अत्रि गोत्र — परिचय
बौधायन सूत्र गोत्र की परिभाषा में जिन आठ ऋषियों का नाम लेता है, अत्रि उनमें से एक हैं। ग्रंथ की तालिका में अत्रि-कुल के 6 गण हैं, और सबके प्रवर में पहला नाम "आत्रेय" है।
श्यावाश्व गण अत्रि-कुल का सबसे बड़ा गण है — इसमें 167 नाम दर्ज हैं। मत्स्य पुराण (अध्याय 197) भी इस समूह का प्रवर "श्यावाश्व, अत्रि, आर्चनानस" बताता है।
अत्रि-कुल के गण
श्यावाश्व के अलावा अत्रि-कुल में गविष्ठिर, अतिथि, वाग्भूतक, पुत्रिकापुत्र और सुमङ्गल गण हैं। इनके प्रवर में "आत्रेय" के बाद दूसरे ऋषि आते हैं, जैसे गाविष्ठिर या पौर्वातिथ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पुत्रिकापुत्र समूह महर्षि अत्रि की पुत्री के पुत्रों का है, इसीलिए उसका नाम ऐसा है। अपने परिवार का गण प्रवर से पहचानें।
प्रवर — गण 35 (श्यावाश्वाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आत्रेय · आर्चनानस · श्यावाश्व | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 197 — “Shyavashva, Atri, Archananasa”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में अत्रि गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। अत्रि गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह अत्रिआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्व है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
