कौण्डिन्य गोत्र

कौण्डिन्य (कुण्डिन) गोत्र वसिष्ठ-कुल का है। इसका प्रवर वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य है, जिस पर सभी सूत्र और मत्स्य पुराण एकमत हैं। जानिए गण के 68 नाम और विवाह की परंपरा।

संक्षेप में

कौण्डिन्य गोत्र महर्षि वसिष्ठ के कुल का गोत्र है। गोत्र-प्रवर ग्रंथों में इसका गण "कुण्डिन" कहलाता है। इसका प्रवर है — वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य। आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन और मत्स्य पुराण सभी यही प्रवर बताते हैं, इसलिए इस गोत्र के प्रवर पर ग्रंथों में कोई मतभेद नहीं है।

मुख्य जानकारी

गोत्रकौण्डिन्य (Kaundinya)
अन्य नाम / वर्तनीकौंडिन्य, कुण्डिन, कौन्डिन्य, Kaundinya, Koundinya
ऋषि-कुलवसिष्ठ
गोत्रकार ऋषिमहर्षि वसिष्ठ
गणगण 66 — कुण्डिनाः
मुख्य प्रवरवासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)
ग्रंथ-सूची मेंगण 66: "कुण्डिनाः" (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन); गण 66: "कुण्डिनः" (मत्स्य पुराण)

कौण्डिन्य गोत्र — परिचय

गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में "कुण्डिनाः" नाम चारों सूत्रों — आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन और कात्यायन — की सूची में है। मत्स्य पुराण इसे "कुण्डिनः" लिखता है।

मत्स्य पुराण (अध्याय 200) इस समूह का प्रवर वसिष्ठ, मित्रावरुण और कुण्डिन बताता है। यह ग्रंथ की तालिका से पूरी तरह मेल खाता है।

कुण्डिन और कौण्डिन्य

"कौण्डिन्य" का अर्थ है कुण्डिन के वंश का। इसीलिए गण का नाम कुण्डिन है, और प्रवर का तीसरा ऋषि कौण्डिन्य। आज बोलचाल में इसे कौंडिन्य भी लिखा जाता है।

प्रवर — गण 66 (कुण्डिनाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
वासिष्ठ · मैत्रावरुण · कौण्डिन्य3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha, Mitravaruna, Kundina”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

इस गण में दर्ज नाम (68)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। नीचे की सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। कौण्डिन्य गोत्र की पंक्तियाँ अलग रंग में है।

  1. 1अक्षतयःका
  2. 2अश्मरथ्यःबो
  3. 3अश्वत्थःबो
  4. 4आवल्ववदरःबो
  5. 5आविश्ववदरःबो
  6. 6औपस्वस्थाःका, म
  7. 7कापटवःबो
  8. 8कुण्डिनःम
  9. 9कुण्डिनाःआश्व, आप, बो, का
  10. 10कौकोल्यःबो
  11. 11क्रौकोल्यः ?बो
  12. 12गुग्गुलिः ?बो
  13. 13जातूकर्णाः ?म
  14. 14जातूकर्ण्याःका
  15. 15जादपाः ?म
  16. 16निम्नुः ?म
  17. 17नैकर्णयःम
  18. 18नैभ्रुकाः ?का
  19. 19नैभ्रुकाः ?का
  20. 20नैभ्रकायनः ?म
  21. 21नवग्रामाःबो
  22. 22पाटलयःका
  23. 23पादपःम
  24. 24पालोहाःम
  25. 25पेटकाःबो
  26. 26पेठकाःबो
  27. 27पैप्पलादयःबो
  28. 28पैप्पलादिःका, म
  29. 29बाहवःबो
  30. 30बोधायनाःका
  31. 31बौधिःका
  32. 32भाज्यकिःबो
  33. 33माक्षतयःम
  34. 34माक्षितयःम
  35. 35माध्यन्दिनःबो, म
  36. 36माध्यन्दिनिःबो
  37. 37मित्रावरुणाःका
  38. 38मौद्गलाःका
  39. 39यालोहाःम
  40. 40लुलायाःका
  41. 41लोहयःका, म
  42. 42लोहलाःका, म
  43. 43लोहायनाःबो
  44. 44वयःम
  45. 45वसिष्ठःम
  46. 46वागुढिनःम
  47. 47वाहवःबो
  48. 48विचक्षुपः ?म
  49. 49विचत्कापिः ?म
  50. 50वियङ्कपिः ?का
  51. 51विश्वङ्करः ?का
  52. 52वैकर्णयःबो
  53. 53शान्तिःबो
  54. 54शिवकर्णःम
  55. 55सामालिनः ?बो
  56. 56सातमाः ?म
  57. 57सामङ्गलिः ?बो
  58. 58सैवलकाःम
  59. 59सौगूलिःम
  60. 60सौपक्षिःबो
  61. 61सौपथिःबो
  62. 62स्वलोकाःका
  63. 63स्वलोक्याःका
  64. 64स्वसुलःका
  65. 65स्वस्थयःका
  66. 66स्वस्थलयःम
  67. 67स्वातिःबो
  68. 68हिरण्याक्षायणाःबो

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण. "?" = मूल छपाई साफ़ नहीं, नाम की पढ़त अनिश्चित।

गण 66 — कुण्डिनाः का पूरा पृष्ठ

इसी गण के अन्य गोत्र-पृष्ठ

पूजा, संकल्प और विवाह में कौण्डिन्य गोत्र

संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। कौण्डिन्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह कौण्डिन्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।

ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।

स्रोत

कौण्डिन्य गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न