हिंदू धर्म में कितने गोत्र हैं?
गोत्राणां तु सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च। ऊनपञ्चाशदेवैषां प्रवरा ऋषिदर्शनात्॥गोत्र तो हज़ारों, लाखों, करोड़ों हैं; पर उनके प्रवर उनचास (49) ही हैं।
इसका कोई एक अंक नहीं है, और यह बात स्वयं ग्रंथ कहते हैं। बौधायन का वचन है कि गोत्र तो हज़ारों, लाखों, करोड़ों हैं, पर उनके प्रवर उनचास ही हैं।
इसीलिए गोत्र-प्रवर ग्रंथ गोत्रों को गिनते नहीं, उन्हें "गणों" में बाँटते हैं — एक गण के सब गोत्रों का प्रवर एक होता है। इस पृष्ठ का आधार-ग्रंथ पाँच सूत्र-ग्रंथों और मत्स्य पुराण को मिलाकर नीचे दी गई संख्या तक पहुँचता है।
प्रवर क्या होता है?
एकं वृणीते द्वौ वृणीते त्रीन्वृणीते न चतुरो वृणीते पञ्च वृणीते न पञ्चातिवृणीते।प्रवर में एक, दो, तीन या पाँच ऋषि बोले जाते हैं — चार नहीं, और पाँच से अधिक नहीं।
प्रवरमञ्जरी के अनुसार प्रवर का अर्थ है "प्रार्थना"। यज्ञ में होता और अध्वर्यु यजमान के गोत्र-ऋषियों के नाम लेकर अग्नि का आह्वान करते हैं — होता एक क्रम में और अध्वर्यु उसके उलटे क्रम में।
प्रवर में ऋषियों की संख्या भी तय है। श्रुति कहती है कि एक, दो, तीन या पाँच ऋषि बोले जाते हैं — चार कभी नहीं, और पाँच से अधिक नहीं।
सगोत्र किसे कहते हैं?
एक एव ऋषिर्यावत्प्रवरेष्वनुवर्तते। तावत्समानगोत्रत्वमन्यत्र भृग्वङ्गिरसां गणात्॥सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य में से कोई एक ऋषि जब तक दो प्रवरों में साझा हो, तब तक वे समान गोत्र माने जाते हैं — भृगु और आङ्गिरस के गणों को छोड़कर।
बौधायन का नियम है: सात ऋषियों (विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप) और अगस्त्य में से कोई एक ऋषि अगर दो परिवारों के प्रवरों में साझा हो, तो वे समान गोत्र माने जाते हैं। प्रवरमञ्जरी के अनुसार जमदग्नि को छोड़कर बाक़ी भृगु-गण, और गौतम-भरद्वाज को छोड़कर बाक़ी आङ्गिरस-गण इस नियम से बाहर हैं, क्योंकि उनके प्रवर में इन आठ में से कोई ऋषि नहीं आता।
परंपरा में समान गोत्र और समान प्रवर वालों के बीच विवाह वर्जित माना गया है। यह धार्मिक परंपरा है; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 गोत्र या प्रवर के आधार पर विवाह नहीं रोकता।
अपना गोत्र कैसे पक्का करें
गोत्र परिवार की परंपरा से आता है, इसलिए सबसे पक्का स्रोत घर के बड़े, कुल-पुरोहित और पुराने विवाह या पूजा के लेख हैं। केवल उपनाम (surname) से गोत्र तय नहीं होता — एक ही उपनाम के परिवार अलग-अलग गोत्र के हो सकते हैं।
गोत्र के साथ परिवार का प्रवर भी पूछ लें। एक ही गोत्र-नाम कई गणों में मिलता है, और प्रवर से ही पता चलता है कि आपका परिवार किस गण का है।
कुल → प्रवर → गण → गोत्र
ग्रंथ की तालिका इसी क्रम में चलती है: पहले ऋषि-कुल, फिर हर कुल के प्रवर, हर प्रवर का एक गण, और हर गण में दर्ज गोत्र-नाम। उदाहरण: कश्यप-कुल → प्रवर “काश्यप, आवत्सार, नैध्रुव” → निध्रुव गण → उसमें दर्ज 382 नाम।
सभी गणों और उनके प्रवरों की पूरी सूची: प्रवर — सभी 73 गण, सूत्र-वार
लेख और tools
9 ऋषि-कुल
प्रमुख गोत्र (42)
हर पृष्ठ पर गोत्र का गण, सूत्र-वार प्रवर, ग्रंथों के मतभेद और उसी गण के बाक़ी नाम दिए गए हैं।
