पूजा में गोत्र क्यों बोला जाता है? — ग्रंथों का कारण

पूजा-पाठ और संस्कारों में गोत्र-प्रवर बोलने का कारण, संस्काररत्नमाला और प्रवरमञ्जरी के वचनों से: यज्ञ में ऋषियों का आह्वान, "बन्धोरेव नैति" वाली श्रुति, और कहाँ यह शास्त्र-वचन है, कहाँ परंपरा।

संक्षेप में

गोत्र बोलने की जड़ यज्ञ में है। प्रवरमञ्जरी और संस्काररत्नमाला के अनुसार यज्ञ में यजमान के गोत्र-ऋषियों के नाम अग्नि के विशेषण के रूप में लिए जाते हैं, और श्रुति कहती है कि ऐसा करने से यजमान अपने पूर्व-ऋषियों के संबंध से नहीं हटता। विवाह में यह शास्त्र-वचन है; पर शान्ति आदि दूसरे कर्मों में कहीं वचन से है और कहीं केवल परंपरा से।

जड़: यज्ञ में ऋषियों का नाम

प्रव्रियन्तेऽग्नेर्विशेषणत्वेनोत्कीर्त्यन्त इति प्रवराः।

जिन (ऋषियों) के नाम अग्नि के विशेषण के रूप में लिए जाते हैं, वे प्रवर हैं।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 416 (archive.org leaf n419)

संस्काररत्नमाला प्रवर का अर्थ बताती है: जिन ऋषियों के नाम अग्नि के विशेषण के रूप में लिए जाते हैं, वे प्रवर हैं — जैसे इष्टि के मन्त्र "अग्ने महाँ असि ब्राह्मण भारत" में। प्रवरमञ्जरी (p. 8) भी यही कहती है कि होता और अध्वर्यु यजमान के गोत्र-ऋषियों के नाम लेकर अग्नि का आह्वान करते हैं।

यानी गोत्र-प्रवर बोलना किसी व्यक्ति का "परिचय" भर नहीं, बल्कि कर्म का हिस्सा है: यजमान किस ऋषि-वंश का है, उसके अनुसार अग्नि को संबोधित किया जाता है।

श्रुति का कारण

आर्षेयं वृणीते बन्धोरेव नैत्यथो संतत्या इति विज्ञायते।

(यजमान का) आर्षेय वरण किया जाता है — इससे वह अपने बन्धु (पूर्व ऋषियों के संबंध) से नहीं हटता, और संतति (वंश) के लिए भी — ऐसा श्रुति से जाना जाता है।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 416 (प्रवर-सूत्र की व्याख्या) (archive.org leaf n419)

संस्काररत्नमाला इस श्रुति की व्याख्या करती है: आहवनीय अग्नि यजमान ने उत्पन्न की है, इसलिए वह यजमान के ऋषि-वंश की "संतान" है; उसका आर्षेय वरण करने से यजमान अपने पूर्व-ऋषियों के संबंध से नहीं छूटता, और यह पूर्वजों और अपनी संतति के लिए है।

इसी जगह एक और श्रुति है: "न देवैर्न मनुष्यैरार्षेयं वृणीत, ऋषिभिरेवार्षेयं वृणीत" — आर्षेय देवताओं या मनुष्यों के नाम से नहीं, केवल ऋषियों के नाम से वरा जाए।

कहाँ शास्त्र-वचन, कहाँ परंपरा

विवाह आर्षगोत्रोच्चारणं तु वाचनिकं, तच्च सप्रवरत्वसगोत्रत्वशङ्कानिवारणार्थमदृष्टार्थं च भवति। शान्त्यादिकर्मसु तु वाचनिकं कुत्रचित्। कुत्रचिदाचारप्राप्तम्।

विवाह में आर्षेय (प्रवर) और गोत्र बोलना शास्त्र-वचन से है; यह समान प्रवर या समान गोत्र की शंका दूर करने के लिए, और अदृष्ट (पुण्य) फल के लिए है। शान्ति आदि कर्मों में यह कहीं वचन से है, और कहीं आचार (परंपरा) से आया है।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 416 (archive.org leaf n419)

यह वचन साफ़ भेद करता है। विवाह में गोत्र-प्रवर बोलना शास्त्र का आदेश है, और उसका एक व्यावहारिक कारण भी बताया गया है — सगोत्र या सप्रवर होने की शंका दूर करना। पर शान्ति आदि कर्मों में गोत्र बोलना "कहीं वचन से, कहीं आचार से" है।

इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि हर पूजा में गोत्र बोलना शास्त्र-अनिवार्य है। कुछ कर्मों में ग्रंथ इसे आवश्यक कहते हैं (जैसे श्राद्ध के कुछ चरण — धर्मसिन्धु), और बहुत-सी पूजाओं में यह परिवार और क्षेत्र की परंपरा है।

किन कर्मों में गोत्र आता है

हर कर्म का विस्तार इस खंड के अलग लेखों में है।

कर्मगोत्र कहाँस्रोत
यज्ञ/ग्रह-यज्ञआचार्य-वरण में यजमान और आचार्य दोनों का प्रवर-गोत्रसंस्काररत्नमाला p. 129
उपनयनअभिवादन-वाक्य मेंसंस्काररत्नमाला p. 214
विवाहकन्यादान के संकल्प में वर और कन्या का प्रवर-गोत्रसंस्काररत्नमाला p. 551
श्राद्धसंकल्प, आवाहन, पिण्ड-दान आदि में पितर का गोत्रधर्मसिन्धु p. 274
अन्त्येष्टिजलांजलि में मृतक का गोत्र-नामआश्वलायन गृह्यसूत्र IV.4.10

स्रोत

पूजा में गोत्र क्यों बोला जाता है — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न