महर्षि उद्दालक आरुणि

गुरु की आज्ञा पर खेत की मेड़ बनकर लेटने वाले शिष्य, और उपनिषदों के आचार्य

संक्षेप में

गुरु ने कहा — "खेत की मेड़ टूट गई है, पानी रोको।" शिष्य से पानी नहीं रुका, तो वह खुद टूटी मेड़ में लेट गया। गुरु की पुकार पर उठा, तो गुरु ने उसे नया नाम दिया — उद्दालक। आगे वही उपनिषदों के बड़े आचार्य बने, और याज्ञवल्क्य के गुरु।

महाभारत के ऋषिज्ञान और दर्शन-परंपरा

एक नज़र में

महर्षि उद्दालक आरुणि — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीमहाभारत के ऋषि, ज्ञान और दर्शन-परंपरामहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III; वन पर्व, Section CXXXII; बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 3.7; 6.2; 6.3.7 (SBE 15)
शिष्यमहर्षि याज्ञवल्क्यबृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 6.3.7 (SBE 15, p. 213); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 6.5.3 (SBE 15, p. 226)
नाती (पुत्री का पुत्र)महर्षि अष्टावक्रमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXXII
समकालीन / प्रसंग में साथमहर्षि उपमन्युमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section III

नाम और अर्थ

"उद्दालक" का अर्थ महाभारत स्वयं बताता है — मेड़ "खोलकर" उठने वाला। गुरु ने यह नाम कृपा के चिह्न के रूप में दिया।

"आरुणि" यानी अरुण का वंशज। बृहदारण्यक की वंश-सूची में लिखा है — "उद्दालक ने अरुण से (विद्या पाई)।"

बृहदारण्यक उन्हें गोत्र के नाम "गौतम" से भी पुकारता है। राजा जैवलि उन्हें इसी नाम से संबोधित करते हैं।

जीवन और पृष्ठभूमि

शिष्य जो मेड़ बन गया

महाभारत के आदि पर्व में ऋषि आयोद-धौम्य के तीन शिष्य बताए गए हैं — उपमन्यु, आरुणि और वेद।

गुरु ने पाञ्चाल देश के आरुणि को भेजा — "खेत की नाली की मेड़ टूट गई है। जाकर पानी रोको।"

आरुणि ने बहुत कोशिश की, पर साधारण उपाय से पानी नहीं रुका। गुरु की आज्ञा पूरी न होने से वे दुखी हुए।

फिर उन्हें एक उपाय सूझा। वे खुद टूटी मेड़ में लेट गए, और पानी रुक गया।

कुछ समय बाद गुरु ने पूछा — "आरुणि कहाँ है?" शिष्यों ने याद दिलाया कि आपने ही उसे मेड़ पर भेजा था।

गुरु वहाँ पहुँचे और पुकारा — "अरे पाञ्चाल के आरुणि, कहाँ हो? आओ, बेटा!" आवाज़ सुनते ही आरुणि मेड़ से उठकर सामने खड़े हो गए।

उन्होंने कहा — "दूसरा उपाय नहीं सूझा, तो मैं खुद लेट गया। आपकी आवाज़ सुनकर उठा हूँ, तो पानी फिर बह गया। अब बताइए, क्या करूँ?"

गुरु बोले — "तुम मेड़ खोलकर उठे, इसलिए तुम्हारा नाम उद्दालक होगा। सारे वेद और धर्मशास्त्र तुममें प्रकाशित होंगे।"

ग्रंथ स्वयं यह नहीं जोड़ता कि आदि पर्व के यही शिष्य उपनिषदों के उद्दालक आरुणि हैं। पर नाम "आरुणि" और "उद्दालक" दोनों जगह एक हैं।

परिवार: श्वेतकेतु, सुजाता और अष्टावक्र

उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु थे। उपनिषद उन्हें "श्वेतकेतु आरुणेय" कहता है, यानी आरुणि के पुत्र।

उद्दालक के शिष्य कहोड थे। प्रसन्न होकर उद्दालक ने उन्हें अपनी पुत्री सुजाता ब्याह दी। सुजाता के पुत्र थे अष्टावक्र।

कहोड शास्त्रार्थ में हारकर नहीं लौटे। इसलिए अष्टावक्र नाना उद्दालक को ही पिता मानते हुए बड़े हुए। यह पूरी कथा अष्टावक्र के पृष्ठ पर है।

महाभारत के अनुसार श्वेतकेतु और अष्टावक्र — मामा और भांजा — अपने समय के सबसे बड़े वेदज्ञ थे।

प्रमुख कथाएँ

राजा के शिष्य बने गुरु

श्वेतकेतु एक दिन पाञ्चालों की सभा में गए। वहाँ राजा प्रवाहण जैवलि ने पूछा — "क्या पिता ने तुम्हें पढ़ाया है?" श्वेतकेतु बोले — "हाँ।"

राजा ने पाँच प्रश्न पूछे। मरकर लोग कहाँ जाते हैं? कैसे लौटते हैं? वह लोक भरता क्यों नहीं? देवों और पितरों के मार्ग कैसे मिलते हैं?

श्वेतकेतु एक का भी उत्तर नहीं दे पाए। राजा ने ठहरने को कहा, पर वे भागकर पिता के पास पहुँचे।

उन्होंने शिकायत की — "आपने तो कहा था कि मैं पढ़-लिख गया हूँ! उस क्षत्रिय ने पाँच प्रश्न पूछे, और मैं एक भी नहीं जानता था।"

पिता ने सहज भाव से कहा — "बेटा, जो मैं जानता था, सब तुम्हें बता दिया। चलो, हम दोनों उनके पास शिष्य बनकर रहें।" श्वेतकेतु ने मना कर दिया।

तब उद्दालक अकेले राजा के पास गए। राजा ने आसन, जल और सत्कार देकर कहा — "कोई वरदान माँगिए।"

उद्दालक बोले — "धन, गायें और घोड़े मेरे पास बहुत हैं। मुझे वही बात बताइए, जो आपने मेरे बेटे से कही थी।"

राजा ने पूछा — "क्या आप विधि से, शिष्य बनकर आए हैं?" उद्दालक ने कहा — "मैं शिष्य बनकर आया हूँ।"

उपनिषद ध्यान दिलाता है कि पहले के ब्राह्मण ऐसा केवल कहते थे। पर उद्दालक सचमुच शिष्य बनकर रहे।

राजा ने कहा — "यह विद्या अब तक किसी ब्राह्मण के पास नहीं रही। पर जो आप जैसे माँगे, उसे कौन मना करेगा?"

फिर राजा ने पाँच अग्नियों की विद्या सिखाई। उसमें स्वर्ग, बादल, धरती, पुरुष और स्त्री को यज्ञ की अग्नि माना गया है।

अंत में दो मार्ग बताए। जो ज्ञानी हैं, वे प्रकाश के मार्ग से जाते हैं, और लौटते नहीं। जो केवल यज्ञ-दान करते हैं, वे पितरों के मार्ग से लौट आते हैं।

ग्रंथों में अंतर

अनुवादक की टिप्पणी के अनुसार टीकाकार इस शिष्यता को केवल नाम की मानते हैं। Max Müller मूल पाठ के अनुसार कहते हैं कि उद्दालक सचमुच शिष्य बनकर रहे।

जनक की सभा में याज्ञवल्क्य से प्रश्न

राजा जनक की सभा में उद्दालक ने अपने शिष्य याज्ञवल्क्य से ही प्रश्न पूछा। उन्होंने वह "सूत्र" पूछा, जिसमें सारे लोक बँधे हैं।

उत्तर था — भीतर से सबको चलाने वाला अन्तर्यामी आत्मा। यह सुनकर उद्दालक चुप हो गए। पूरी कथा "जनक की सभा" गाथा में है।

पूरी गाथा पढ़ें: जनक की सभा: याज्ञवल्क्य, गार्गी और हज़ार गायें →

श्वेतकेतु का क्रोध, और विवाह की मर्यादा

महाभारत में पाण्डु, कुन्ती को एक पुरानी कथा सुनाते हैं। एक दिन एक ब्राह्मण श्वेतकेतु की माँ का हाथ पकड़कर ले जाने लगा।

श्वेतकेतु क्रोध से भर गए। उद्दालक ने कहा — "क्रोध मत करो, बेटा। यही पुरानी रीति है।"

पर श्वेतकेतु को यह रीति स्वीकार नहीं थी। उन्होंने नियम बनाया कि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहें। महाभारत कहता है कि यह मर्यादा तभी से चली।

शिक्षाएँ

आदि पर्व की कथा गुरु-आज्ञा की सीख देती है। आरुणि ने उपाय न मिलने पर हार नहीं मानी, और खुद को ही उपाय बना दिया।

बृहदारण्यक की कथा दूसरी सीख देती है। बड़े आचार्य होकर भी उद्दालक ने कहा — "जो जानता था, बता दिया।" फिर सीखने के लिए राजा के शिष्य बने।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंयाज्ञवल्क्य के गुरु। बृहदारण्यक की वंश-सूची में याज्ञवल्क्य ने विद्या उद्दालक से पाई, और उद्दालक ने अरुण से।

ग्रंथ मेंमन्थ-विद्या (एक यज्ञ-विधि) उन्होंने याज्ञवल्क्य को सिखाई। उन्होंने कहा — "इसे सूखी लकड़ी पर डालो, तो उसमें भी डालियाँ और पत्ते फूट आएँ।"

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स्रोत

महर्षि उद्दालक आरुणि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न