प्यासे गोतम के लिए मरुतों का झरना
ऋग्वेद के मरुत-सूक्त में यह छोटी-सी कथा है। मरुत, यानी आँधी और वर्षा के देवता, बादल को टेढ़ा मोड़कर इधर लाए। उन्होंने "प्यासे गोतम" के लिए झरना बहा दिया, और ऋषि की इच्छा पूरी की।
अगले सूक्तों में गौतम कहते हैं — "गाते हुए गौतमों ने कुएँ का ढक्कन उठाया, ताकि पानी पी सकें।" और "ऐसा स्तोत्र पहले कभी नहीं गाया गया, जैसा गोतम ने तुम्हारे लिए गाया।"
Max Müller की टिप्पणी के अनुसार यहाँ "ढका हुआ कुआँ" बादल है। यानी गौतम-परिवार ने प्रार्थना से बादल से वर्षा पाई।
वामदेव: "मैं ही मनु था, मैं ही सूर्य था"
ऋग्वेद के चौथे मण्डल का एक सूक्त ऐसे शुरू होता है — "मैं पहले मनु था, मैं सूर्य था।" और अगला सूक्त — "गर्भ में रहते हुए ही मैंने देवताओं की सारी पीढ़ियों को जान लिया।"
बृहदारण्यक उपनिषद इस पंक्ति को वामदेव का आत्म-ज्ञान बताता है। वह कहता है — "आरंभ में ब्रह्म ने स्वयं को जाना — मैं ब्रह्म हूँ। ऋषि वामदेव ने इसे देखा और समझा, और गाया — मैं मनु था, मैं सूर्य था।"
उपनिषद आगे कहता है — "आज भी जो यह जान लेता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह सब कुछ बन जाता है। देवता भी उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा है।"
राजा वैन्य के यज्ञ में: "चापलूसी मत करो"
महाभारत में मार्कण्डेय यह कथा सुनाते हैं। राजा वैन्य के यज्ञ में ऋषि अत्रि ने राजा की प्रशंसा की — "आप ही राजाओं में श्रेष्ठ हैं।" ऋषि गौतम ने तुरंत टोका — "सबसे श्रेष्ठ इन्द्र हैं। राजा को खुश करने के लिए चापलूसी कर रहे हो।"
बहस बढ़ी, तो ऋषि सनत्कुमार के पास गए। सनत्कुमार ने कहा कि राजा प्रजा का रक्षक है, इसलिए उसे इन्द्र जैसा कहना ठीक है। फ़ैसला अत्रि के पक्ष में गया।
कथा गौतम को हारा हुआ दिखाती है। पर उनकी बात का भाव साफ़ है। सभा में किसी शक्तिशाली की झूठी प्रशंसा पर चुप न रहना।
ग्रंथों में अंतर
एक नाम, कई ऋषि: रामायण में अहल्या के पति भी "गौतम" हैं, और उनकी कथा इस साइट पर अलग गाथा में है। पर ग्रंथ यह नहीं बताते कि वे ऋग्वेद के इसी गौतम-परिवार के गोत्रकार गौतम हैं। इसलिए उस कथा को यहाँ नहीं जोड़ा।