महर्षि मार्कण्डेय

महाभारत के वन पर्व के कथा-वाचक

संक्षेप में

जब प्रलय में सब कुछ जल में डूब गया, तब अकेले मार्कण्डेय उस जल में भटक रहे थे। थककर उन्होंने एक बरगद की डाल पर एक बालक को बैठे देखा। उस बालक के भीतर उन्होंने पूरा ब्रह्मांड देखा। महाभारत में मार्कण्डेय बताते हैं कि वह बालक कोई और नहीं, कृष्ण ही थे।

महाभारत के ऋषि

जीवन और पृष्ठभूमि

हज़ारों वर्ष के, पर युवा जैसे

महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय वनवासी पाण्डवों के पास आते हैं। ग्रंथ कहता है कि उन्होंने हज़ारों वर्ष देखे थे, फिर भी उनमें बुढ़ापे का कोई चिह्न नहीं था। वे पच्चीस वर्ष के युवा जैसे दिखते थे।

कृष्ण, द्रौपदी, सत्यभामा और सारे ब्राह्मण उनसे पुरानी कथाएँ सुनने बैठे। देवर्षि नारद भी आ गए, और मुस्कुराकर बोले — "मुनिवर, जो कहने वाले थे, कहिए।" मार्कण्डेय ने कहा — "थोड़ा रुको, बहुत कुछ सुनाना है।"

युधिष्ठिर के अनुसार मार्कण्डेय ने कई प्रलय और कई बार सृष्टि को फिर से बनते देखा है। प्रलय की कथा में बालक-रूप देव उन्हें "भृगुवंशी मार्कण्डेय" कहकर पुकारते हैं।

ग्रंथों में

  • वन पर्व में मार्कण्डेय पाण्डवों से मिलते हैं और ब्राह्मणों की महिमा व अनेक कथाएँ सुनाते हैं ("मार्कण्डेय-समास्या")।
  • "मार्कण्डेयः" (का), "मार्कण्डेयाः" (बो), "मार्कण्डः" (म) — जामदग्न्य वत्स गण में।
  • मत्स्य की काण्व-गण सूची में "मार्कण्डः"।

प्रमुख कथाएँ

प्रलय के जल में बरगद पर बालक

मार्कण्डेय स्वयं सुनाते हैं — युग के अंत में सात सूर्य निकले और धरती का सारा जल सोख लिया। फिर आग ने सब जला दिया, और बारह वर्ष तक बादल बरसते रहे। पूरी धरती एक अथाह समुद्र बन गई।

"न देवता बचे, न मनुष्य, न पेड़, न आकाश। मैं अकेला उस जल में भटकता रहा। किसी को न देखकर मेरा मन दुखी था। थक गया, पर कहीं ठहरने की जगह नहीं मिली।"

तभी उन्हें एक विशाल बरगद दिखा। उसकी एक डाल पर दिव्य बिछौने पर कमल जैसी आँखों वाला एक बालक बैठा था। मार्कण्डेय भूत-भविष्य सब जानते थे, पर समझ न पाए कि यह बालक कौन है।

बालक ने प्यार से कहा — "मार्कण्डेय, तुम थक गए हो। मेरे शरीर के भीतर आकर विश्राम करो।" फिर उसने मुँह खोला, और मार्कण्डेय उसके भीतर चले गए।

बालक के पेट में उन्होंने पूरी धरती देखी। नगर और राज्य थे, गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी जैसी नदियाँ थीं। हिमालय और विन्ध्य जैसे पर्वत, सूर्य-चन्द्रमा, देवता और ऋषि भी थे। वे सदियों तक भीतर घूमते रहे, पर उस शरीर का अंत न मिला।

अंत में उन्होंने मन से उसी देव की शरण ली। तभी हवा के एक झोंके से वे बालक के मुँह से बाहर आ गए। बालक ने बताया — "मैं नारायण हूँ। जल (नार) मेरा घर (अयन) है।"

कथा पूरी करके मार्कण्डेय ने पाण्डवों से कहा — "जिस देव को मैंने तब देखा था, वह यही जनार्दन हैं, जो तुम्हारे संबंधी बनकर आए हैं। इन्हीं के वरदान से मेरी आयु इतनी लंबी है।" यह सुनकर पाण्डवों ने कृष्ण को प्रणाम किया।

दुखी पाण्डवों को कथाएँ

जयद्रथ द्रौपदी को हर ले गया था। उसे छुड़ाकर भी युधिष्ठिर दुखी थे, और उन्होंने मार्कण्डेय से पूछा — "क्या कोई मुझसे भी अभागा राजा हुआ है?"

मार्कण्डेय ने कहा — "राम ने भी ऐसा ही दुख सहा था। रावण ने छल से सीता को हर लिया था।" और उन्होंने पूरी राम-कथा सुनाई, जिसे "रामोपाख्यान" कहते हैं।

फिर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के बारे में पूछा — "क्या इन जैसी कोई पतिव्रता स्त्री कभी हुई है?" तब मार्कण्डेय ने सावित्री की कथा सुनाई, जिन्होंने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण लौटा लिए।

शिक्षाएँ

युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा कैसे जिए। मार्कण्डेय बोले — "सब प्राणियों पर दया करो, किसी का तिरस्कार मत करो। सच बोलो, विनम्र रहो, और मन को वश में रखो। घमंड छोड़ो।"

और दुख के लिए उनकी सीख — "समझदार लोग समय की मार से टूटते नहीं। समय देवताओं को भी नहीं छोड़ता। इसलिए अपने इस दुख को मन पर मत लो।"

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंमार्कण्डेय-समास्या — महाभारत के वन पर्व का यह लंबा खंड मार्कण्डेय की सुनाई कथाओं से बना है। इसमें प्रलय, ब्राह्मणों की महिमा, और राजधर्म पर उपदेश हैं।

ग्रंथ मेंमार्कण्डेय पुराण — इसकी शुरुआत में मार्कण्डेय ऋषि जैमिनि को चार ज्ञानी पक्षियों के पास भेजते हैं। आगे के बड़े हिस्से में असली वक्ता मार्कण्डेय और उनके शिष्य क्रौष्टुकि हैं। प्रसिद्ध देवी-माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) भी इसी पुराण में है, पर Pargiter इसे बाद में जोड़ा गया हिस्सा मानते हैं।

मार्कण्डेय से जुड़े गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

संबंधित गाथाएँ

स्रोत

महर्षि मार्कण्डेय — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न