दक्ष की पुत्रियाँ, और पूरी सृष्टि
वनवास में राम की भेंट गिद्धराज जटायु से हुई। अपना परिचय देते हुए जटायु ने सृष्टि की कथा सुनाई। प्रजापतियों में कश्यप सबसे बाद के थे।
प्रजापति दक्ष की साठ पुत्रियाँ थीं। उनमें से आठ से कश्यप ने विवाह किया — अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला।
प्रसन्न होकर कश्यप ने कहा — "तुम मेरे जैसे पुत्रों को जन्म दोगी, जो तीनों लोकों को सँभालेंगे।" अदिति, दिति, दनु और कालका ने यह बात मन से मानी, बाकी ने नहीं।
अदिति से तैंतीस देवता हुए, दिति से दैत्य, और दनु से दानव अश्वग्रीव। ताम्रा के वंश में पक्षी हुए, क्रोधवशा के वंश में पशु और नाग। और मनु से मनुष्य हुए।
महाभारत में कश्यप की दो और पत्नियाँ कद्रू और विनता हैं। कद्रू ने हज़ार नाग पुत्र माँगे। विनता ने दो ऐसे पुत्र माँगे, जो उन हज़ार से भी बलवान हों। कश्यप ने दोनों को वरदान दिया और तप करने वन चले गए।
ग्रंथों में अंतर
कद्रू और विनता पर ग्रंथ अलग कहते हैं। महाभारत में दोनों कश्यप की पत्नियाँ हैं। रामायण में जटायु के अनुसार विनता ताम्रा के वंश में हैं, और कद्रू क्रोधवशा की पुत्री।
इन्द्र का घमंड, वालखिल्यों का क्रोध, और गरुड़ का जन्म
कश्यप संतान के लिए यज्ञ कर रहे थे। इन्द्र को लकड़ी लाने का काम मिला। इन्द्र पहाड़ जितना बोझ आसानी से उठा लाए।
रास्ते में उन्होंने वालखिल्य ऋषियों को देखा। वे अँगूठे जितने छोटे थे, और सब मिलकर पलाश का एक डंठल ढो रहे थे। भूख से वे इतने दुबले थे कि गाय के खुर से बने गड्ढे के पानी में डूबने लगे।
घमंडी इन्द्र उन पर हँसे, और उन्हें लाँघकर आगे बढ़ गए। अपमानित ऋषियों ने यज्ञ शुरू किया — "एक और इन्द्र पैदा हो, जो इस इन्द्र को भी डरा दे।"
डरे हुए इन्द्र कश्यप की शरण में आए। कश्यप ने ऋषियों से कहा — "ब्रह्मा ने इन्द्र को तीनों लोकों का राजा बनाया है, उनकी बात झूठी मत करो। पर तुम्हारा तप भी व्यर्थ न जाए। यह पक्षियों का इन्द्र बने।"
ऋषि मान गए। उसी तप से विनता के पुत्र गरुड़ पक्षियों के राजा बने। और कश्यप ने इन्द्र को समझाया — "आगे कभी ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का अपमान मत करना।"
आगे बड़े होकर गरुड़ एक बार हाथी और कछुए को पंजों में लिए उड़ रहे थे। चोंच में पेड़ की एक बड़ी डाल थी। उस डाल पर वालखिल्य ऋषि लटके थे। पिता कश्यप ने उन्हें रोका — "जल्दबाज़ी मत करो, ये ऋषि क्रोध में तुम्हें भस्म कर सकते हैं।"
फिर कश्यप ने बेटे के लिए ऋषियों से विनती की — "गरुड़ सबके भले का बड़ा काम कर रहा है, उसे अनुमति दीजिए।" ऋषि डाल छोड़कर हिमालय पर तप करने चले गए। फिर कश्यप ने गरुड़ को एक निर्जन पर्वत बताया, जहाँ डाल गिराने से किसी को हानि न हो।
परशुराम का पृथ्वी-दान
क्षत्रियों से युद्ध के बाद परशुराम ने बड़ा यज्ञ किया। उन्होंने सोने की एक बड़ी वेदी बनाकर कश्यप को दान दी। कश्यप के कहने पर ब्राह्मणों ने उसे आपस में बाँट लिया।
फिर परशुराम ने पूरी पृथ्वी ही कश्यप को दान कर दी, और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर तप करने चले गए।
रामायण में परशुराम स्वयं राम को बताते हैं — "पृथ्वी दान करने पर कश्यप ने मुझसे कहा था, अब मेरे राज्य में मत रहना। गुरु की बात मानकर मैं धरती पर रात नहीं बिताता।"