उपमन्यु गोत्र — परिचय
गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में उपमन्यु वसिष्ठ-कुल का दूसरा गण है। इसकी सूची में "उपमन्यवः" नाम आश्वलायन से, और "औपमन्यवः" मत्स्य पुराण और कात्यायन से दर्ज है।
मत्स्य पुराण (अध्याय 200) भी इस समूह का प्रवर भरद्वसु, वसिष्ठ और इन्द्रप्रमद बताता है, और कहता है कि ये आपस में विवाह नहीं करते।
वही ऋषि, अलग क्रम
उपमन्यु गण में सूत्रों का अंतर ऋषियों के नाम में नहीं, उनके क्रम में है। आश्वलायन और कात्यायन में दूसरा नाम आभरद्वसव्य है, जबकि बौधायन और मत्स्य में ऐन्द्रप्रमद।
प्रवर-पाठ में क्रम का अपना महत्व है, इसलिए परिवार जिस क्रम में बोलता आया है, वही अपनाएँ।
प्रवर — गण 64 (उपमन्यवः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · आभरद्वसव्य · ऐन्द्रप्रमद | 3 | आश्वलायन, कात्यायन | तालिका का मुख्य |
| वासिष्ठ · ऐन्द्रप्रमद · आभरद्वसव्य | 3 | बौधायन, मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Bharadvasu, Vasishtha, Indrapramada”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में उपमन्यु गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। उपमन्यु गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह उपमन्युआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ, आभरद्वसव्य, ऐन्द्रप्रमद है (आश्वलायन, कात्यायन)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
