महर्षि अत्रि

बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक

संक्षेप में

ऋग्वेद कहता है कि जब असुर स्वर्भानु ने सूर्य को अंधकार से ढक दिया, तो सारे प्राणी भटक गए। तब महर्षि अत्रि ने अपनी प्रार्थना से सूर्य को फिर खोज निकाला। उनकी पत्नी अनसूया का तप भी उतना ही महान था। वनवास में राम और सीता उनके आश्रम गए, और अनसूया ने सीता को माँ जैसा स्नेह दिया।

गोत्रकार ऋषिसप्तर्षिमंत्रद्रष्टा ऋषि

एक नज़र में

महर्षि अत्रि — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीगोत्रकार ऋषि, सप्तर्षि, मंत्रद्रष्टा ऋषिगोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 136 (archive.org leaf 176); विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 1 (vol. 3, p. 13); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 2.2.4 (SBE 15, p. 106); सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 19 (मण्डल 5 का आरंभ)
पुत्रमहर्षि दुर्वासारामायण, उत्तर काण्ड (Dutt अनु.), Section CXVIII; मार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Canto XVII (p. 99)
आश्रम और स्थानअत्रि-आश्रम (चित्रकूट के बाद)वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अयोध्या काण्ड 2.109.1–5; 2.111.16–20; रामायण (Griffith अनु.), अयोध्या काण्ड, Canto CXVII–CXIX

जीवन और पृष्ठभूमि

ब्रह्मा के पुत्र, और अनसूया के पति

महाभारत और मार्कण्डेय पुराण, दोनों अत्रि को ब्रह्मा का पुत्र कहते हैं। विष्णु पुराण उन्हें सप्तर्षियों में गिनता है।

उनकी पत्नी अनसूया थीं। "अनसूया" का अर्थ है — जिसके मन में किसी के लिए ईर्ष्या (असूया) न हो। रामायण में अत्रि स्वयं उन्हें "कभी क्रोध न करने वाली" बताते हैं।

ऋग्वेद का पाँचवाँ मण्डल अत्रि-परिवार का है। सर्वानुक्रमणी के अनुसार इस मण्डल में जहाँ ऋषि का गोत्र न कहा हो, वहाँ "आत्रेय" समझना चाहिए।

ग्रंथों में

  • "नमोऽत्रिभ्यो भौमोऽत्रिः पञ्चमे मण्डलेऽनुक्तगोत्रमात्रेयं विद्यात्" — पाँचवें मण्डल में जहाँ गोत्र न कहा हो, वहाँ आत्रेय समझें।
  • श्यावाश्व गण का प्रवर आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्व है, और उसमें 167 नाम हैं।
  • मत्स्य पुराण के अनुसार पुत्रिकापुत्र समूह अत्रि की पुत्री के पुत्रों का है।

प्रमुख कथाएँ

अंधकार में छिपे सूर्य की खोज

ऋग्वेद के एक सूक्त में सूर्य से कहा गया है — "जब असुर स्वर्भानु ने तुम्हें अंधकार से बेध दिया, तो सारे प्राणी भटके हुए-से दिखे। जैसे किसी को पता न हो कि वह कहाँ खड़ा है।"

तब अत्रि ने अपनी चौथी प्रार्थना से अंधकार में छिपे सूर्य को खोज निकाला। उन्होंने आकाश में सूर्य की आँख फिर से स्थापित की, और स्वर्भानु की माया मिटा दी।

सूक्त कहता है — "अत्रियों ने सूर्य को फिर पा लिया। यह और कोई नहीं कर सका।" Griffith के अनुसार यह सूर्य-ग्रहण की बात है, और स्वर्भानु को ही बाद के ग्रंथों में राहु कहा गया।

राम-सीता का आतिथ्य, और माता अनसूया

चित्रकूट छोड़कर राम, सीता और लक्ष्मण अत्रि के आश्रम पहुँचे। अत्रि ने राम का ऐसे स्वागत किया, जैसे पिता अपने बेटे का करता है।

फिर अत्रि ने अनसूया का परिचय दिया — "एक बार दस वर्ष तक बारिश नहीं हुई, और धरती जल उठी। तब इन्होंने अपने तप से फल-मूल उगाए, और यहाँ गंगा की धारा बहाई।"

"इन्होंने दस हज़ार वर्ष कठोर तप किया। देवताओं के काम के लिए इन्होंने दस रातों को एक रात बना दिया। हे राम, ये तुम्हारे लिए माँ जैसी हैं।"

बूढ़ी अनसूया का शरीर हवा में केले के पत्ते-सा काँपता था। सीता ने उन्हें प्रणाम किया। अनसूया ने सीता की प्रशंसा की कि उन्होंने राज-सुख छोड़कर पति का साथ चुना।

फिर अनसूया ने सीता को दिव्य वस्त्र, गहने, माला और कभी न मिटने वाला सुगंधित लेप दिया। सीता ने उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाई।

जब दस रात तक सूर्य नहीं उगा

मार्कण्डेय पुराण यह कथा बताता है। ऋषि माण्डव्य ने क्रोध में एक ब्राह्मण को शाप दिया — "सूर्योदय होते ही तुम मर जाओगे।" उसकी पतिव्रता पत्नी ने कहा — "तो सूर्य उगेगा ही नहीं।"

और सच में सूर्य नहीं उगा। लगातार रात रही, यज्ञ और सारे काम रुक गए। देवता घबरा गए। तब ब्रह्मा ने कहा — "तप को तप ही जीत सकता है। अत्रि की पत्नी अनसूया के पास जाओ।"

अनसूया ने कहा — "पतिव्रता की शक्ति व्यर्थ नहीं होनी चाहिए। मैं उसका सम्मान रखते हुए दिन लौटाऊँगी, और उसके पति को भी मरने नहीं दूँगी।"

अनसूया उस स्त्री के पास गईं और उसे प्रेम से समझाया। उसकी हाँ मिलने पर दसवीं रात को अनसूया ने सूर्य को अर्घ्य दिया, और सूर्य उग आया। शाप से ब्राह्मण गिर पड़ा, पर अनसूया ने उसे फिर से जीवित और स्वस्थ कर दिया।

प्रसन्न देवताओं ने वरदान माँगने को कहा। अनसूया ने माँगा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनके पुत्र बनें। इसी से सोम (ब्रह्मा का अंश), दत्तात्रेय (विष्णु का अंश) और दुर्वासा (शिव का अंश) उनके पुत्र हुए।

राजा वैन्य के यज्ञ में बहस

महाभारत में मार्कण्डेय यह कथा सुनाते हैं। अत्रि वन जाना चाहते थे, पर पत्नी ने कहा — "पहले राजा वैन्य से धन माँग लाइए, ताकि बेटों और सेवकों का प्रबंध हो जाए।"

यज्ञ में अत्रि ने राजा की प्रशंसा की — "राजा, आप ही राजाओं में श्रेष्ठ हैं।" ऋषि गौतम ने टोका — "सबसे श्रेष्ठ तो इन्द्र हैं। तुम चापलूसी कर रहे हो।" दोनों में बहस छिड़ गई।

ऋषि सनत्कुमार के पास गए। सनत्कुमार ने कहा — "राजा अपनी प्रजा का रक्षक है, जैसे देवताओं में इन्द्र। जैसे सूर्य अंधकार मिटाता है, वैसे राजा धरती से पाप मिटाता है।" फ़ैसला अत्रि के पक्ष में हुआ।

प्रसन्न राजा ने अत्रि को बहुत-सा सोना दिया। अत्रि ने वह धन अपने बेटों में बाँट दिया। फिर मन को वश में करके वे खुशी-खुशी तप करने वन चले गए।

त्याग और तप

राजा से मिला सारा धन अत्रि ने अपने पास नहीं रखा। उन्होंने उसे बेटों में बाँटा, और स्वयं तप के लिए वन चले गए।

शिक्षाएँ

अत्रि और अनसूया का आश्रम दिखाता है कि तप केवल अपने लिए नहीं होता। सूखे में अनसूया के तप से फल उगे, और ऋषियों का यज्ञ नहीं रुका।

अनसूया की कथा यह भी सिखाती है कि झगड़े में किसी की हार ज़रूरी नहीं। उन्होंने पतिव्रता का मान भी रखा, दिन भी लौटाया, और उसके पति को भी बचा लिया।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंऋग्वेद का पाँचवाँ मण्डल — अत्रि और आत्रेय ऋषियों के सूक्त। सूक्त 5.40 में अत्रि का अंधकार से सूर्य को खोजना है।

संबंधित ऋषि

अत्रि-कुल के गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंअत्रि-आश्रम (चित्रकूट के बाद) — रामायण के अनुसार राम चित्रकूट छोड़कर अत्रि के आश्रम पहुँचे। एक रात वहाँ रुककर, तपस्वियों का बताया रास्ता लेकर वे घने वन में चले गए।

संबंधित गाथाएँ

ऋषियों का योगदान

स्रोत

महर्षि अत्रि — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न