महर्षि अष्टावक्र

बालक जिसने राजा जनक की सभा में शास्त्रार्थ जीता

संक्षेप में

अष्टावक्र का शरीर आठ जगह से टेढ़ा था, और यह शाप उन्हें जन्म से पहले पिता से मिला था। पर बारह वर्ष की उम्र में उसी बालक ने जनक की सभा में वन्दी को हराया। और अपने खोए पिता को वापस पाया। उनकी कथा सिखाती है कि बड़प्पन उम्र से नहीं, ज्ञान से आता है।

महाभारत के ऋषि

एक नज़र में

महर्षि अष्टावक्र — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीमहाभारत के ऋषिमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXXII–CXXXIV
नानामहर्षि उद्दालक आरुणिमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXXII
आश्रम और स्थानसमंगा नदीमहाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXXXIV

नाम और अर्थ

"अष्टावक्र" यानी आठ जगह से टेढ़ा। महाभारत के अनुसार उनका शरीर आठ अंगों में टेढ़ा था, और इसी से उनका यह नाम पड़ा।

जीवन और पृष्ठभूमि

गर्भ में ही ज्ञानी, और पिता का शाप

ऋषि उद्दालक के एक शिष्य थे कहोड, जिन्होंने बरसों गुरु की सेवा की। प्रसन्न होकर उद्दालक ने उन्हें शास्त्रों का ज्ञान दिया, और अपनी पुत्री सुजाता से उनका विवाह किया।

सुजाता के गर्भ में अष्टावक्र थे। एक रात कहोड शिष्यों के सामने पाठ कर रहे थे, तो गर्भ से आवाज़ आई — "पिताजी, आप रात भर पढ़ते हैं, पर आपका पाठ ठीक नहीं। आपकी कृपा से मैं गर्भ में ही वेद सीख गया हूँ।"

शिष्यों के सामने हुए इस अपमान से कहोड क्रोधित हो गए। उन्होंने गर्भ के शिशु को शाप दिया — "तू आठ अंगों में टेढ़ा होगा।" और बालक वैसा ही जन्मा।

जन्म से पहले ही पिता घर छोड़कर धन के लिए राजा जनक के पास गए थे। वहाँ वे शास्त्रार्थ में वन्दी से हार गए, और नियम के अनुसार जल में डुबो दिए गए। नाना उद्दालक ने यह बात अष्टावक्र से छिपाने को कहा।

इसलिए अष्टावक्र नाना उद्दालक को ही पिता मानते रहे, और मामा श्वेतकेतु को भाई। श्वेतकेतु उन्हीं की उम्र के थे।

उद्दालक आरुणि और श्वेतकेतु के नाम उपनिषदों में भी बड़े विद्वानों के रूप में आते हैं। बृहदारण्यक के अनुसार याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से विद्या पाई। पर उपनिषद अष्टावक्र की कथा से इनका संबंध नहीं जोड़ता।

प्रमुख कथाएँ

जनक की सभा: बालक और वन्दी

बारह वर्ष की उम्र में उन्हें सच पता चला। तब वे मामा श्वेतकेतु के साथ राजा जनक के यज्ञ में पहुँचे। द्वारपाल ने कहा कि बालकों को अंदर आने की अनुमति नहीं। अष्टावक्र बोले — "सिर के बाल सफ़ेद होने से कोई बड़ा नहीं होता।"

राजा जनक ने उनसे कठिन पहेलियाँ पूछीं, और उनके उत्तर सुनकर उन्हें सभा में आने दिया। फिर संख्याओं वाले शास्त्रार्थ में अष्टावक्र ने वन्दी को चुप करा दिया।

वन्दी ने बताया कि वह वरुण का पुत्र है। हारे हुए ब्राह्मणों को उसने वरुण के यज्ञ में भेजा था। वे सब लौट आए, उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड भी थे।

घर लौटकर पिता ने कहा — "समंगा नदी में स्नान करो।" जल में डुबकी लगाते ही अष्टावक्र के सारे टेढ़े अंग सीधे हो गए।

पूरी गाथा पढ़ें: अष्टावक्र और वन्दी →

विवाह से पहले उत्तर दिशा की परीक्षा

अनुशासन पर्व में भीष्म अष्टावक्र की एक और कथा सुनाते हैं। अष्टावक्र ने ऋषि वदान्य की पुत्री सुप्रभा से विवाह माँगा। वदान्य ने कहा — "पहले उत्तर दिशा की यात्रा करो। हिमालय के पार एक वृद्ध तपस्विनी मिलेंगी, उनका आदर करके लौटना।"

अष्टावक्र गए, और उस तपस्विनी ने उनके संयम की कड़ी परीक्षा ली। अष्टावक्र ने विनम्रता से हर बार मना किया — "मैं पराई स्त्री के पास नहीं जाता। मैं संयम से नहीं डिगूँगा, और सत्य से जुड़ा रहूँगा।"

अंत में उस स्त्री ने बताया — "मैं उत्तर दिशा हूँ। वदान्य के कहने पर तुम्हारी परीक्षा मैंने ली थी। तुम अपने संकल्प से नहीं डिगे, इससे ब्रह्मा और देवता प्रसन्न हैं।"

अष्टावक्र लौटे और वदान्य को सब बताया। वदान्य ने कहा — "तुम ही मेरी पुत्री के लिए सबसे योग्य वर हो।" विधि से विवाह हुआ, और अष्टावक्र शांत मन से अपने आश्रम में रहने लगे।

शिक्षाएँ

बड़प्पन उम्र, सफ़ेद बालों, धन या मित्रों से नहीं आता। अष्टावक्र द्वारपाल से कहते हैं कि देवता उसे बड़ा मानते हैं, जो उम्र में बालक होकर भी ज्ञानी हो।

सेमल के पेड़ की गाँठें बढ़ने से वह बड़ा नहीं कहलाता। बड़ा वह पेड़ है, जो पतला और छोटा होकर भी फल देता है।

छोटी आग को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि छूने पर वह जलाती है। जनक ने भी यही कहा, और बालक को सभा में आने दिया।

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आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंसमंगा नदी — महाभारत के अनुसार इसी नदी में स्नान से अष्टावक्र के अंग सीधे हुए। ग्रंथ कहता है कि तभी से यह नदी "समंगा" कहलाई और पवित्र मानी गई।

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स्रोत

महर्षि अष्टावक्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न