FAQ
महर्षि मार्कण्डेय — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महाभारत (वन पर्व CLXXXVII) के अनुसार प्रलय के जल में बरगद की डाल पर एक बालक। उसके पेट में उन्होंने पूरा ब्रह्मांड देखा। बालक ने स्वयं को नारायण बताया।
महाभारत (वन पर्व CLXXXVIII) में मार्कण्डेय पाण्डवों से कहते हैं कि वह देव यही जनार्दन (कृष्ण) हैं। उन्हीं के वरदान से उनकी आयु लंबी है।
दोनों मार्कण्डेय ने, वन पर्व में युधिष्ठिर को — रामोपाख्यान (Section CCLXXII से) और पतिव्रता-माहात्म्य पर्व में सावित्री की कथा।
यह कथा लोक में बहुत प्रसिद्ध है। पर हमने जो ग्रंथ पढ़े, यानी महाभारत और मार्कण्डेय पुराण, उनमें यह नहीं मिली। इसलिए इसे यहाँ ग्रंथ की कथा के रूप में नहीं दिया गया।
वन पर्व में — वे पाण्डवों से मिलते हैं और अनेक पुरानी कथाएँ सुनाते हैं। आदि पर्व की सूची इसे "मार्कण्डेय-समास्या" कहती है।
गोत्र-प्रवर ग्रंथों की ज़्यादातर सूचियों में भृगु-कुल के जामदग्न्य वत्स गण में; मत्स्य की एक सूची में आङ्गिरस-परंपरा के काण्व गण में भी।
क्योंकि यह नाम ग्रंथ में दो गणों में दर्ज है — भृगु-कुल और आङ्गिरस-परंपरा।
बौधायन की आठ गोत्रकारों की सूची में मार्कण्डेय नहीं हैं।
इस साइट पर मार्कण्डेय गोत्र का पृष्ठ।
