उपनयन संस्कार में गोत्र — अभिवादन और "समान ऋषि"

उपनयन में गोत्र-प्रवर कहाँ आता है: गुरु को अभिवादन "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं भो अभिवादये", शाङ्खायन का "समान ऋषि?" वाला प्रश्न, और यज्ञोपवीत की गाँठें — संस्काररत्नमाला और गृह्यसूत्रों से।

संक्षेप में

उपनयन में गोत्र सबसे साफ़ अभिवादन में आता है। संस्काररत्नमाला के अनुसार ब्रह्मचारी दायाँ हाथ कान के बराबर फैलाकर धीरे से कहता है — "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं भो अभिवादये" — और सिर झुकाकर आचार्य को नमस्कार करता है। शाङ्खायन गृह्यसूत्र में आचार्य शिष्य से पूछते हैं कि क्या वह समान ऋषियों का है।

अभिवादन का वाक्य

अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहं भो अभिवादये।

अमुक प्रवर वाला, अमुक गोत्र में जन्मा मैं अमुक शर्मा, हे (गुरु), आपको प्रणाम करता हूँ।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 214 (उपनयन-प्रयोग) (archive.org leaf n217)

संस्काररत्नमाला (p. 214) उपनयन-प्रयोग में पूरा क्रम देती है: आचार्य गायत्री-पूजन करके पूर्वमुख बैठते हैं; ब्रह्मचारी आचार्य के दाहिने पैर को नीचे-ऊपर से छूकर पैर पकड़ता है (उपसंग्रहण); आचार्य कुमार को धीरे से एक गुप्त नाम बताते हैं, और कुमार उसी नाम से अभिवादन करता है — वह नाम न पता हो तो व्यवहार के नाम से।

फिर वह दायाँ हाथ कान के बराबर फैलाकर ऊपर का वाक्य धीरे से बोलता है और सिर झुकाकर, खड़े होकर, आचार्य को नमस्कार करता है। आचार्य "आयुष्मान् भव" कहकर आशीर्वाद देते हैं, और फिर सावित्री (गायत्री) का उपदेश होता है।

शाङ्खायन: "समान ऋषियों के?"

"Descending from the same Rishis?" says the teacher. "Descending from the same Rishis, sir," says the other.

"(क्या तुम) समान ऋषियों के वंशज हो?" — आचार्य पूछते हैं। "हाँ, समान ऋषियों का, श्रीमान" — शिष्य कहता है।

— The Grihya-sutras, Part I (Sacred Books of the East, vol. 29), शाङ्खायन गृह्यसूत्र II.2.6–7 (SBE 29, p. 62)

शाङ्खायन गृह्यसूत्र (II.2.4–7) में आचार्य पहले नाम पूछते हैं, फिर "समान ऋषियों के वंशज?" — और शिष्य हाँ कहता है। SBE 29 के अनुवादक Oldenberg की टिप्पणी बताती है कि इसका अर्थ विद्वानों में विवादित है: कुछ इसे आचार्य और शिष्य के समान आर्षेय की बात मानते हैं, और एक मत यह है कि उपनयन से आचार्य शिष्य को अपना आर्षेय देते हैं। हम दोनों मत बता रहे हैं, किसी एक को नहीं चुन रहे।

यज्ञोपवीत की गाँठें

शाङ्खायन गृह्यसूत्र (II.2.2) यज्ञोपवीत में "एक गाँठ, या तीन, या पाँच" कहता है। SBE 29 की टिप्पणी में रामचन्द्र की पद्धति इसे शिष्य के आर्षेय से जोड़ती है — जितने ऋषि उसके प्रवर में हों। यह टीकाकार का अर्थ है, सूत्र का शब्द नहीं।

उपनयन के बाद भी

अभिवादन केवल उपनयन के दिन का नहीं। संस्काररत्नमाला (p. 427) बताती है कि सब वर्णों के लिए बताया गया "मानव" प्रवर भी "श्रौत कर्म के प्रवरण और अभिवादन आदि में" ही है, विवाह में नहीं — यानी गोत्र-प्रवर के साथ अभिवादन एक स्थायी आचार माना गया।

स्रोत

उपनयन संस्कार में गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न