आलम्भायन गोत्र — परिचय
गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में "आलम्भायनाः" नाम वासिष्ठ गण की सूची में छठे स्थान पर है, और बौधायन के नाम से दर्ज है। बौधायन की वसिष्ठ-सूची में भी यह नाम आता है।
वासिष्ठ गण का प्रवर एक ही ऋषि का है — "वासिष्ठ"। आपस्तम्ब इस गण के लिए विकल्प में "वासिष्ठ, ऐन्द्रप्रमद, आभरद्वसव्य" भी बताते हैं।
वर्तनी पर एक टिप्पणी
ग्रंथ में यह नाम "आलम्भायन" है, जबकि आज लोग इसे "आलम्बायन" लिखते और खोजते हैं। ब और भ का ऐसा अंतर कई नामों में मिलता है।
हमें ऐसा कोई स्रोत नहीं मिला जो साफ़ कहे कि दोनों एक ही हैं, इसलिए यह पहचान पक्की नहीं मानी गई है। ग्रंथ में "आलम्बायन" जैसा कोई अलग नाम भी नहीं मिला।
प्रवर — गण 63 (वासिष्ठाः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ | 1 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| वासिष्ठ · ऐन्द्रप्रमद · आभरद्वसव्य | 3 | आपस्तम्ब | विकल्प |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 200 — “Vasishtha — ekarsheya”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।
पूजा, संकल्प और विवाह में आलम्भायन गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। आलम्भायन गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह आलम्भायनआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
