद की एक और कथा सामवेद की परंपरा को बहुत मानवीय रूप देती है। बालक सत्यकाम ने अपनी माँ जबाला से कहा: "मैं गुरु के पास ब्रह्मचर्य के लिए जाना चाहता हूँ, मेरा गोत्र क्या है?" माँ ने सच-सच कहा: "बेटा, मैं नहीं जानती। युवावस्था में मैं बहुत घरों में सेवा करती थी, तभी तुम मुझे मिले। मेरा नाम जबाला है, तुम्हारा सत्यकाम; तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहना।"

सत्यकाम गौतम हारिद्रुमत के पास गए। गुरु ने गोत्र पूछा, तो सत्यकाम ने माँ की कही हर बात बिना कुछ छिपाए दोहरा दी। गौतम बोले: "ऐसा सच कोई ब्राह्मण ही बोल सकता है। समिधा ले आओ, मैं तुम्हारा उपनयन करूँगा, क्योंकि तुम सत्य से नहीं डिगे।" उपनयन के बाद गुरु ने उन्हें चार सौ दुबली, कमज़ोर गायें सौंपीं, और सत्यकाम ने कहा कि जब तक ये हज़ार न हो जाएँ, लौटूँगा नहीं। वे बरसों वन में रहे। जब गायें हज़ार हुईं, तो वन में ही पहले एक बैल ने, फिर अग्नि ने, और फिर पक्षियों ने उन्हें एक-एक करके ब्रह्म के चार-चार कलाओं वाले चार "पाद" बताए: चारों दिशाएँ; पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक और समुद्र; अग्नि, सूर्य, चंद्र और बिजली; और प्राण, आँख, कान और मन। लौटने पर गुरु ने कहा: "तुम ब्रह्मज्ञानी जैसे चमक रहे हो, तुम्हें किसने सिखाया?" सत्यकाम ने कहा: "मनुष्यों के सिवा दूसरों ने; पर आप ही मुझे बताइए, क्योंकि गुरु से पाई विद्या ही सबसे अच्छा फल देती है।"

इस कथा का संदेश सीधा और साहसी है: परंपरा ने व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके सत्य से मानी। गुरु ने गोत्र न होने को नहीं, सच बोलने को देखा। सामवेद के उपनिषद में यह कथा बताती है कि वैदिक परंपरा के भीतर ही वह उदार विचार था जो आगे संतों की वाणी में बार-बार गूँजा।

केन उपनिषद: "किसकी प्रेरणा से?"

सामवेद का दूसरा उपनिषद केन है, जो जैमिनीय (तलवकार) शाखा के उपनिषद् ब्राह्मण के भीतर है। इसका नाम इसके पहले शब्द "केन", यानी "किसके द्वारा", से पड़ा। उपनिषद पूछता है: मन किसकी प्रेरणा से चलता है, प्राण किसकी प्रेरणा से चलते हैं, वाणी किसकी प्रेरणा से बोलती है? और उत्तर देता है: जो मन से नहीं सोचता, पर जिससे मन सोचता है; जो आँख से नहीं देखता, पर जिससे आँख देखती है; वही ब्रह्म है, "न कि वह जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं"। दूसरा खंड और भी गहरा है: जो कहे कि मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ, वह बहुत कम जानता है।

केन उपनिषद में एक सुंदर कथा भी है। देवताओं ने असुरों पर विजय पाई और उसे अपना पराक्रम समझ बैठे। तब ब्रह्म एक यक्ष के रूप में उनके सामने प्रकट हुआ। अग्नि उसे जानने गए, पर वह उनके सामने रखा एक तिनका भी नहीं जला सके; वायु उसे उड़ा नहीं सके। अंत में इंद्र स्वयं गए, तो यक्ष ओझल हो गया, और उसी आकाश में उमा हैमवती प्रकट हुईं। उन्होंने इंद्र को बताया कि वह ब्रह्म था, और विजय उसी की थी। अहंकार टूटे बिना ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता, यही इस कथा का सार है। Max Müller बताते हैं कि यह तीसरा खंड आमतौर पर बाद में जोड़ा गया माना जाता है, हालाँकि उसकी गद्य-शैली ब्राह्मणों जैसी पुरानी है।

सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ

सामवेद के ब्राह्मण दो स्वतंत्र परंपराओं के बचे हैं। ताण्डियों का "पंचविंश ब्राह्मण" सबसे प्रसिद्ध है; Macdonell बताते हैं कि इसे ताण्ड्य या प्रौढ ब्राह्मण भी कहते हैं, और जैसा इसका नाम कहता है, यह पच्चीस भागों का है। इसमें सोम-यज्ञ के स्तोत्रों और सामों के प्रयोग की विधि है। उसी परंपरा का दूसरा "छान्दोग्य ब्राह्मण" है, जो यज्ञ-विधि का ग्रंथ थोड़ा ही है, और जिसके अंतिम आठ भाग छान्दोग्य उपनिषद हैं।

तलवकारों, यानी जैमिनीयों का ब्राह्मण पाँच भागों का बताया जाता है। उसके पहले तीन भाग यज्ञ-कर्म के अलग-अलग अंगों पर हैं, और चौथा भाग "उपनिषद् ब्राह्मण" है, जिसमें आरण्यक जैसे रूपक, आचार्यों की दो सूचियाँ, प्राण की उत्पत्ति, सावित्री मंत्र की चर्चा और केन उपनिषद हैं। Macdonell सामवेद के कुछ और छोटे ग्रंथों को भी "ब्राह्मण" नाम से जाना जाने वाला बताते हैं, पर उनके अनुसार असल में ब्राह्मण कहलाने योग्य तीन ही हैं।

सामवेद से जुड़ा साहित्य
स्तरग्रंथशाखाक्या हैस्रोत
संहितासामवेद-संहिताकौथुम / राणायनीयपूर्वार्चिक + उत्तरार्चिक, 1,875 मंत्र (कौथुम)सामवेद संहिता (मूल संस्कृत, कौथुम), स्वयं गिनती
गानग्रामगेय, आरण्यक, ऊह, ऊह्यकौथुम-राणायनीयमंत्र को साम में बदलने के नियमसामवेद (Griffith अनु.), Preface, pp. iii–iv
ब्राह्मणपंचविंश (ताण्ड्य)ताण्डी25 भाग; सोम-यज्ञ के स्तोत्रMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
ब्राह्मण + उपनिषदछान्दोग्य ब्राह्मणताण्डीअंतिम 8 भाग = छान्दोग्य उपनिषदMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII
ब्राह्मण + उपनिषदजैमिनीय (तलवकार) ब्राह्मणजैमिनीय5 भाग; चौथा उपनिषद् ब्राह्मण, उसमें केन उपनिषदMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VIII

सामवेद की आध्यात्मिक शिक्षाएँ

पहली शिक्षा यह है कि भक्ति का सबसे ऊँचा रूप गान है। सामवेद में शब्द वही हैं जो ऋग्वेद में, पर उन्हें स्वर में ढाल देने से वे एक अलग अनुभव बन जाते हैं। छान्दोग्य के अनुसार ऋचा का सार साम है। भजन और कीर्तन की पूरी परंपरा इसी भाव पर टिकी है कि गाया हुआ नाम मन को वहाँ ले जाता है जहाँ बोला हुआ नहीं ले जा पाता।

दूसरी शिक्षा ॐ की है। सामवेद ॐ को उद्गीथ, यानी गान का आरंभ और सार, मानता है। आज हर मंत्र, हर पूजा और हर ध्यान ॐ से शुरू होता है, और इस अभ्यास की सबसे पुरानी दार्शनिक व्याख्या सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद में है।

तीसरी शिक्षा विनम्रता की है, जो केन उपनिषद देता है: बड़ी से बड़ी शक्ति भी अपनी नहीं, उस ब्रह्म की है जो सबको प्रेरित करता है। और चौथी, अनुशासन की: साम को सही समय, सही स्वर और सही क्रम में गाने का कठोर नियम बताता है कि सुंदरता और साधना, दोनों के लिए लगन और नियम चाहिए।

सामवेद का सांस्कृतिक महत्व और आज की परंपरा

सामवेद की परंपरा आज भी जीवित है, और इसी कारण वह इतनी अनमोल है। साम-गान किसी किताब से नहीं सीखा जा सकता; उसकी धुनें, स्तोभ और स्वर-लहरियाँ केवल गुरु से शिष्य तक, सुनकर और दोहराकर, पहुँचती हैं। UNESCO ने "वैदिक पाठ की परंपरा" को मानवता की अमूर्त धरोहर माना है, और साम-गान उसी मौखिक परंपरा की सबसे संगीतमय धारा है।

सामवेद ने भारत की धार्मिक कल्पना को भी गहरा रंग दिया। गीता में "वेदानां सामवेदोऽस्मि" कहकर भगवान ने गान के वेद को अपना रूप बताया। नाट्यशास्त्र ने अपने गीत की जड़ सामों में बताई। और छान्दोग्य उपनिषद, जिसे वेदांत के सबसे बड़े उपनिषदों में गिना जाता है, सामवेद की परंपरा से आया। एक छोटा-सा वेद, जिसके लगभग सारे मंत्र किसी और वेद के हैं, भारतीय संस्कृति पर इतनी गहरी छाप छोड़ गया: यह गान की शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

आगे पढ़ें

  • ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
  • यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
  • अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
  • वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
  • वेद-पाठ की परंपरा — संहिता, पद, क्रम, जटा और घन पाठ; उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर; शिक्षा, प्रातिशाख्य और अनुक्रमणियाँ: स्मृति की रक्षा का एक पूरा विज्ञान
  • यज्ञ की परंपरा — तीन अग्नियों वाले बड़े श्रौत यज्ञ और घर की एक अग्नि वाले गृह्य संस्कार: सोलह ऋत्विज, चौदह श्रौत यज्ञ, चालीस संस्कार और पाँच महायज्ञ
  • वेद-विभाजन — व्यास ने सामवेद जैमिनि को कैसे सौंपा
  • महर्षि उद्दालक — छान्दोग्य उपनिषद के "तत्त्वमसि" के आचार्य
  • वेद व्यास — चार वेदों के विभाजक

स्रोत एवं संदर्भ

सामवेद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न