जन्म से मृत्यु तक
| संस्कार/कर्म | गोत्र की भूमिका | स्रोत |
|---|---|---|
| चूडाकरण | केश-रचना गोत्र और कुल की रीति से | खादिर गृह्यसूत्र II.4.30 |
| उपनयन | गुरु को अभिवादन में प्रवर-गोत्र-नाम | संस्काररत्नमाला p. 214; शाङ्खायन II.2 |
| विवाह | कन्यादान में वर-कन्या के प्रवर-गोत्र; सगोत्र-विचार | संस्काररत्नमाला pp. 415–416, 551–552 |
| यज्ञ/ग्रह-यज्ञ | प्रवरण; आचार्य-वरण | प्रवरमञ्जरी p. 8; संस्काररत्नमाला p. 129 |
| अन्त्येष्टि | जलांजलि में मृतक का गोत्र-नाम | आश्वलायन गृह्यसूत्र IV.4.10 |
| श्राद्ध, पिण्ड-दान | पितर का संबंध-गोत्र-नाम आवश्यक | धर्मसिन्धु p. 274 |
चूडाकरण: गोत्र की रीति
…he should have the arrangement of (the boy's) hair made according to the custom of his Gotra and of his family.(चूडाकरण में) बालक के केशों की रचना उसके गोत्र और कुल की रीति के अनुसार कराए।
यह खादिर गृह्यसूत्र का वचन है। इसका अर्थ है कि कुछ संस्कारों में गोत्र केवल बोला नहीं जाता, बल्कि वह रीति भी तय करता है। सूत्र यह नहीं बताता कि किस गोत्र की कौन-सी केश-रचना है — वह कुल की परंपरा पर छोड़ा गया है।
शास्त्र-वचन और आचार
विवाह आर्षगोत्रोच्चारणं तु वाचनिकं, तच्च सप्रवरत्वसगोत्रत्वशङ्कानिवारणार्थमदृष्टार्थं च भवति। शान्त्यादिकर्मसु तु वाचनिकं कुत्रचित्। कुत्रचिदाचारप्राप्तम्।विवाह में आर्षेय (प्रवर) और गोत्र बोलना शास्त्र-वचन से है; यह समान प्रवर या समान गोत्र की शंका दूर करने के लिए, और अदृष्ट (पुण्य) फल के लिए है। शान्ति आदि कर्मों में यह कहीं वचन से है, और कहीं आचार (परंपरा) से आया है।
यह भेद समझना ज़रूरी है। विवाह, श्राद्ध के तय चरण और श्रौत प्रवरण में गोत्र बोलना ग्रंथ-विहित है। पर बहुत-से कर्मों में यह "कहीं वचन से, कहीं आचार से" है — यानी परिवार और क्षेत्र की परंपरा। इस साइट पर हमने जहाँ वचन मिला वहाँ वचन दिया है, और बाक़ी को परंपरा कहा है।
विवाहित स्त्री और दत्तक
अनुष्ठानों में गोत्र किसका बोला जाए, इसके दो ग्रंथ-नियम संस्काररत्नमाला (p. 552) के कन्यादान-प्रयोग में मिलते हैं: कन्यादान करने वाली माता अपने पति का गोत्र बोलती है, पिता का नहीं; और दत्तक पुत्र उसका गोत्र बोलता है जिसने उसे गोद लिया।
गोत्र पता न हो
ग्रंथों का क्रम: पुरोहित या आचार्य का गोत्र-प्रवर; वह भी न हो तो किसी को आत्म-दान; और अंत में विवाह के अलावा दूसरे कर्मों में काश्यप (संस्काररत्नमाला pp. 426–427; धर्मसिन्धु p. 274)। विस्तार "गोत्र पता न हो तो संकल्प" लेख में है।
