पूजा के संकल्प में अपना गोत्र कैसे बोलें? — ग्रंथ का ढाँचा

संकल्प, वरण और अभिवादन में गोत्र-प्रवर बोलने का ग्रंथोक्त ढाँचा — "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्", "सगोत्र" वाला नियम, और श्राद्ध में नाम कैसे लें — संस्काररत्नमाला और धर्मसिन्धु से।

संक्षेप में

संस्काररत्नमाला के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्" — यानी पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। "अमुक" की जगह अपना प्रवर, गोत्र और नाम आता है। श्राद्ध में धर्मसिन्धु गोत्र के साथ "स" जोड़ने का नियम भी देता है, जैसे "काश्यपसगोत्र"।

मूल ढाँचा

अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं भो अभिवादये।

अमुक प्रवर वाला, अमुक गोत्र में जन्मा मैं अमुक शर्मा, हे (गुरु), आपको प्रणाम करता हूँ।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 214 (उपनयन-प्रयोग) (archive.org leaf n217)

यह वाक्य उपनयन के अभिवादन का है, और यही ढाँचा आचार्य-वरण (p. 129) और कन्यादान (p. 551) में भी है। इसके तीन भाग हैं:

  • अमुकप्रवरान्वित — "अमुक प्रवर से युक्त": यहाँ अपने गण का प्रवर (ऋषियों के नाम) आता है।
  • अमुकगोत्रोत्पन्न — "अमुक गोत्र में जन्मा": यहाँ गोत्र का नाम।
  • अमुकशर्माऽहम् — "मैं अमुक शर्मा": यहाँ अपना नाम।

खाली जगह कैसे भरें

प्रवर अपने गण से आता है, गोत्र-नाम से नहीं। अपना प्रवर पता न हो तो इस साइट के गोत्र-पृष्ठ या प्रवर-तालिका में अपना गोत्र देखें; वहाँ हर गण का प्रवर सूत्र के नाम के साथ है। जहाँ एक गोत्र के कई प्रवर-विकल्प हैं, वहाँ अपने कुल-पुरोहित से पूछें कि आपके परिवार में कौन-सा बोला जाता है।

हमने किसी विशेष गोत्र का पूरा संस्कृत वाक्य स्वयं नहीं बनाया है। ग्रंथ केवल "अमुक" वाला ढाँचा देते हैं; प्रवर को समास में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, और उसमें गलती से वाक्य अशुद्ध हो जाता है।

"स" के साथ गोत्र — धर्मसिन्धु का नियम

"सकारेण तु वक्तव्यं गोत्रं सर्वत्र धीमता" इति वाक्यात्काश्यपसगोत्रस्य काश्यपगोत्रस्येति वोच्चारः, केचिच्छाखाभेदाद्व्यवस्थामाहुः।

"बुद्धिमान सब जगह गोत्र 'स' के साथ बोले" — इस वचन से "काश्यपसगोत्रस्य" कहें, या "काश्यपगोत्रस्य"; कुछ आचार्य कहते हैं कि यह शाखा के भेद से तय होता है।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु (श्राद्ध-परिभाषा) एक वचन उद्धृत करता है कि गोत्र "स" के साथ बोला जाए — "काश्यपसगोत्रस्य" — या सीधे "काश्यपगोत्रस्य"। वह यह भी लिखता है कि कुछ आचार्य इसे शाखा के भेद से तय करते हैं। यानी यहाँ भी एक ही रूप सबके लिए नहीं है।

नाम का अंत

उसी पृष्ठ पर धर्मसिन्धु एक श्लोक उद्धृत करता है जो वर्ण के अनुसार नाम के अंत में जोड़े जाने वाले शब्द बताता है — "शर्मान्तं विप्रनामोक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य तु। गुप्तान्तं चैव वैश्यस्य दासान्तं शूद्रजन्मनः"। स्त्रियों के नाम के लिए वह "दा"-अंत (जैसे "सावित्रीदा") लिखता है, और साथ ही कि कुछ आचार्य "देवी" और कुछ दोनों का प्रयोग कहते हैं।

संस्काररत्नमाला (p. 214) उपनयन में यह भी बताती है कि आचार्य कुमार को एक गुप्त नाम धीरे से बताते हैं और अभिवादन उसी से होता है; वह नाम न पता हो तो व्यवहार के नाम से।

तीन जगह, एक ढाँचा

कर्मवाक्य का अंशस्रोत
उपनयन — अभिवादनअमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं भो अभिवादयेसंस्काररत्नमाला p. 214
ग्रह-यज्ञ — आचार्य-वरणअमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशाखाध्याय्यमुकशर्माऽहम्…संस्काररत्नमाला p. 129
विवाह — कन्यादानअमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं मम समस्तपितॄणाम्…संस्काररत्नमाला p. 551

स्रोत

संकल्प में अपना गोत्र कैसे बोलें — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न