महर्षि गर्ग

भरद्वाज-परंपरा के ऋषि; महाभारत में काल-ज्ञानी

संक्षेप में

महर्षि गर्ग भरद्वाज-परंपरा के ऋषि हैं। सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद 6.47 — भरद्वाज-कुल के छठे मण्डल का एक सूक्त — गर्ग का है। गोत्र-प्रवर ग्रंथों में गर्ग शैन्य गण में दर्ज हैं, जिसके प्रवर में भारद्वाज और गार्ग्य दोनों आते हैं। महाभारत में गर्ग नाम के एक वृद्ध ऋषि को काल और ग्रह-गति का ज्ञाता बताया गया है।

मंत्रद्रष्टा ऋषिमहाभारत के ऋषि

ग्रंथों में

  • "स्वादुरेकत्रिंशद्गर्गः" — ऋग्वेद 6.47 के इकतीस मन्त्र गर्ग के।
  • शैन्य गण (गण 25) का प्रवर: आङ्गिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य — पाँच ऋषि।
  • सरस्वती पर "गर्गस्रोत" तीर्थ: वृद्ध गर्ग ने वहाँ काल, ज्योतियों की गति और शुभ-अशुभ लक्षणों का ज्ञान पाया, इसलिए तीर्थ उनके नाम से है।
  • राजा पृथु के ज्योतिषी "महान ऋषि गर्ग" बने।

गर्ग से जुड़े गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

स्रोत

महर्षि गर्ग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न