शाक्त्य — परिचय
पराशर गण का प्रवर सभी सूत्रों और मत्स्य पुराण में एक ही है: वासिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य। यानी तीन पीढ़ियाँ — वसिष्ठ, उनके पुत्र शक्ति, और शक्ति के पुत्र पराशर।
आश्वलायन संकृति गण के लिए एक विकल्प "शाक्त्य, गौरुवीत, साङ्कृत्य" भी देते हैं — वहाँ भी शाक्त्य नाम प्रवर-ऋषि के रूप में आता है।
प्रवर — गण 65 (पराशराः)
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| वासिष्ठ · शाक्त्य · पाराशर्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
पूजा, संकल्प और विवाह में शाक्त्य गोत्र
संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। शाक्त्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह शाक्त्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप वासिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण)।
ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।
