कौण्डिन्य गोत्र — परिचय
गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में "कुण्डिनाः" नाम चारों सूत्रों — आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन और कात्यायन — की सूची में है। मत्स्य पुराण इसे "कुण्डिनः" लिखता है।
मत्स्य पुराण (अध्याय 200) इस समूह का प्रवर वसिष्ठ, मित्रावरुण और कुण्डिन बताता है। यह ग्रंथ की तालिका से पूरी तरह मेल खाता है।
कुण्डिन और कौण्डिन्य
"कौण्डिन्य" का अर्थ है कुण्डिन के वंश का। इसीलिए गण का नाम कुण्डिन है, और प्रवर का तीसरा ऋषि कौण्डिन्य। आज बोलचाल में इसे कौंडिन्य भी लिखा जाता है।
प्रवर — गण 66 (कुण्डिनाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · मैत्रावरुण · कौण्डिन्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha, Mitravaruna, Kundina”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में कौण्डिन्य गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कौण्डिन्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कौण्डिन्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
