यह कथा क्यों सुनाई गई
युद्ध से पहले कौरवों की सभा में नारद ने दुर्योधन को समझाया — "मित्रों की बात सुननी चाहिए। हठ नहीं करना चाहिए, हठ बहुत कठोर फल देता है।"
उदाहरण में उन्होंने गालव की कथा सुनाई, जिन्हें हठ के कारण पराजय मिली।
सौ वर्ष की सेवा
एक बार धर्म, वसिष्ठ का रूप धरकर, विश्वामित्र की परीक्षा लेने आए। वे भूखे होने का अभिनय कर रहे थे।
विश्वामित्र आदर से खीर (चरु) पकाने लगे। पर जब तक खीर बनी, अतिथि दूसरे आश्रमवासियों का भोजन कर चुके थे।
अतिथि बोले — "मैं खा चुका, यहीं ठहरो।" और चले गए। विश्वामित्र गर्म खीर सिर पर रखे, केवल हवा पीकर, खंभे की तरह खड़े रहे।
उस समय गालव नाम के तपस्वी ने आदर और प्रेम से उनकी सेवा की।
सौ वर्ष बाद धर्म फिर आए, और वही खीर खाई। बोले — "मैं प्रसन्न हूँ।" महाभारत के अनुसार इससे विश्वामित्र क्षत्रियत्व छोड़कर ब्राह्मण-पद पा गए।
"जाओ, जाओ" — और शिष्य का हठ
विश्वामित्र गालव की सेवा से प्रसन्न थे। बोले — "मेरी अनुमति है, जहाँ चाहो जाओ।"
गालव ने मधुर स्वर में पूछा — "गुरु-दक्षिणा में क्या दूँ? दक्षिणा से ही कर्म सफल होता है।"
विश्वामित्र जानते थे कि गालव ने सेवा से उन्हें जीत लिया है, और उसके पास कुछ नहीं है। इसलिए बार-बार बोले — "जाओ, जाओ।"
पर गालव बार-बार यही पूछते रहे — "क्या दूँ?" इस हठ पर विश्वामित्र को थोड़ा क्रोध आ गया।
उन्होंने कहा — "चंद्रमा जैसे सफ़ेद आठ सौ घोड़े दो, जिनका एक-एक कान काला हो। जाओ गालव, देर मत करो।"
निराशा, और मित्र गरुड़
गालव की नींद, भूख और चैन चला गया। वे सूखकर काँटा हो गए। सोचते — "न धन है, न धनी मित्र। आठ सौ ऐसे घोड़े कहाँ से लाऊँ?"
उन्होंने यहाँ तक सोचा कि जो उपकार का बदला न चुका सके, उसके लिए जीने से मरना अच्छा है।
तभी उनके मित्र गरुड़ प्रकट हुए — "मित्र की इच्छा पूरी करना मित्र का धर्म है। चलो, मैं तुम्हें धरती के किसी भी छोर तक ले चलूँ।"
गरुड़ ने चारों दिशाओं का विस्तार से वर्णन किया। गालव पूर्व की ओर चले, पर गरुड़ की गति इतनी तेज़ थी कि वे घबरा गए।
गरुड़ हँसे — "मरने की बात करना नासमझी है। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? इसके अच्छे उपाय हैं।"
तपस्विनी शाण्डिली
ऋषभ पर्वत पर दोनों को शाण्डिली नाम की एक ब्राह्मण तपस्विनी मिलीं। उन्होंने भोजन दिया, और दोनों सो गए।
जागे, तो गरुड़ के पंख झड़ चुके थे। गरुड़ ने माना — "मैंने सोचा था कि इन्हें यहाँ से उठाकर देवताओं के लोक में ले चलूँ।"
शाण्डिली ने कहा — "मेरी इच्छा के बिना ऐसा सोचना मेरा अनादर था। आचरण की शुद्धता से ही सिद्धि मिलती है। किसी स्त्री का अनादर मत करना।" और गरुड़ के पंख लौट आए।
रास्ते में विश्वामित्र मिले — "दक्षिणा का समय आ गया है। मैंने बहुत प्रतीक्षा की, थोड़ी और कर लूँगा।"
राजा ययाति, और राजकुमारी माधवी
गरुड़ गालव को अपने मित्र राजा ययाति के पास ले गए। ययाति ने कहा — "अब मेरे पास पहले जैसा धन नहीं। पर याचक को खाली नहीं लौटाऊँगा।"
उन्होंने अपनी पुत्री माधवी गालव को दे दी — "राजा इसके लिए राज्य तक दे देंगे। मेरी बस इतनी इच्छा है कि इससे मुझे नाती मिले।"
गालव माधवी को लेकर अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास गए। हर्यश्व के पास ऐसे केवल दो सौ घोड़े थे। वे माधवी से एक पुत्र चाहते थे।
तब माधवी ने स्वयं एक उपाय बताया — "एक ब्रह्मवादी ने मुझे वर दिया है कि हर प्रसव के बाद मैं फिर कन्या हो जाऊँगी।"
"इसलिए मुझे चार राजाओं को दो सौ-दो सौ घोड़ों पर दो। तुम्हें आठ सौ पूरे मिलेंगे, और मुझे चार पुत्र। निर्णय तुम्हारा है।"
चार राजा, चार पुत्र
हर्यश्व से माधवी के पुत्र वसुमना हुए, जो बड़े दानी राजा बने। फिर माधवी राजसी वैभव छोड़कर, फिर कन्या बनकर, गालव के पीछे चल पड़ीं।
काशी के राजा दिवोदास से उनके पुत्र प्रतर्दन हुए, जो वीर राजा बने।
भोज-नगर के राजा उशीनर से उनके पुत्र शिबि हुए, जो सत्य और धर्म के लिए प्रसिद्ध हुए।
गरुड़ ने बताया कि ऐसे घोड़े धरती पर कुल एक हज़ार ही थे। चार सौ नदी पार करते हुए वितस्ता में बह गए। अब और नहीं मिल सकते।
गालव छह सौ घोड़े और माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास गए — "बाकी दो सौ के बदले यह कन्या स्वीकार करें।"
विश्वामित्र बोले — "यह पहले क्यों नहीं दी? चारों पुत्र मेरे होते।" माधवी से उनके पुत्र अष्टक हुए। उन्होंने छह सौ घोड़े अष्टक को दे दिए, और वन चले गए।
गालव ने माधवी से कहा — "तुम्हारे पुत्रों ने तुम्हारे पिता, चार राजाओं और मुझे भी तार दिया।" फिर उन्हें पिता के पास लौटाकर स्वयं वन चले गए।
माधवी का अपना निर्णय
ययाति ने गंगा-यमुना के संगम के आश्रम में माधवी का स्वयंवर रचा। नाग, यक्ष, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषि सब आए।
माधवी ने सब वरों को छोड़ दिया, और वन को अपना पति चुना।
वे रथ से उतरीं, सबको प्रणाम किया, और पवित्र वन में तप करने लगीं। हिरनी की तरह घास और झरनों के जल पर जीते हुए उन्होंने बहुत पुण्य कमाया।
ययाति का पतन, और नातियों का पुण्य
हज़ारों वर्ष बाद स्वर्ग में ययाति के मन में घमंड आया, और उन्होंने देवताओं और ऋषियों को मन-ही-मन तुच्छ समझा।
तभी स्वर्ग में कोई उन्हें पहचान न सका। उनका तेज चला गया, और वे धरती की ओर गिरने लगे।
वे वहीं आकर गिरे, जहाँ माधवी के चारों पुत्र यज्ञ कर रहे थे। चारों ने अपना-अपना पुण्य नाना को देना चाहा।
तभी हिरनी की तरह वन में विचरती माधवी वहाँ आईं — "मैं तुम्हारी पुत्री माधवी हूँ। मेरे तप का आधा पुण्य लो।"
गालव भी आए — "मेरे तप का आठवाँ भाग लेकर स्वर्ग लौटिए।" बेटी, नातियों और गालव के पुण्य से ययाति फिर स्वर्ग पहुँचे।
नारद ने कथा समेटी — "ययाति घमंड से गिरे, और गालव हठ से दुखी हुए। हठ नहीं करना चाहिए, हठ से क्षय होता है।"
| पिता | पुत्र | महाभारत में पहचान | स्रोत |
|---|---|---|---|
| हर्यश्व (अयोध्या) | वसुमना | सबसे धनी, बड़ा दानी | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.114.17; महाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CXVI |
| दिवोदास (काशी) | प्रतर्दन | वीर | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.115.15; महाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CXVII |
| उशीनर (भोज) | शिबि | सत्य और धर्म में दृढ़ | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.116.20; महाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CXVIII |
| विश्वामित्र | अष्टक | बड़े यज्ञ करने वाले | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.117.17; महाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CXIX |
