संस्काररत्नमाला का क्रम
| स्थिति | क्या करें | स्रोत |
|---|---|---|
| अपना गोत्र-प्रवर ज्ञात | वही बोलें | — |
| अपना ज्ञात नहीं | पुरोहित का या आचार्य का प्रवर | संस्काररत्नमाला p. 426 (सूत्र); प्रवरमञ्जरी p. 128 |
| आचार्य का भी ज्ञात नहीं | स्वयं को किसी को देकर उसका गोत्र-प्रवर लें | संस्काररत्नमाला p. 427 (स्मृत्यन्तर) |
| पुरोहित-आचार्य का गोत्र भी अज्ञात | "काश्यप गोत्र" — पर विवाह में नहीं | संस्काररत्नमाला p. 427; धर्मसिन्धु p. 274 |
पहला उपाय: पुरोहित या आचार्य का प्रवर
अथानाज्ञातबन्धोः पुरोहितप्रवरेणाऽऽचार्यप्रवरेण वा।जिसके बन्धु (गोत्र-प्रवर) ठीक से ज्ञात न हों, उसका प्रवरण पुरोहित के प्रवर से, या आचार्य के प्रवर से हो।
यह सूत्र संस्काररत्नमाला "अनाज्ञात-बन्धुओं के गोत्र-प्रवर काण्ड" में देती है, और व्याख्या करती है: पुरोहित का प्रवर, या धर्म का उपदेश देने वाले आचार्य का प्रवर। प्रवरमञ्जरी (p. 128) भी आचार्य का गोत्र-प्रवर अपनाने को कहती है, और उदाहरण सत्यकाम जाबाल का देती है। ध्यान रहे, उसके अनुसार तब आचार्य के गोत्र वालों से विवाह नहीं होता।
दूसरा उपाय: आत्म-दान
आचार्यगोत्रप्रवरानभिज्ञस्तु द्विजः स्वयम्। दत्त्वाऽऽत्मानं तु कस्मैचित्तद्गोत्रप्रवरो भवेत्॥जो द्विज आचार्य के गोत्र-प्रवर भी न जानता हो, वह स्वयं को किसी को दे दे (उसका दत्तक बने), और उसी के गोत्र-प्रवर वाला हो जाए।
संस्काररत्नमाला बताती है कि यहाँ "आचार्य" शब्द पुरोहित को भी समेटता है, और यह विधि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — तीनों के लिए है।
अंतिम: "काश्यपं गोत्रमुच्यते" — और उसकी सीमा
यत्तु—"गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते" इति तत्पुरोहिताचार्ययोर्गोत्राज्ञाने सत्येव विवाहातिरिक्तविषयम्।और जो कहा गया है — "गोत्र का ज्ञान न हो तो काश्यप गोत्र कहा जाता है" — वह तभी लागू है जब पुरोहित और आचार्य का गोत्र भी ज्ञात न हो, और विवाह को छोड़कर दूसरे कर्मों के लिए है।
यही वचन धर्मसिन्धु (p. 274) श्राद्ध-परिभाषा में बिना किसी शर्त के उद्धृत करता है: "गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते"। इसलिए श्राद्ध जैसे कर्मों में, जहाँ पितर का गोत्र पता न हो, काश्यप बोलना ग्रंथ-सम्मत है।
पर संस्काररत्नमाला इस वचन को दो शर्तों से बाँधती है: (1) जब पुरोहित और आचार्य का गोत्र भी पता न हो, और (2) विवाह के अलावा दूसरे कर्मों में। यानी विवाह के सगोत्र-विचार के लिए "काश्यप" मान लेना इस ग्रंथ के अनुसार ठीक नहीं।
इस साइट पर पहले हमने लिखा था कि "कश्यप" वाली बात का शास्त्रीय प्रमाण नहीं मिला। संस्काररत्नमाला और धर्मसिन्धु पढ़ने के बाद यह सुधारा गया है: प्रमाण है, पर ऊपर की सीमाओं के साथ।
