महर्षि गौतम

बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक

संक्षेप में

ऋग्वेद में एक ऋषि को प्यास लगी, तो मरुत देवताओं ने बादल को मोड़कर उसके लिए झरना बहा दिया। वह ऋषि थे गोतम। उन्हीं के परिवार के वामदेव ने गाया — "मैं ही मनु था, मैं ही सूर्य था।" उपनिषद इसे आत्म-ज्ञान का सबसे पुराना उदाहरण मानता है। गौतम इसी परिवार का नाम है।

गोत्रकार ऋषिसप्तर्षिमंत्रद्रष्टा ऋषि

जीवन और पृष्ठभूमि

एक ऋषि नहीं, एक पूरा परिवार

ऋग्वेद में "गौतम" एक परिवार का नाम है। सूक्त बार-बार कहते हैं — "हम गौतम तुम्हारी स्तुति करते हैं।" Griffith के अनुसार "गौतम" यानी गोतम के वंशज।

सर्वानुक्रमणी के अनुसार पहले मण्डल के 1.74 से आगे के सूक्त गोतम राहूगण के हैं, यानी रहूगण के पुत्र गोतम। उनसे पहले के कुछ सूक्त (1.58 से) गोतम के पुत्र नोधा के हैं।

ऋग्वेद का पूरा चौथा मण्डल वामदेव गौतम ने देखा। बृहदारण्यक उपनिषद में सात ऋषि शरीर में दिखाए गए हैं — वहाँ दाहिना कान गौतम है, और बायाँ भरद्वाज।

ग्रंथों में

  • "वामदेवो गौतमश्चतुर्थं मण्डलमपश्यत्" — चौथा मण्डल वामदेव गौतम का।
  • ऋग्वेद 1.58 का ऋषि नोधा गौतम, और 1.74 से आगे के सूक्तों का ऋषि गोतम राहूगण बताया गया है।
  • गौतम-समूह के 11 गण हैं; आयास्य-गौतम और उचथ्य-गौतम उनमें सबसे बड़े हैं।
  • मत्स्य पुराण उचथ्य समूह का प्रवर "आङ्गिरस, औचथ्य, औशिज" बताता है।

प्रमुख कथाएँ

प्यासे गोतम के लिए मरुतों का झरना

ऋग्वेद के मरुत-सूक्त में यह छोटी-सी कथा है। मरुत, यानी आँधी और वर्षा के देवता, बादल को टेढ़ा मोड़कर इधर लाए। उन्होंने "प्यासे गोतम" के लिए झरना बहा दिया, और ऋषि की इच्छा पूरी की।

अगले सूक्तों में गौतम कहते हैं — "गाते हुए गौतमों ने कुएँ का ढक्कन उठाया, ताकि पानी पी सकें।" और "ऐसा स्तोत्र पहले कभी नहीं गाया गया, जैसा गोतम ने तुम्हारे लिए गाया।"

Max Müller की टिप्पणी के अनुसार यहाँ "ढका हुआ कुआँ" बादल है। यानी गौतम-परिवार ने प्रार्थना से बादल से वर्षा पाई।

वामदेव: "मैं ही मनु था, मैं ही सूर्य था"

ऋग्वेद के चौथे मण्डल का एक सूक्त ऐसे शुरू होता है — "मैं पहले मनु था, मैं सूर्य था।" और अगला सूक्त — "गर्भ में रहते हुए ही मैंने देवताओं की सारी पीढ़ियों को जान लिया।"

बृहदारण्यक उपनिषद इस पंक्ति को वामदेव का आत्म-ज्ञान बताता है। वह कहता है — "आरंभ में ब्रह्म ने स्वयं को जाना — मैं ब्रह्म हूँ। ऋषि वामदेव ने इसे देखा और समझा, और गाया — मैं मनु था, मैं सूर्य था।"

उपनिषद आगे कहता है — "आज भी जो यह जान लेता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह सब कुछ बन जाता है। देवता भी उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा है।"

राजा वैन्य के यज्ञ में: "चापलूसी मत करो"

महाभारत में मार्कण्डेय यह कथा सुनाते हैं। राजा वैन्य के यज्ञ में ऋषि अत्रि ने राजा की प्रशंसा की — "आप ही राजाओं में श्रेष्ठ हैं।" ऋषि गौतम ने तुरंत टोका — "सबसे श्रेष्ठ इन्द्र हैं। राजा को खुश करने के लिए चापलूसी कर रहे हो।"

बहस बढ़ी, तो ऋषि सनत्कुमार के पास गए। सनत्कुमार ने कहा कि राजा प्रजा का रक्षक है, इसलिए उसे इन्द्र जैसा कहना ठीक है। फ़ैसला अत्रि के पक्ष में गया।

कथा गौतम को हारा हुआ दिखाती है। पर उनकी बात का भाव साफ़ है। सभा में किसी शक्तिशाली की झूठी प्रशंसा पर चुप न रहना।

ग्रंथों में अंतर

एक नाम, कई ऋषि: रामायण में अहल्या के पति भी "गौतम" हैं, और उनकी कथा इस साइट पर अलग गाथा में है। पर ग्रंथ यह नहीं बताते कि वे ऋग्वेद के इसी गौतम-परिवार के गोत्रकार गौतम हैं। इसलिए उस कथा को यहाँ नहीं जोड़ा।

शिक्षाएँ

वामदेव की सीख उपनिषद के शब्दों में यह है। जो जान लेता है कि "मैं ब्रह्म हूँ", वह सब कुछ बन जाता है। देवता भी उसे रोक नहीं सकते।

गोतम की कथा बताती है कि सच्ची प्रार्थना सुनी जाती है। प्यासे ऋषि के लिए बादल भी मुड़ गया।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंऋग्वेद का चौथा मण्डल (वामदेव गौतम), और पहले मण्डल के अनेक सूक्त (नोधा गौतम, गोतम राहूगण)।

गौतम-कुल के गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

स्रोत

महर्षि गौतम — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न