महर्षि भरद्वाज
बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक
संक्षेप में
वनवास के पहले पड़ाव पर राम प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुँचे। भरद्वाज ने ही उन्हें चित्रकूट का रास्ता दिखाया। बाद में भरत आए, तो राम के प्रेम में भरद्वाज ने भरत की नीयत तक परखी। फिर उसी भरत की पूरी सेना का ऐसा सत्कार किया, जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।
गोत्रकार ऋषिसप्तर्षिमंत्रद्रष्टा ऋषि
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | गोत्रकार ऋषि, सप्तर्षि, मंत्रद्रष्टा ऋषि | गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 136 (archive.org leaf 176); विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 1 (vol. 3, p. 13); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 2.2.4 (SBE 15, p. 106); सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 22 (मण्डल 6 का आरंभ) |
| आश्रम और स्थान | प्रयाग (गंगा-यमुना संगम) | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), अयोध्या काण्ड 2.48.20; 2.85.45 |
जीवन और पृष्ठभूमि
वेद के द्रष्टा, और गंगा-यमुना के संगम के मुनि
सर्वानुक्रमणी कहती है — "बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज ने छठा मण्डल देखा।" यानी ऋग्वेद का छठा मण्डल भरद्वाज-परिवार का है।
रामायण में भरद्वाज का आश्रम प्रयाग में है, जहाँ गंगा और यमुना मिलती हैं। राम वहाँ पहुँचे, तो बाहर कटी लकड़ियाँ और तरह-तरह के पेड़ देखे। इन्हीं से वे पहचान गए कि भरद्वाज का आश्रम पास है।
महाभारत में द्रोणाचार्य भरद्वाज के पुत्र हैं। उनका नाम "द्रोण" उस पात्र (द्रोण-कलश) से पड़ा, जिसमें उनका जन्म हुआ। भरद्वाज ने आग्नेय अस्त्र की विद्या ऋषि अग्निवेश को दी थी, और अग्निवेश ने आगे द्रोण को।
ग्रंथों में
- "बार्हस्पत्यो भरद्वाजः षष्ठं मण्डलमपश्यत्" — बृहस्पति-पुत्र भरद्वाज ने छठा मण्डल देखा।
- भारद्वाज गण का प्रवर आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज है, और उसमें 255 नाम दर्ज हैं।
- मत्स्य पुराण भी यही प्रवर बताता है और कहता है कि इस समूह में आपस में विवाह नहीं होता।
प्रमुख कथाएँ
राम को चित्रकूट का रास्ता
भरद्वाज ने राम का स्वागत किया — "बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रहा हूँ। तुम्हारे अकारण वनवास की बात मैंने सुनी है। यह संगम की जगह पवित्र और सुंदर है, यहीं सुख से रहो।"
राम ने विनम्रता से मना किया — "यह अयोध्या से बहुत पास है। लोग मुझे और सीता को देखने आते रहेंगे। कोई एकांत जगह बताइए, जहाँ सीता का मन लगे।"
तब भरद्वाज ने कहा — "यहाँ से दस कोस पर चित्रकूट पर्वत है, जहाँ महर्षि रहते हैं। जब तक मनुष्य उसकी चोटियाँ देखता रहता है, उसका मन शुभ कामों में लगता है, पाप में नहीं।"
उस रात राम ने आश्रम में भरद्वाज के साथ अनेक कथाएँ सुनते-सुनाते बिताई। सुबह वे चित्रकूट के लिए चल पड़े।
भरत की परीक्षा, और स्वर्ग जैसा आतिथ्य
कुछ समय बाद भरत सेना के साथ प्रयाग पहुँचे। भरद्वाज के मन में राम के लिए स्नेह था, इसलिए उन्होंने सीधे पूछ लिया — "राज्य तो तुम्हें मिल गया, अब यहाँ क्यों आए? कहीं निर्दोष राम को हानि पहुँचाने तो नहीं जा रहे?"
भरत की आँखें भर आईं, गला रुँध गया — "भगवन्, आप भी मुझे ऐसा समझते हैं, तो मैं मारा गया। माँ ने जो कहा, वह मुझे नहीं चाहिए। मैं तो राम के चरण छूकर उन्हें अयोध्या लौटाने आया हूँ।"
तब भरद्वाज बोले — "मैं तुम्हारे मन की बात जानता था। मैंने यह इसलिए पूछा, ताकि तुम्हारी यह बात पक्की हो जाए, और तुम्हारा यश और बढ़े। राम चित्रकूट में हैं। आज रात यहीं रुको।"
भरद्वाज ने पूछा कि सेना दूर क्यों छोड़ी। भरत बोले — "हाथी-घोड़े आश्रम के पेड़, जल, भूमि और कुटियाओं को नुकसान न पहुँचाएँ, इसलिए अकेला आया।" ऋषि ने कहा — "सेना को यहीं ले आओ।"
फिर तप के बल से भरद्वाज ने पूरी सेना का सत्कार किया। खीर की नदियाँ बह चलीं, अप्सराएँ नाचीं, और स्वर्ग के फूल प्रयाग में दिखने लगे। ग्रंथ कहता है कि वह रात ऐसे बीती, जैसे देवता नन्दन वन में आनंद करते हैं।
पुत्र यवक्रीत, और बिना गुरु के ज्ञान
महाभारत में ऋषि लोमश यह कथा सुनाते हैं। भरद्वाज और ऋषि रैभ्य गहरे मित्र थे। भरद्वाज का इकलौता पुत्र था यवक्रीत। लोग वेद-विद्वान रैभ्य का आदर करते थे, पर तपस्वी भरद्वाज की उपेक्षा करते थे। यह देखकर यवक्रीत दुखी हुआ।
उसने बिना गुरु के, केवल तप से वेद पाने की ठानी। इन्द्र ने समझाया — "यह सही रास्ता नहीं, गुरु के मुख से सीखो।" फिर इन्द्र बूढ़े ब्राह्मण बनकर गंगा में रेत डालकर बाँध बनाने लगे।
यवक्रीत हँसा — "यह असंभव है।" इन्द्र बोले — "जैसे तुम्हारा बिना गुरु के वेद पाना।" अंत में इन्द्र ने वरदान दे ही दिया कि वेद उसे और उसके पिता को प्रकट हो जाएँगे।
तब भरद्वाज ने बेटे को चेताया — "वरदान से तुममें घमंड आएगा, और घमंड नाश लाता है। रैभ्य क्रोधी हैं, उनके आश्रम मत जाना।" पर यवक्रीत ऋषियों का अपमान करने लगा। उसने रैभ्य की पुत्रवधू से भी दुर्व्यवहार किया, और रैभ्य के क्रोध से मारा गया।
बेटे के शव से लिपटकर भरद्वाज ने शोक में रैभ्य को शाप दे दिया। फिर तुरंत पछताए — "दुख में अपने सबसे प्यारे मित्र को शाप देने वाले से बुरा कौन होगा!" और बेटे का दाह करके स्वयं भी अग्नि में प्रवेश कर गए।
आगे रैभ्य के पुत्र अर्वावसु के तप से देवताओं ने सबको फिर जीवित कर दिया। यवक्रीत ने पूछा कि वेद पाकर भी वह क्यों हारा। देवता बोले — "तुमने बिना परिश्रम, बिना गुरु के वेद पाए। रैभ्य ने कष्ट सहकर, गुरु को प्रसन्न करके, लंबे समय में पाए।"
ग्रंथों में अंतर
एक नाम, कई कथाएँ: "भरद्वाज" नाम कई जगह आता है। ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा, रामायण में प्रयाग के मुनि, और महाभारत में द्रोण व यवक्रीत के पिता। ग्रंथ स्वयं नहीं कहते कि ये सब एक ही व्यक्ति हैं।
रामायण के बाल काण्ड में वाल्मीकि के साथ तमसा नदी पर उनका एक शिष्य भी भरद्वाज नाम का है। वहाँ भी यह नहीं कहा गया कि वह प्रयाग वाले मुनि ही हैं।
शिक्षाएँ
ज्ञान का कोई छोटा रास्ता नहीं। यवक्रीत की कथा में देवता यही कहते हैं। गुरु की सेवा और लंबे परिश्रम से पाया ज्ञान ही टिकता है।
वरदान या सफलता के साथ विनम्रता भी चाहिए। भरद्वाज ने बेटे को यही चेताया था — घमंड और कठोरता आए, तो नाश जल्दी आता है।
चित्रकूट के बारे में भरद्वाज का वचन भी याद रखने लायक है। सुंदर, पवित्र जगह को देखते रहने से मन अच्छे कामों में लगता है।
ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान
ग्रंथ मेंऋग्वेद का छठा मण्डल — सर्वानुक्रमणी के अनुसार बृहस्पति-पुत्र भरद्वाज इसके द्रष्टा हैं।
ग्रंथ मेंअस्त्र-विद्या की परंपरा — महाभारत के अनुसार भरद्वाज ने आग्नेय अस्त्र अग्निवेश को सिखाया, जो आगे द्रोणाचार्य तक पहुँचा।
भरद्वाज-कुल के गोत्र-पृष्ठ
कुल और प्रवर
ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण
आश्रम और स्थान
ग्रंथ मेंप्रयाग (गंगा-यमुना संगम) — रामायण में भरद्वाज का आश्रम दो महानदियों के संगम पर है। राम और भरत, दोनों यहाँ रुके।
ऋषियों का योगदान
- वेद-विभाजन: एक वेद से हज़ार शाखाएँ — पूरा लेख
- आयुर्वेद: ऋषियों की सभा से निकली जीवन की विद्या — पूरा लेख
स्रोत
- गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण — पी. चेन्सल राव (सं.) (1900) · 136 · archive.org leaf 176 — बौधायन का गोत्र-लक्षण: सात ऋषि और आठवें अगस्त्य
- Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886) · 22 — मण्डल 6
- गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण — पी. चेन्सल राव (सं.) (1900) · 230–240 · archive.org leaf 270–280 — गण 23–28
- The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.) (1917) · अध्याय 196 — आङ्गिरस-कुल
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · अयोध्या काण्ड 2.48, 2.84–85; बाल काण्ड 1.2 — राम, भरत, वाल्मीकि का शिष्य
- The Rámáyan of Válmíki, translated into English verse — Ralph T. H. Griffith (अनु.) (1874) · अयोध्या काण्ड, Canto LIV, XC–XCI — आश्रम और आतिथ्य
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · आदि पर्व CXXXI; वन पर्व CXXXV–CXXXVIII — द्रोण, यवक्रीत
