कन्यादान का वाक्य
…अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नायामुकप्रपौत्रायामुकपौत्रायामुकपुत्रायामुकशर्मणे कन्यार्थिने श्रीधररूपिणे वराय, अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नाममुकप्रपौत्रीममुकपौत्रीममुकस्य मम पुत्रीममुकनाम्नीं कन्यां … तुभ्यमहं प्रतिपादये।अमुक प्रवर और गोत्र वाले, अमुक के प्रपौत्र, अमुक के पौत्र, अमुक के पुत्र, अमुक शर्मा नाम के वर को — अमुक प्रवर और गोत्र में जन्मी, अमुक की प्रपौत्री, अमुक की पौत्री, मेरी पुत्री अमुक नाम की कन्या को … मैं तुम्हें देता हूँ।
संस्काररत्नमाला (p. 551) के कन्यादान-प्रयोग में कर्ता पहले "अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्" कहकर संकल्प करता है, फिर यह दान-वाक्य बोलकर जौ, अक्षत, तुलसी-पत्र और कुश सहित जल वर के हाथ में छोड़ता है। वर "ॐ स्वस्ति" कहकर स्वीकार करता है।
इसके बाद का श्लोक "गौरीं कन्यामिमां विप्र यथाशक्ति विभूषिताम्। गोत्राय शर्मणे तुभ्यं दत्तां विप्र समाश्रय" भी (p. 552) वर के गोत्र और नाम का स्थान रखता है।
गोत्र क्यों बोला जाता है
विवाह आर्षगोत्रोच्चारणं तु वाचनिकं, तच्च सप्रवरत्वसगोत्रत्वशङ्कानिवारणार्थमदृष्टार्थं च भवति। शान्त्यादिकर्मसु तु वाचनिकं कुत्रचित्। कुत्रचिदाचारप्राप्तम्।विवाह में आर्षेय (प्रवर) और गोत्र बोलना शास्त्र-वचन से है; यह समान प्रवर या समान गोत्र की शंका दूर करने के लिए, और अदृष्ट (पुण्य) फल के लिए है। शान्ति आदि कर्मों में यह कहीं वचन से है, और कहीं आचार (परंपरा) से आया है।
यानी सबके सामने दोनों पक्षों के प्रवर-गोत्र बोलना ही सगोत्र-सप्रवर की आख़िरी जाँच है। सगोत्र का नियम क्या है, इस पर अलग लेख है।
माता कन्यादान करे तो — विवाह के बाद स्त्री का गोत्र
जननी चेद्दानं कुर्यात्तदा[ऽमुक]गोत्राऽमुकनाम्न्यहमिति विकारः। भर्तृगोत्रमेवेत्थं सा वदेन्न गोत्रोत्पन्नेति। पितृगोत्रं नैव वदेत्।अगर माता कन्यादान करे, तो वाक्य बदलकर "अमुक गोत्र की, अमुक नाम की मैं" कहे। वह इस तरह पति का ही गोत्र बोले, "गोत्र में जन्मी" न कहे; पिता का गोत्र बिल्कुल न बोले।
यह वचन "विवाह के बाद स्त्री का गोत्र" वाले प्रश्न का सीधा ग्रंथ-आधार है: कन्यादान करने वाली माता अपने पति का गोत्र बोलती है, और पिता (यानी अपने मायके) का गोत्र "बिल्कुल न बोले"। वह "गोत्रोत्पन्ना" (उस गोत्र में जन्मी) भी नहीं कहती — क्योंकि पति का गोत्र उसका जन्म-गोत्र नहीं, विवाह से मिला गोत्र है।
संस्काररत्नमाला यह भी बताती है कि पितामह, प्रपितामह, भाई या कोई और संबंधी कन्यादान करे तो वाक्य कैसे बदलता है; और ऐसे में भी कन्या के लिए उसके पिता का गोत्र बोला जाता है (दत्तक कन्या हो, तो गोद लेने वाले का)।
दत्तक (गोद लिया पुत्र) का गोत्र
यदि दत्तकः कन्याया दानं कुर्यात्तदा प्रतिगृहीतो येन तद्गोत्रमेव स्वस्य कन्यायाश्च विशेषणत्वेन वदेत्।अगर दत्तक (गोद लिया हुआ) पुत्र कन्यादान करे, तो जिसने उसे गोद लिया उसी का गोत्र अपने लिए और कन्या के लिए बोले।
ग्रंथ आगे कहता है: दत्तक कन्या का दान हो तब भी अपना (गोद लेने वाले का) गोत्र बोला जाए, और दत्तक वर के लिए भी उसी का गोत्र जिसने उसे गोद लिया।
पर विवाह-निषेध के लिए नियम अलग है। संस्काररत्नमाला (p. 451) कौस्तुभ का मत देती है: "विवाहे तु दत्तकमात्रेण बीजिप्रतिग्रहीत्रोः पित्रोर्गोत्रप्रवरवर्जनं कार्यम्" — विवाह में दत्तक को जन्म देने वाले और गोद लेने वाले, दोनों पिताओं के गोत्र-प्रवर टालने चाहिए। दत्तक-मीमांसा के कर्ता का मत है कि यह केवल "द्व्यामुष्यायण" (दोनों पिताओं का माना गया) दत्तक पर लागू है। ग्रंथ दोनों मत देता है।
गोत्र अलग, प्रवर एक — या उलटा
संस्काररत्नमाला (p. 415) "असमानार्षगोत्रजा" (असमान प्रवर और असमान गोत्र वाली कन्या) की व्याख्या में दो उदाहरण देती है: कभी गोत्र अलग होते हुए भी प्रवर एक होता है, जैसे वाधूल, मौन, मौक आदि का "भार्गव, वैतहव्य, सावेदस"; और कभी प्रवर अलग होते हुए भी गोत्र एक, जैसे यौवनाश्व। इसलिए दोनों — गोत्र और प्रवर — देखे जाते हैं।
