संकल्प में गोत्र का क्या महत्व है?

संकल्प क्या है, ग्रह-यज्ञ, कन्यादान और श्राद्ध के संकल्पों में गोत्र कहाँ आता है, और कहाँ नहीं — संस्काररत्नमाला और धर्मसिन्धु के मूल वाक्यों के साथ।

संक्षेप में

संकल्प वह वाक्य है जिससे कर्ता बताता है कि वह कौन-सा कर्म, कब, कहाँ और किस उद्देश्य से कर रहा है। संस्काररत्नमाला के ग्रह-यज्ञ के संकल्प में देश-काल और उद्देश्य है, और गोत्र आचार्य-वरण में आता है; पर कन्यादान और श्राद्ध के संकल्प में गोत्र वाक्य का हिस्सा है। धर्मसिन्धु श्राद्ध के संकल्प में संबंध, गोत्र और नाम बोलना आवश्यक कहता है।

संकल्प में क्या होता है

अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशाखाध्याय्यमुकशर्माऽहममुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नममुकशाखाध्यायिनममुकशर्माणमस्मिन्ग्रहयज्ञ आचार्यत्वेन त्वां वृणे।

अमुक प्रवर वाला, अमुक गोत्र में जन्मा, अमुक शाखा पढ़ने वाला मैं अमुक शर्मा — अमुक प्रवर वाले, अमुक गोत्र में जन्मे, अमुक शाखा पढ़ने वाले अमुक शर्मा, आपको इस ग्रह-यज्ञ में आचार्य के रूप में वरण करता हूँ।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 129 (ग्रहमख-प्रयोग, आचार्य-वरण) (archive.org leaf n132)

संस्काररत्नमाला (p. 129) ग्रह-यज्ञ का संकल्प ऐसे बताती है: कर्ता स्नान और नित्य-कर्म करके, आचमन और प्राणायाम करके, "देशकालौ संकीर्त्य" — देश और काल का नाम लेकर — कहता है कि आगे होने वाले अमुक कर्म में ग्रहों की अनुकूलता के लिए, परमेश्वर की प्रीति के लिए, मैं ग्रह-यज्ञ करूँगा।

इस वाक्य में गोत्र नहीं है। गोत्र-प्रवर उसके बाद आचार्य-वरण के वाक्य में आता है, जहाँ यजमान अपना और आचार्य का — दोनों का — प्रवर, गोत्र, शाखा और नाम बोलता है।

कन्यादान का संकल्प: गोत्र वाक्य के भीतर

कन्यादान में (संस्काररत्नमाला p. 551) कर्ता पहले "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्" कहकर अपना परिचय देता है, और फिर दान के वाक्य में वर और कन्या दोनों का प्रवर, गोत्र और तीन पीढ़ियाँ बोलता है।

यहाँ गोत्र का एक व्यावहारिक काम भी है। संस्काररत्नमाला (p. 416) के अनुसार विवाह में आर्ष-गोत्र-उच्चारण सगोत्र या सप्रवर होने की शंका दूर करने के लिए है — सबके सामने दोनों के गोत्र-प्रवर बोले जाते हैं।

श्राद्ध का संकल्प: गोत्र आवश्यक

संकल्पे क्षणदाने पाद्ये आसने आवाहनेऽर्घ्यदाने गन्धाद्याच्छादनान्तपञ्चोपचारेऽन्नदाने पिण्डदानेऽञ्जनाभ्यञ्जनयोरक्षय्ये स्वधावाचने च संबन्धगोत्रनामोच्चारणमावश्यकमन्यत्र कृताकृतम्।

संकल्प, क्षण-दान, पाद्य, आसन, आवाहन, अर्घ्य, गन्ध से वस्त्र तक के पाँच उपचार, अन्न-दान, पिण्ड-दान, अञ्जन-अभ्यञ्जन, अक्षय्य और स्वधा-वाचन — इनमें (पितर का) संबंध, गोत्र और नाम बोलना आवश्यक है; बाक़ी जगह बोलें या न बोलें।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (श्राद्ध-परिभाषा) (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु की श्राद्ध-परिभाषा में सबसे पहले संकल्प ही गिनाया गया है। श्राद्ध में गोत्र कर्ता का नहीं, जिनके लिए श्राद्ध है उन पितरों का बोला जाता है — उनके संबंध (पिता, पितामह…), गोत्र और नाम के साथ। इसी पृष्ठ पर लिखा है कि संकल्प षष्ठी विभक्ति में होता है।

सारांश

आम पूजाओं के संकल्प में गोत्र बोलने की प्रथा बहुत व्यापक है, पर संस्काररत्नमाला (p. 416) के अनुसार शान्ति आदि कर्मों में यह कहीं वचन से और कहीं आचार से है। अपने कुल-पुरोहित की रीति मानें।

संकल्पगोत्र किसकास्रोत
ग्रह-यज्ञसंकल्प में देश-काल; गोत्र आचार्य-वरण में (यजमान और आचार्य)संस्काररत्नमाला p. 129
कन्यादानकर्ता, वर और कन्यासंस्काररत्नमाला p. 551
श्राद्धपितरों का (संबंध-गोत्र-नाम)धर्मसिन्धु p. 274

स्रोत

संकल्प में गोत्र का महत्व — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न