यज्ञ में गोत्र और प्रवर — प्रवरण, होता-अध्वर्यु और आचार्य-वरण

यज्ञ में प्रवर का पाठ: होता और अध्वर्यु का क्रम, प्रवर में 1, 2, 3 या 5 ऋषि, "ऋषियों से ही आर्षेय", ग्रह-यज्ञ में आचार्य-वरण का वाक्य — प्रवरमञ्जरी और संस्काररत्नमाला के मूल वचनों से।

संक्षेप में

यज्ञ में प्रवर का पाठ "प्रवरण" कहलाता है। प्रवरमञ्जरी के अनुसार होता यजमान के प्रवर-ऋषियों के नाम एक क्रम में और अध्वर्यु उलटे क्रम में बोलते हैं, और श्रुति के अनुसार प्रवर में एक, दो, तीन या पाँच ऋषि होते हैं, चार नहीं। गृह्य यज्ञों में, जैसे ग्रह-यज्ञ, यजमान आचार्य का वरण करते समय अपना और आचार्य का प्रवर-गोत्र बोलता है।

प्रवरण: अग्नि का आह्वान ऋषियों के नाम से

प्रव्रियन्तेऽग्नेर्विशेषणत्वेनोत्कीर्त्यन्त इति प्रवराः।

जिन (ऋषियों) के नाम अग्नि के विशेषण के रूप में लिए जाते हैं, वे प्रवर हैं।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 416 (archive.org leaf n419)

प्रवरमञ्जरी (p. 8) के अनुसार प्रवर का अर्थ "प्रार्थना" है: होता और अध्वर्यु यजमान के गोत्र-ऋषियों के नाम लेकर अग्नि का आह्वान करते हैं — होता एक क्रम में और अध्वर्यु उसके उलटे क्रम में। संस्काररत्नमाला यह भी बताती है कि ये नाम अग्नि के विशेषण के रूप में आते हैं।

प्रवर में कितने ऋषि

एकं वृणीते द्वौ वृणीते त्रीन्वृणीते न चतुरो वृणीते पञ्च वृणीते न पञ्चातिवृणीते।

प्रवर में एक, दो, तीन या पाँच ऋषि बोले जाते हैं — चार नहीं, और पाँच से अधिक नहीं।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 26 (प्रवरमञ्जरी, श्रुति-वचन) (archive.org leaf 64)

इस श्रुति-वचन के कारण गोत्र-प्रवर ग्रंथों की तालिका में हर प्रवर एक, दो, तीन या पाँच ऋषियों का है। शाङ्खायन गृह्यसूत्र (II.2.2) उपनयन में यज्ञोपवीत की "एक, या तीन, या पाँच" गाँठें कहता है, और रामचन्द्र की पद्धति इसे शिष्य के आर्षेय (प्रवर-ऋषियों की संख्या) से जोड़ती है।

आर्षेय केवल ऋषियों से

संस्काररत्नमाला (p. 416) प्रवर-सूत्र की व्याख्या में दो श्रुतियाँ देती है। पहली: "आर्षेयं वृणीते बन्धोरेव नैति" — आर्षेय का वरण करने से यजमान अपने पूर्व-ऋषियों के संबंध से नहीं छूटता। दूसरी: "न देवैर्न मनुष्यैरार्षेयं वृणीत, ऋषिभिरेवार्षेयं वृणीत" — आर्षेय देवताओं या मनुष्यों के नाम से नहीं, केवल ऋषियों से।

गृह्य यज्ञ में आचार्य-वरण

अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशाखाध्याय्यमुकशर्माऽहममुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नममुकशाखाध्यायिनममुकशर्माणमस्मिन्ग्रहयज्ञ आचार्यत्वेन त्वां वृणे।

अमुक प्रवर वाला, अमुक गोत्र में जन्मा, अमुक शाखा पढ़ने वाला मैं अमुक शर्मा — अमुक प्रवर वाले, अमुक गोत्र में जन्मे, अमुक शाखा पढ़ने वाले अमुक शर्मा, आपको इस ग्रह-यज्ञ में आचार्य के रूप में वरण करता हूँ।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 129 (ग्रहमख-प्रयोग, आचार्य-वरण) (archive.org leaf n132)

ग्रह-यज्ञ (ग्रहमख) के प्रयोग में संस्काररत्नमाला (p. 129) बताती है कि गणपति-पूजन से नान्दी-श्राद्ध तक करके यजमान आचार्य आदि का वरण करे — "विधि जानने वाले, कर्म में कुशल, अपनी शाखा के ज्ञाता, सदाचारी ब्राह्मण" का हाथ छूकर। वरण के वाक्य में दोनों का प्रवर, गोत्र, शाखा और नाम आता है। इसके बाद ब्रह्मा और सदस्य का भी वरण होता है।

क्षत्रिय यजमान

प्रवरमञ्जरी (p. 4) के अनुसार क्षत्रियों के लिए पुरोहित का प्रवर बताया गया है। अज्ञात-गोत्र वालों के लिए भी संस्काररत्नमाला (p. 426) पुरोहित या आचार्य के प्रवर से प्रवरण का सूत्र देती है।

स्रोत

यज्ञ में गोत्र और प्रवर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न