पिंडदान और जलांजलि में गोत्र — गृह्यसूत्र और धर्मसिन्धु

पिंडदान और अन्त्येष्टि की जलांजलि में गोत्र: आश्वलायन गृह्यसूत्र IV.4.10 का "गोत्र-नाम और नाम", धर्मसिन्धु में पिण्ड-दान पर गोत्र आवश्यक, और गोत्र-नाम न पता हों तो क्या — मूल स्रोतों से।

संक्षेप में

पिंडदान में पितर का गोत्र और नाम बोलना ग्रंथों में आवश्यक बताया गया है। धर्मसिन्धु की श्राद्ध-परिभाषा पिण्ड-दान को उन चरणों में गिनाती है जहाँ संबंध, गोत्र और नाम बोलना ज़रूरी है। आश्वलायन गृह्यसूत्र (IV.4.10) के अनुसार दाह-संस्कार के बाद संबंधी जल में एक-एक अंजलि देते हुए मृतक का गोत्र-नाम और नाम बोलते हैं।

अन्त्येष्टि के बाद जलांजलि

…they pour out one handful (of water), pronounce the Gotra name and the proper name (of the deceased), go out (of the water)…

(दाह-संस्कार के बाद जल में) वे एक-एक अंजलि जल देते हैं, और (मृतक का) गोत्र-नाम और अपना नाम बोलते हैं…

— The Grihya-sutras, Part I (Sacred Books of the East, vol. 29), आश्वलायन गृह्यसूत्र IV.4.10 (SBE 29, pp. 243–244)

यह आश्वलायन गृह्यसूत्र का अपना शब्द है। Oldenberg की टिप्पणी के अनुसार टीकाकार नारायण कहते हैं कि सब समानोदक संबंधी, पुरुष और स्त्रियाँ, एक-एक अंजलि जल दें, और मृतक का गोत्र-नाम और नाम ऐसे बोलें — "देवदत्त, काश्यप गोत्र के, यह जल तुम्हारे लिए है!" — और दक्षिण की ओर मुख करके जल छोड़ें।

पिण्ड-दान पर गोत्र आवश्यक

संकल्पे क्षणदाने पाद्ये आसने आवाहनेऽर्घ्यदाने गन्धाद्याच्छादनान्तपञ्चोपचारेऽन्नदाने पिण्डदानेऽञ्जनाभ्यञ्जनयोरक्षय्ये स्वधावाचने च संबन्धगोत्रनामोच्चारणमावश्यकमन्यत्र कृताकृतम्।

संकल्प, क्षण-दान, पाद्य, आसन, आवाहन, अर्घ्य, गन्ध से वस्त्र तक के पाँच उपचार, अन्न-दान, पिण्ड-दान, अञ्जन-अभ्यञ्जन, अक्षय्य और स्वधा-वाचन — इनमें (पितर का) संबंध, गोत्र और नाम बोलना आवश्यक है; बाक़ी जगह बोलें या न बोलें।

— धर्मसिन्धु (धर्मसिन्धुसार), p. 274 (श्राद्ध-परिभाषा) (archive.org leaf n296)

धर्मसिन्धु पिण्ड-दान, और उसके साथ पिण्ड पर अञ्जन-अभ्यञ्जन, को उन चरणों में गिनता है जहाँ गोत्र-नाम छोड़ा नहीं जा सकता। उसी पृष्ठ पर वह पिण्ड-दान में नाम की विभक्ति के बारे में भी नियम देता है।

गोत्र या नाम पता न हो

गोत्र अज्ञात हो तो धर्मसिन्धु (p. 274): "गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते"। नाम अज्ञात हों तो आश्वलायन का मत: "तात, पितामह, प्रपितामह" कहें; दूसरी शाखा में "पृथिवीषद्, अन्तरिक्षसद्, दिविषद्"।

पूरी विधि

पिंडदान का पूरा क्रम, स्थान (जैसे गया) और समय इस साइट के पितृ पक्ष खंड में है। यह लेख केवल यह बताता है कि उसमें गोत्र कहाँ और कैसे आता है।

साइट पर पूरी विधि

स्रोत

पिंडदान में गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न