हिंदू धर्म के प्रमुख ऋषि और महर्षि

ऋषि, महर्षि, राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि में अंतर, सप्तर्षि, मंत्रद्रष्टा, रामायण-महाभारत के ऋषि — मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण और रामायण के श्लोक-संदर्भ सहित।

संक्षेप में

ऋषि वह है जिसने तप, सत्य और ज्ञान से ऊँचा स्थान पाया। मत्स्य पुराण (अध्याय 145) ऋषि की यही पहचान बताता है। ग्रंथ ऋषियों को राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि जैसी श्रेणियों में भी रखते हैं। यहाँ 38 ऋषियों के पृष्ठ हैं, और हर बात के साथ उसका ग्रंथ और श्लोक या पृष्ठ दिया गया है।

ऋषि किसे कहते हैं?

मत्स्य पुराण के अनुसार ऋषि वह है जिसने ब्रह्म का ज्ञान, सत्य, विद्या, तप और शास्त्रों का ज्ञान पाया हो। जो ऋषि अपनी बुद्धि से परम तत्त्व में लीन हो जाए, उसे "परमर्षि" कहा गया है।

"ऋषि" शब्द "ऋष्" धातु से माना गया है, जिसका अर्थ है जाना या गति। मत्स्य पुराण यही अर्थ देता है, और विष्णु पुराण के अनुवादक Wilson भी अपनी टिप्पणी में यही लिखते हैं।

मत्स्य पुराण कहता है कि कठिन तप करने वाले ऋषियों के सामने मंत्र स्वयं प्रकट हुए। इसीलिए ऋषियों को मंत्र "रचने" वाला नहीं, "देखने" वाला — मंत्रद्रष्टा — कहा जाता है।

मत्स्य पुराण में ऋषियों के प्रकार
नामग्रंथ में पहचानस्रोत
परमर्षिब्रह्मा के मानस-पुत्र, जो जन्म से ही ऋषि थेमत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–91 (p. 50)
ऋषिमहत् तत्त्व से उत्पन्न, और तप से ऋषि बने उनके पुत्रमत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–94 (p. 50)
ऋषिकऋषियों के पुत्रमत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50)
ऋषिपुत्रकऋषिकों के पुत्रमत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50)
श्रुतर्षिजिन्होंने दूसरों से सुनकर तत्त्व को जानामत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50)

सभी ऋषि (38)

38 ऋषि

बाक़ी ऋषियों के पृष्ठ ग्रंथों से जाँच के बाद जुड़ेंगे।

ऋषि, महर्षि, राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि में अंतर

विष्णु पुराण ऋषियों के तीन प्रकार गिनाता है — राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि। ध्यान दें: इनके उदाहरण (विश्वामित्र, नारद, वसिष्ठ) मूल श्लोक में नहीं, उसकी टीका में हैं। अनुवादक Wilson ने यह बात अपनी टिप्पणी में साफ़ लिखी है।

Wilson यहाँ वायु पुराण का हवाला भी देते हैं। उसके अनुसार ब्रह्मर्षि पाँच गोत्र-प्रवर्तकों के वंशज हैं — कश्यप, वसिष्ठ, भृगु, अंगिरा और अत्रि। इसी टिप्पणी में देवर्षियों में नर-नारायण, नारद और पर्वत के नाम हैं, और राजर्षियों में इक्ष्वाकु जैसे राजा।

"मुनि" शब्द की अलग परिभाषा हमें इन ग्रंथों में नहीं मिली। रामायण की पहली ही पंक्ति में नारद को "मुनिपुंगव" कहा गया है, और अगले सर्ग में "देवर्षि"। यानी ग्रंथ एक ही व्यक्ति के लिए दोनों शब्द बरतते हैं।

ग्रंथों में ये शब्द कैसे आते हैं
शब्दग्रंथ में उदाहरणस्रोत
राजर्षिराजा, जिसने तप से ऋषि-पद पाया। ब्रह्मा विश्वामित्र से कहते हैं: "राजर्षिर् इति विद्महे"वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.56.5; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 6 (vol. 3, p. 68)
ऋषिब्रह्मा अगले चरण में विश्वामित्र से: "ऋषिस् त्वम् असि"वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.62.2
महर्षिदेवता कहते हैं: विश्वामित्र को "महर्षि" शब्द मिलेवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.62.16
ब्रह्मर्षिवसिष्ठ विश्वामित्र से: "ब्रह्मर्षित्वं न संदेहः"वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.64.17; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 6 (vol. 3, p. 68)
देवर्षिरामायण में "देवर्षिर् नारदः"; महाभारत में "celestial Rishi Narada"वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.2.2; महाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section V

एक ऋषि, चार पद: विश्वामित्र की तपस्या

इन शब्दों का अंतर सबसे साफ़ विश्वामित्र की कथा में दिखता है। वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में राजा विश्वामित्र तप करते हैं, और हर बार ब्रह्मा उन्हें अगला पद देते हैं। विश्वामित्र हर बार और कठिन तप में लग जाते हैं।

अंत में वसिष्ठ स्वयं उन्हें ब्रह्मर्षि मानते हैं, और विश्वामित्र वसिष्ठ की पूजा करते हैं। दोनों के बीच का पुराना संघर्ष यहीं मित्रता में बदलता है।

विश्वामित्र को मिले पद, क्रम से
पदकिसने कहास्रोत
राजर्षिब्रह्मावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.56.5; रामायण (Griffith अनु.), Canto LVII
ऋषिब्रह्मावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.62.2; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXIII
महर्षिदेवताओं की सलाह पर ब्रह्मावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.62.16; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXIII
ब्रह्मर्षिब्रह्मा, और फिर वसिष्ठ ने मानावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.64.17; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXV

सप्तर्षि कौन हैं?

विष्णु पुराण के अनुसार अभी चल रहे वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं — वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज। बृहदारण्यक उपनिषद (2.2.4) भी यही सात नाम देता है।

ध्यान रखें कि हर मन्वन्तर के सप्तर्षि अलग बताए गए हैं। ब्रह्मा के मानस-पुत्रों की सूचियाँ भी इनसे अलग हैं। इसलिए "सप्तर्षि कौन" का उत्तर हमेशा "किस ग्रंथ के अनुसार" के साथ देना चाहिए।

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वैदिक ऋषि और मंत्रद्रष्टा

ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मण्डल तक हर मण्डल एक ऋषि-कुल का है। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी हर सूक्त के साथ उसके ऋषि का नाम देती है।

मत्स्य पुराण 92 मंत्रकृत ऋषियों के नाम कुल के हिसाब से गिनाता है। इनमें मनु वैवस्वत और राजा पुरूरवा ऐल जैसे राजा भी हैं, और तीन वैश्य ऋषि भी।

ऋग्वेद के "कुल-मण्डल" (सर्वानुक्रमणी के अनुसार)
मण्डलऋषिस्रोत
2गृत्समदसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14
3विश्वामित्रसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14
4वामदेव गौतमसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 17
5भौम अत्रिसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 19
6बार्हस्पत्य भरद्वाजसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 22
7वसिष्ठसर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 24
मत्स्य पुराण के 92 मंत्रकृत ऋषि, कुल के अनुसार
कुलगिनतीस्रोत
भृगु-कुल (दधीचि, जमदग्नि, शौनक आदि)19मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 95–100
अंगिरा-कुल (भरद्वाज, गर्ग, मुद्गल, वामदेव आदि)33मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 101–105
कश्यप-कुल6मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
अत्रि-कुल6मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
वसिष्ठ-कुल (वसिष्ठ, शक्ति, पराशर आदि)7मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
कौशिक-कुल (विश्वामित्र आदि)13मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
अगस्त्य-कुल3मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
राजा: मनु वैवस्वत, पुरूरवा ऐल2मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118
वैश्य: भलन्दक, वासाश्व, संकील3मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118

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रामायण के प्रमुख ऋषि

वाल्मीकि रामायण की शुरुआत ही दो ऋषियों से होती है। वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि इस संसार में सबसे गुणवान कौन है। उत्तर में नारद राम की कथा सुनाते हैं।

नीचे के ऋषि रामायण में राम से मिलते हैं या कथा में आते हैं। जिन नामों पर link है, उनके पृष्ठ इस साइट पर हैं। बाक़ी के पृष्ठ स्रोत-जाँच के बाद जुड़ेंगे।

रामायण के ऋषि और उनका प्रसंग
ऋषिप्रसंगस्रोत
वाल्मीकिक्रौंच पक्षी के वध पर शोक से पहला श्लोक "मा निषाद" निकलावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.2.9–14; रामायण (Griffith अनु.), Canto II
नारदवाल्मीकि को राम की कथा सुनाईवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.1–1.2.2
विश्वामित्रराम-लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए ले गए; राजर्षि से ब्रह्मर्षिवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.18–64
वसिष्ठदशरथ के पुरोहितवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.11.6
ऋष्यशृंगविभाण्डक काश्यप के पुत्र; दशरथ के यज्ञ के लिए बुलाए गएवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.8–13
गौतमआश्रम में इन्द्र और अहल्या का प्रसंग; राम के आने पर अहल्या मुक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.47–48; रामायण (Griffith अनु.), Cantos XLVIII–XLIX
जामदग्न्य राम (परशुराम)विवाह के बाद लौटते राम से धनुष का प्रसंगवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.73–75
भरद्वाजगंगा के पास आश्रम; पहले राम, फिर भरत यहाँ रुकेवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.48; 2.84
अत्रिराम अत्रि के आश्रम में गएवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.109.5
शरभंग, सुतीक्ष्णदण्डकारण्य में राम इनके आश्रम गएवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.3–4; 3.6
अगस्त्यराम का अगस्त्य-आश्रम जानावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.11
मतंगपम्पा के पास मतंग-वन और उनके शिष्यवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.69.16–22

सर्ग-संख्या समीक्षित पाठ (Baroda) की है। Griffith जैसे पुराने संस्करणों में यही प्रसंग प्रायः एक सर्ग आगे मिलता है — जैसे अहल्या: 1.47 बनाम Canto XLVIII।

महाभारत के प्रमुख ऋषि

महाभारत स्वयं एक ऋषि की कृति मानी गई है — कृष्ण द्वैपायन व्यास की। आदि पर्व के अनुसार व्यास सत्यवती और पराशर के पुत्र थे। द्वीप पर जन्म लेने से वे "द्वैपायन" कहलाए।

व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने यह कथा राजा जनमेजय के सर्प-यज्ञ में पूरी सुनाई। आज जो महाभारत हम पढ़ते हैं, वह इसी सुनाने की परंपरा से आई है।

महाभारत के ऋषि और उनका प्रसंग (K. M. Ganguli का अनुवाद)
ऋषिप्रसंगस्रोत
वेदव्यासमहाभारत के रचयिता; सत्यवती और पराशर के पुत्रमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I, LXIII
वैशम्पायनव्यास के शिष्य; जनमेजय को महाभारत सुनाईमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I
नारद"देवर्षि"; युधिष्ठिर की सभा में आएमहाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section V
दुर्वासाकुन्ती को देवताओं को बुलाने का मंत्र दियामहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CXI; उद्योग पर्व, Section CXLIV
धौम्यपाण्डवों के पुरोहित बनेमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXXV
लोमशतीर्थ-यात्रा में पाण्डवों के साथ रहेमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XLVII, XCI
मार्कण्डेयवन में पाण्डवों को अनेक कथाएँ सुनाईंमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CLXXXI से
शौनकनैमिष वन का बारह वर्ष का यज्ञ, जहाँ महाभारत सुनाई गईमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I
अगस्त्यलोपामुद्रा से विवाह; वातापि की कथामहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVI–XCIX
च्यवनसुकन्या की कथामहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXII
माण्डव्य"अणी-माण्डव्य"; इनके शाप से धर्मराज विदुर बनकर जन्मेमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CVI–CVIII
कण्वशकुन्तला के पालक ऋषिमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXX–LXXI
गालवविश्वामित्र के शिष्य; गुरु-दक्षिणा के आठ सौ घोड़ेमहाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CVI–CXVI

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ऋषि और ग्रंथ: किसने क्या दिया

विष्णु पुराण के अनुसार हर द्वापर युग में एक व्यास वेद को बाँटते हैं। अब तक 28 व्यास हो चुके हैं, और 28वें व्यास कृष्ण द्वैपायन हैं। यानी "व्यास" एक पद भी है, केवल एक नाम नहीं।

कृष्ण द्वैपायन व्यास ने वेद को चार भागों में बाँटा और हर भाग एक शिष्य को सौंपा। इतिहास और पुराण की परंपरा उन्होंने सूत लोमहर्षण को दी।

ग्रंथ और उनसे जुड़े ऋषि
ग्रंथऋषि-परंपरास्रोत
वाल्मीकि रामायणवाल्मीकि ने रचा; कुश और लव ने गाकर सुनायावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.2; 1.4.3–15
महाभारतव्यास ने रचा; वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनायामहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I
ऋग्वेदपैल को सौंपाविष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42)
यजुर्वेदवैशम्पायन को सौंपाविष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42)
सामवेदजैमिनि को सौंपाविष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42)
अथर्ववेदसुमन्तु को सौंपाविष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42)
इतिहास-पुराणसूत लोमहर्षण को सौंपा; उनके छह शिष्यविष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 और 6 (pp. 42, 64)
ऋग्वेद के मण्डल 2–7हर मण्डल एक ऋषि-कुल का (ऊपर की तालिका)सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), pp. 14–24

ऋषियों की महान गाथाएँ

ऋषियों की प्रसिद्ध कथाएँ, मूल ग्रंथों से — और जहाँ ग्रंथ अलग कहते हैं, वहाँ हर रूप उसके ग्रंथ के नाम से।

ऋषियों का योगदान

ऋषियों ने ज्ञान की कौन-सी परंपराएँ दीं, और वे गुरु से शिष्य तक कैसे चलीं — मूल ग्रंथों से।

ऋषि और गोत्र

बौधायन सूत्र के अनुसार गोत्र आठ ऋषियों की संतान हैं — विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य।

सप्तानां सप्तऋषीणामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रमित्युच्यते।

सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य की जो संतान है, उसे गोत्र कहा जाता है।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 136 (प्रवरमञ्जरी, बौधायन का वचन) (archive.org leaf 176)

स्रोत

ऋषियों के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न