ऋषि किसे कहते हैं?
मत्स्य पुराण के अनुसार ऋषि वह है जिसने ब्रह्म का ज्ञान, सत्य, विद्या, तप और शास्त्रों का ज्ञान पाया हो। जो ऋषि अपनी बुद्धि से परम तत्त्व में लीन हो जाए, उसे "परमर्षि" कहा गया है।
"ऋषि" शब्द "ऋष्" धातु से माना गया है, जिसका अर्थ है जाना या गति। मत्स्य पुराण यही अर्थ देता है, और विष्णु पुराण के अनुवादक Wilson भी अपनी टिप्पणी में यही लिखते हैं।
मत्स्य पुराण कहता है कि कठिन तप करने वाले ऋषियों के सामने मंत्र स्वयं प्रकट हुए। इसीलिए ऋषियों को मंत्र "रचने" वाला नहीं, "देखने" वाला — मंत्रद्रष्टा — कहा जाता है।
| नाम | ग्रंथ में पहचान | स्रोत |
|---|---|---|
| परमर्षि | ब्रह्मा के मानस-पुत्र, जो जन्म से ही ऋषि थे | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–91 (p. 50) |
| ऋषि | महत् तत्त्व से उत्पन्न, और तप से ऋषि बने उनके पुत्र | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–94 (p. 50) |
| ऋषिक | ऋषियों के पुत्र | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50) |
| ऋषिपुत्रक | ऋषिकों के पुत्र | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50) |
| श्रुतर्षि | जिन्होंने दूसरों से सुनकर तत्त्व को जाना | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 85–89 (p. 50) |
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38 ऋषि
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ऋषि, महर्षि, राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि में अंतर
विष्णु पुराण ऋषियों के तीन प्रकार गिनाता है — राजर्षि, देवर्षि और ब्रह्मर्षि। ध्यान दें: इनके उदाहरण (विश्वामित्र, नारद, वसिष्ठ) मूल श्लोक में नहीं, उसकी टीका में हैं। अनुवादक Wilson ने यह बात अपनी टिप्पणी में साफ़ लिखी है।
Wilson यहाँ वायु पुराण का हवाला भी देते हैं। उसके अनुसार ब्रह्मर्षि पाँच गोत्र-प्रवर्तकों के वंशज हैं — कश्यप, वसिष्ठ, भृगु, अंगिरा और अत्रि। इसी टिप्पणी में देवर्षियों में नर-नारायण, नारद और पर्वत के नाम हैं, और राजर्षियों में इक्ष्वाकु जैसे राजा।
"मुनि" शब्द की अलग परिभाषा हमें इन ग्रंथों में नहीं मिली। रामायण की पहली ही पंक्ति में नारद को "मुनिपुंगव" कहा गया है, और अगले सर्ग में "देवर्षि"। यानी ग्रंथ एक ही व्यक्ति के लिए दोनों शब्द बरतते हैं।
| शब्द | ग्रंथ में उदाहरण | स्रोत |
|---|---|---|
| राजर्षि | राजा, जिसने तप से ऋषि-पद पाया। ब्रह्मा विश्वामित्र से कहते हैं: "राजर्षिर् इति विद्महे" | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.56.5; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 6 (vol. 3, p. 68) |
| ऋषि | ब्रह्मा अगले चरण में विश्वामित्र से: "ऋषिस् त्वम् असि" | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.62.2 |
| महर्षि | देवता कहते हैं: विश्वामित्र को "महर्षि" शब्द मिले | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.62.16 |
| ब्रह्मर्षि | वसिष्ठ विश्वामित्र से: "ब्रह्मर्षित्वं न संदेहः" | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.64.17; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 6 (vol. 3, p. 68) |
| देवर्षि | रामायण में "देवर्षिर् नारदः"; महाभारत में "celestial Rishi Narada" | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.2.2; महाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section V |
एक ऋषि, चार पद: विश्वामित्र की तपस्या
इन शब्दों का अंतर सबसे साफ़ विश्वामित्र की कथा में दिखता है। वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में राजा विश्वामित्र तप करते हैं, और हर बार ब्रह्मा उन्हें अगला पद देते हैं। विश्वामित्र हर बार और कठिन तप में लग जाते हैं।
अंत में वसिष्ठ स्वयं उन्हें ब्रह्मर्षि मानते हैं, और विश्वामित्र वसिष्ठ की पूजा करते हैं। दोनों के बीच का पुराना संघर्ष यहीं मित्रता में बदलता है।
| पद | किसने कहा | स्रोत |
|---|---|---|
| राजर्षि | ब्रह्मा | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.56.5; रामायण (Griffith अनु.), Canto LVII |
| ऋषि | ब्रह्मा | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.62.2; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXIII |
| महर्षि | देवताओं की सलाह पर ब्रह्मा | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.62.16; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXIII |
| ब्रह्मर्षि | ब्रह्मा, और फिर वसिष्ठ ने माना | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.64.17; रामायण (Griffith अनु.), Canto LXV |
सप्तर्षि कौन हैं?
विष्णु पुराण के अनुसार अभी चल रहे वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं — वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज। बृहदारण्यक उपनिषद (2.2.4) भी यही सात नाम देता है।
ध्यान रखें कि हर मन्वन्तर के सप्तर्षि अलग बताए गए हैं। ब्रह्मा के मानस-पुत्रों की सूचियाँ भी इनसे अलग हैं। इसलिए "सप्तर्षि कौन" का उत्तर हमेशा "किस ग्रंथ के अनुसार" के साथ देना चाहिए।
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- सप्तर्षि और गोत्र — पूरा लेख
वैदिक ऋषि और मंत्रद्रष्टा
ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मण्डल तक हर मण्डल एक ऋषि-कुल का है। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी हर सूक्त के साथ उसके ऋषि का नाम देती है।
मत्स्य पुराण 92 मंत्रकृत ऋषियों के नाम कुल के हिसाब से गिनाता है। इनमें मनु वैवस्वत और राजा पुरूरवा ऐल जैसे राजा भी हैं, और तीन वैश्य ऋषि भी।
| मण्डल | ऋषि | स्रोत |
|---|---|---|
| 2 | गृत्समद | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14 |
| 3 | विश्वामित्र | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14 |
| 4 | वामदेव गौतम | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 17 |
| 5 | भौम अत्रि | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 19 |
| 6 | बार्हस्पत्य भरद्वाज | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 22 |
| 7 | वसिष्ठ | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 24 |
| कुल | गिनती | स्रोत |
|---|---|---|
| भृगु-कुल (दधीचि, जमदग्नि, शौनक आदि) | 19 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 95–100 |
| अंगिरा-कुल (भरद्वाज, गर्ग, मुद्गल, वामदेव आदि) | 33 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 101–105 |
| कश्यप-कुल | 6 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| अत्रि-कुल | 6 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| वसिष्ठ-कुल (वसिष्ठ, शक्ति, पराशर आदि) | 7 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| कौशिक-कुल (विश्वामित्र आदि) | 13 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| अगस्त्य-कुल | 3 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| राजा: मनु वैवस्वत, पुरूरवा ऐल | 2 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
| वैश्य: भलन्दक, वासाश्व, संकील | 3 | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), अध्याय 145, श्लोक 106–118 |
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रामायण के प्रमुख ऋषि
वाल्मीकि रामायण की शुरुआत ही दो ऋषियों से होती है। वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि इस संसार में सबसे गुणवान कौन है। उत्तर में नारद राम की कथा सुनाते हैं।
नीचे के ऋषि रामायण में राम से मिलते हैं या कथा में आते हैं। जिन नामों पर link है, उनके पृष्ठ इस साइट पर हैं। बाक़ी के पृष्ठ स्रोत-जाँच के बाद जुड़ेंगे।
| ऋषि | प्रसंग | स्रोत |
|---|---|---|
| वाल्मीकि | क्रौंच पक्षी के वध पर शोक से पहला श्लोक "मा निषाद" निकला | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.2.9–14; रामायण (Griffith अनु.), Canto II |
| नारद | वाल्मीकि को राम की कथा सुनाई | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.1–1.2.2 |
| विश्वामित्र | राम-लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए ले गए; राजर्षि से ब्रह्मर्षि | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.18–64 |
| वसिष्ठ | दशरथ के पुरोहित | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.11.6 |
| ऋष्यशृंग | विभाण्डक काश्यप के पुत्र; दशरथ के यज्ञ के लिए बुलाए गए | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.8–13 |
| गौतम | आश्रम में इन्द्र और अहल्या का प्रसंग; राम के आने पर अहल्या मुक्त | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.47–48; रामायण (Griffith अनु.), Cantos XLVIII–XLIX |
| जामदग्न्य राम (परशुराम) | विवाह के बाद लौटते राम से धनुष का प्रसंग | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.73–75 |
| भरद्वाज | गंगा के पास आश्रम; पहले राम, फिर भरत यहाँ रुके | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.48; 2.84 |
| अत्रि | राम अत्रि के आश्रम में गए | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 2.109.5 |
| शरभंग, सुतीक्ष्ण | दण्डकारण्य में राम इनके आश्रम गए | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.3–4; 3.6 |
| अगस्त्य | राम का अगस्त्य-आश्रम जाना | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.11 |
| मतंग | पम्पा के पास मतंग-वन और उनके शिष्य | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 3.69.16–22 |
सर्ग-संख्या समीक्षित पाठ (Baroda) की है। Griffith जैसे पुराने संस्करणों में यही प्रसंग प्रायः एक सर्ग आगे मिलता है — जैसे अहल्या: 1.47 बनाम Canto XLVIII।
महाभारत के प्रमुख ऋषि
महाभारत स्वयं एक ऋषि की कृति मानी गई है — कृष्ण द्वैपायन व्यास की। आदि पर्व के अनुसार व्यास सत्यवती और पराशर के पुत्र थे। द्वीप पर जन्म लेने से वे "द्वैपायन" कहलाए।
व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने यह कथा राजा जनमेजय के सर्प-यज्ञ में पूरी सुनाई। आज जो महाभारत हम पढ़ते हैं, वह इसी सुनाने की परंपरा से आई है।
| ऋषि | प्रसंग | स्रोत |
|---|---|---|
| वेदव्यास | महाभारत के रचयिता; सत्यवती और पराशर के पुत्र | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I, LXIII |
| वैशम्पायन | व्यास के शिष्य; जनमेजय को महाभारत सुनाई | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I |
| नारद | "देवर्षि"; युधिष्ठिर की सभा में आए | महाभारत (Ganguli अनु.), सभा पर्व, Section V |
| दुर्वासा | कुन्ती को देवताओं को बुलाने का मंत्र दिया | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CXI; उद्योग पर्व, Section CXLIV |
| धौम्य | पाण्डवों के पुरोहित बने | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXXV |
| लोमश | तीर्थ-यात्रा में पाण्डवों के साथ रहे | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XLVII, XCI |
| मार्कण्डेय | वन में पाण्डवों को अनेक कथाएँ सुनाईं | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CLXXXI से |
| शौनक | नैमिष वन का बारह वर्ष का यज्ञ, जहाँ महाभारत सुनाई गई | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I |
| अगस्त्य | लोपामुद्रा से विवाह; वातापि की कथा | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section XCVI–XCIX |
| च्यवन | सुकन्या की कथा | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXII |
| माण्डव्य | "अणी-माण्डव्य"; इनके शाप से धर्मराज विदुर बनकर जन्मे | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CVI–CVIII |
| कण्व | शकुन्तला के पालक ऋषि | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXX–LXXI |
| गालव | विश्वामित्र के शिष्य; गुरु-दक्षिणा के आठ सौ घोड़े | महाभारत (Ganguli अनु.), उद्योग पर्व, Section CVI–CXVI |
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ऋषि और ग्रंथ: किसने क्या दिया
विष्णु पुराण के अनुसार हर द्वापर युग में एक व्यास वेद को बाँटते हैं। अब तक 28 व्यास हो चुके हैं, और 28वें व्यास कृष्ण द्वैपायन हैं। यानी "व्यास" एक पद भी है, केवल एक नाम नहीं।
कृष्ण द्वैपायन व्यास ने वेद को चार भागों में बाँटा और हर भाग एक शिष्य को सौंपा। इतिहास और पुराण की परंपरा उन्होंने सूत लोमहर्षण को दी।
| ग्रंथ | ऋषि-परंपरा | स्रोत |
|---|---|---|
| वाल्मीकि रामायण | वाल्मीकि ने रचा; कुश और लव ने गाकर सुनाया | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.2; 1.4.3–15 |
| महाभारत | व्यास ने रचा; वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I |
| ऋग्वेद | पैल को सौंपा | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42) |
| यजुर्वेद | वैशम्पायन को सौंपा | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42) |
| सामवेद | जैमिनि को सौंपा | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42) |
| अथर्ववेद | सुमन्तु को सौंपा | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (pp. 41–42) |
| इतिहास-पुराण | सूत लोमहर्षण को सौंपा; उनके छह शिष्य | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 और 6 (pp. 42, 64) |
| ऋग्वेद के मण्डल 2–7 | हर मण्डल एक ऋषि-कुल का (ऊपर की तालिका) | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), pp. 14–24 |
ऋषियों की महान गाथाएँ
ऋषियों की प्रसिद्ध कथाएँ, मूल ग्रंथों से — और जहाँ ग्रंथ अलग कहते हैं, वहाँ हर रूप उसके ग्रंथ के नाम से।
ऋषियों का योगदान
ऋषियों ने ज्ञान की कौन-सी परंपराएँ दीं, और वे गुरु से शिष्य तक कैसे चलीं — मूल ग्रंथों से।
ऋषि और गोत्र
बौधायन सूत्र के अनुसार गोत्र आठ ऋषियों की संतान हैं — विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य।
सप्तानां सप्तऋषीणामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रमित्युच्यते।सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य की जो संतान है, उसे गोत्र कहा जाता है।
स्रोत
- The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.) (1917)
- The Vishnu Purana, vol. 3 (Book III) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1866)
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020)
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896)
- The Rámáyan of Válmíki, translated into English verse — Ralph T. H. Griffith (अनु.) (1874)
- The Upanishads, Part II (Sacred Books of the East, vol. 15) — बृहदारण्यक उपनिषद — F. Max Müller (अनु.) (1884)
- Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886)
