महर्षि वसिष्ठ
बौधायन सूत्र के आठ गोत्रकार ऋषियों में से एक
संक्षेप में
महर्षि वसिष्ठ क्षमा की मिसाल हैं। विश्वामित्र के कारण उनके सौ पुत्र मारे गए, फिर भी उन्होंने बदला नहीं लिया। वे इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु और राजा दशरथ के पुरोहित थे। सप्तर्षियों में गिने जाने वाले वसिष्ठ ने ऋग्वेद का सातवाँ मण्डल देखा, और उनकी पत्नी अरुन्धती थीं।
गोत्रकार ऋषिसप्तर्षिमंत्रद्रष्टा ऋषिब्रह्मर्षिरामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषि
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | गोत्रकार ऋषि, सप्तर्षि, मंत्रद्रष्टा ऋषि, ब्रह्मर्षि, रामायण के ऋषि, महाभारत के ऋषि | गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 136 (archive.org leaf 176); विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 1 (vol. 3, p. 13); बृहदारण्यक उपनिषद (Max Müller अनु.), 2.2.4 (SBE 15, p. 106); सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 24 (मण्डल 7 का आरंभ); वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.53.9; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.11.6; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड, सर्ग 51–64; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXVI |
| पुत्र | महर्षि शक्ति | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXVI–CLXXIX |
| पौत्र | महर्षि पराशर | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIX–CLXXX |
| समकालीन / प्रसंग में साथ | महर्षि विश्वामित्र | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड, सर्ग 50–64; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIV–CLXXVI |
| आश्रम और स्थान | वसिष्ठ का आश्रम, विपाशा और शतद्रु नदियाँ | वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.50.21–1.51; रामायण (Griffith अनु.), बाल काण्ड, Canto LI; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIX; वन पर्व, Section CXXX |
जीवन और पृष्ठभूमि
ब्रह्मा के पुत्र, मित्र-वरुण से जन्म
रामायण में वसिष्ठ को "ब्रह्मा का पुत्र" कहा गया है। महाभारत उन्हें "मित्रावरुण का पुत्र" कहता है। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी बताती है कि मित्र और वरुण से एक कुंभ में अगस्त्य और वसिष्ठ जन्मे।
उत्तर काण्ड के प्रचलित पाठ में यह दूसरा जन्म समझाया गया है। राजा निमि और वसिष्ठ ने क्रोध में एक-दूसरे को शाप दिया, और दोनों का शरीर छूट गया। तब ब्रह्मा ने वसिष्ठ से कहा — मित्र और वरुण के तेज में प्रवेश करो, वहीं से फिर जन्म लोगे।
इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु
वसिष्ठ अयोध्या के इक्ष्वाकु राजाओं के पुरोहित और मार्गदर्शक थे। रामायण में दशरथ के यज्ञ में वे पुरोहित हैं। त्रिशंकु की कथा में वसिष्ठ के पुत्र कहते हैं — "इक्ष्वाकु वंश के राजा सदा अपने गुरु पर ही भरोसा करते आए हैं।"
जब दशरथ राम को विश्वामित्र के साथ भेजने से डर रहे थे, तब वसिष्ठ ने ही उन्हें समझाया — "आप धर्म के अवतार हैं, अपना वचन मत तोड़िए। विश्वामित्र के साथ राम पूरी तरह सुरक्षित हैं।"
उनकी पत्नी अरुन्धती थीं, पुत्र शक्ति, और शक्ति के पुत्र पराशर। इसी वंश में आगे वेदव्यास जन्मे।
ग्रंथों में
- "सप्तमं मण्डलं वसिष्ठोऽपश्यत्" — सातवाँ मण्डल वसिष्ठ का।
- सर्वानुक्रमणी (1.166 पर) कहती है कि मित्र और वरुण से एक कुंभ में अगस्त्य और वसिष्ठ उत्पन्न हुए।
- मत्स्य पुराण: वसिष्ठ का विवाह अरुन्धती से हुआ; पुत्र शक्ति, शक्ति के पुत्र पराशर।
- वसिष्ठ-कुल के 5 गण हैं; वासिष्ठ गण का प्रवर केवल "वासिष्ठ" (एकार्षेय) है।
- वसिष्ठ की कामधेनु नन्दिनी को विश्वामित्र ने माँगा; वसिष्ठ ने क्रोधित होकर भी किसी के प्राण नहीं लिए।
- वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती (जिन्हें अक्षमाला भी कहा गया)।
प्रमुख कथाएँ
शबला कामधेनु: "यह मेरा जीवन है"
जब राजा विश्वामित्र सेना के साथ आश्रम आए, तो वसिष्ठ ने उनका बड़े प्रेम से स्वागत किया। उन्होंने राजा से पूछा कि राज्य में सब ठीक है, प्रजा खुश है, सेवक पलते हैं न? फिर पूरी सेना को अपनी कामधेनु शबला से भोजन कराया।
राजा ने शबला माँगी, और बदले में करोड़ों गायें, हाथी, रथ और सोना देने को कहा। वसिष्ठ ने शांति से मना किया — "यह मेरा रत्न है, मेरा धन है, मेरा जीवन है। मेरे सारे यज्ञ इसी से चलते हैं।"
जब सैनिक शबला को खींच ले गए, तो वह छूटकर रोती हुई लौटी — "आपने मुझे क्यों छोड़ दिया?" वसिष्ठ ने उसे बहन जैसे दुलार से कहा — "मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा। तुमने कोई गलती नहीं की। यह राजा अपने बल के घमंड में है।"
जब विश्वामित्र शिव से पाए अस्त्र लेकर लौटे और आश्रम जला दिया, तब वसिष्ठ ने केवल अपना ब्रह्मदण्ड उठाया। ब्रह्मास्त्र तक उसमें समा गया। ऋषियों की विनती पर वसिष्ठ ने अपना क्रोध शांत किया।
ग्रंथों में अंतर
रामायण में वसिष्ठ की एक हुंकार से विश्वामित्र के सौ पुत्र भस्म हो जाते हैं। महाभारत में नन्दिनी की सेना किसी के प्राण नहीं लेती, केवल विश्वामित्र की सेना को खदेड़ देती है।
सौ पुत्रों का शोक, और फिर भी क्षमा
महाभारत में एक दुखद कथा है। राजा कल्माषपाद, वसिष्ठ के पुत्र शक्ति के शाप से राक्षस बन गए। विश्वामित्र के उकसावे पर उस राक्षस ने शक्ति को, और फिर वसिष्ठ के बाकी सब पुत्रों को खा लिया।
वसिष्ठ ने यह दुख वैसे सहा, जैसे पर्वत धरती का भार सहता है। ग्रंथ कहता है कि उन्होंने कुशिक वंश का नाश करने के बजाय अपने प्राण देना बेहतर समझा।
शोक में वे मेरु की चोटी से कूदे, पर रुई पर गिरने जैसे उतरे। आग में गए, पर आग ठंडी लगी। गले में पत्थर बाँधकर समुद्र में कूदे, पर लहरों ने किनारे फेंक दिया।
फिर उन्होंने रस्सियों से खुद को बाँधकर बाढ़ से उफनती नदी में छलाँग लगाई। नदी ने उनके बंधन काट दिए, इसलिए उसका नाम पड़ा "विपाशा" — यानी बंधन तोड़ने वाली। एक और नदी उन्हें आग समझकर सौ धाराओं में बँट गई, और "शतद्रु" कहलाई।
हारकर वे आश्रम लौट रहे थे, तभी पीछे से किसी के वेद पढ़ने की आवाज़ आई — बिल्कुल शक्ति जैसी। पुत्रवधू अदृश्यन्ती ने बताया कि यह आवाज़ उसके गर्भ में पल रहे शक्ति के पुत्र की है। "मेरे वंश का एक बच्चा है!" — यह सुनते ही वसिष्ठ ने मरने का विचार छोड़ दिया।
पुत्र के हत्यारे को मुक्ति
रास्ते में वही राक्षस कल्माषपाद उन्हें खाने दौड़ा। डरी हुई अदृश्यन्ती को वसिष्ठ ने कहा — "डरो मत बेटी, यह राक्षस नहीं, राजा कल्माषपाद है।"
वसिष्ठ ने केवल "हुम्" कहकर उसे रोक दिया। फिर मंत्र पढ़े जल के छींटे देकर उसे बारह वर्ष के शाप से मुक्त कर दिया। जिस राजा के हाथों उनके पुत्र मारे गए थे, उसी को उन्होंने नया जीवन दिया।
होश में आए राजा ने हाथ जोड़कर पूछा — मैं क्या करूँ? वसिष्ठ ने बस इतना कहा — "अपने राज्य लौटो, प्रजा का पालन करो, और आगे कभी ब्राह्मणों का अपमान मत करना।"
पौत्र पराशर का क्रोध शांत करना
अदृश्यन्ती के पुत्र का नाम पराशर रखा गया। उसी के कारण वसिष्ठ ने मरने का विचार छोड़ा था। इसलिए ग्रंथ के अनुसार वह "मरे हुए को जीवन देने वाला" कहलाया। बचपन में पराशर वसिष्ठ को ही "पिता" कहते थे।
एक दिन माँ ने रोते हुए बताया कि ये तुम्हारे पिता नहीं, दादा हैं। तुम्हारे पिता को राक्षस खा गया। यह सुनकर पराशर ने पूरी सृष्टि को नष्ट करने का संकल्प कर लिया।
तब वसिष्ठ ने उन्हें भृगुवंशी और्व की कथा सुनाई। और्व ने अपना क्रोध संसार पर न उतारकर समुद्र में डाल दिया था। जिस दादा ने सौ पुत्र खोए थे, वही अपने पौत्र को क्रोध छोड़ना सिखा रहे थे।
विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि मानना
हज़ारों वर्ष के तप के बाद जब ब्रह्मा ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि कहा, तो विश्वामित्र ने एक शर्त रखी — वसिष्ठ भी यह मानें। देवताओं की विनती पर वसिष्ठ आए और बोले — "तुम्हारा ब्रह्मर्षि होना निस्संदेह है।"
उस दिन वसिष्ठ ने विश्वामित्र से मित्रता की, और विश्वामित्र ने उनकी पूजा की। बरसों की दुश्मनी एक पल में खत्म हो गई।
हरिश्चन्द्र के लिए क्रोध: आडी और बक (मार्कण्डेय पुराण)
मार्कण्डेय पुराण में वसिष्ठ बारह वर्ष जल में तप करके लौटते हैं। तब वे सुनते हैं कि विश्वामित्र ने उनके यजमान राजा हरिश्चन्द्र को कितना दुख दिया।
वसिष्ठ कहते हैं — "विश्वामित्र ने मेरे सौ पुत्र मारे, तब भी मैं इतना क्रोधित नहीं हुआ था, जितना आज हूँ।" अपने पुत्रों के लिए जो क्रोध नहीं आया, वह एक निर्दोष राजा के लिए आया।
दोनों ने एक-दूसरे को पक्षी बनने का शाप दिया — वसिष्ठ "आडी" (मैना) बने, विश्वामित्र "बक" (बगुला)। दोनों विशाल पक्षियों का भयंकर युद्ध हुआ, और अंत में ब्रह्मा ने आकर दोनों को शांत किया।
त्याग और तप
वसिष्ठ का सबसे बड़ा त्याग था बदले का त्याग। सौ पुत्र खोकर भी उन्होंने विश्वामित्र के वंश को नष्ट नहीं किया, बल्कि खुद मरना चाहा।
जिस राजा के हाथों उनके पुत्र मरे, उसे उन्होंने शाप से मुक्त किया। बाद में उसके वंश को आगे बढ़ाने में भी मदद की।
शिक्षाएँ
क्रोध को जीतना सबसे कठिन तप है। वसिष्ठ ने यही अपने पौत्र पराशर को सिखाया, और यही उन्होंने स्वयं अपने जीवन में करके दिखाया।
वंश में एक बच्चे की आवाज़ ने उन्हें मौत से लौटा दिया। उनकी कहानी बताती है कि सबसे गहरे दुख में भी जीने का कोई कारण बचा रहता है।
वसिष्ठ भी मनुष्य की तरह क्रोधित होते हैं — निमि की कथा में और हरिश्चन्द्र के लिए। पर उनकी पहचान बदला न लेने से बनी, न कि कभी क्रोध न करने से।
संबंधित ऋषि
- महर्षि शक्ति — पुत्र
- महर्षि पराशर — पौत्र
- महर्षि विश्वामित्र — समकालीन / प्रसंग में साथ
वसिष्ठ-कुल के गोत्र-पृष्ठ
कुल और प्रवर
ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण
आश्रम और स्थान
ग्रंथ मेंवसिष्ठ का आश्रम — रामायण के अनुसार फूलों, पेड़ों और बेलों से भरा आश्रम। वहाँ हिरण भी डर भूल जाते थे, और तपस्वी आग जैसे तेजस्वी थे।
ग्रंथ मेंविपाशा और शतद्रु नदियाँ — महाभारत के अनुसार इन दोनों नदियों के नाम वसिष्ठ के शोक की कथा से पड़े। वन पर्व में भी विपाशा को वह नदी बताया गया है, जिसमें वसिष्ठ ने खुद को बाँधकर डुबोना चाहा था।
संबंधित गाथाएँ
- राजा हरिश्चन्द्र की कथा — पूरी गाथा
- ऋष्यशृंग और अंग देश की वर्षा — पूरी गाथा
- और्व: जाँघ से जन्मे ऋषि, और समुद्र की आग — पूरी गाथा
ऋषियों का योगदान
- वेद-विभाजन: एक वेद से हज़ार शाखाएँ — पूरा लेख
स्रोत
- गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण — पी. चेन्सल राव (सं.) (1900) · 136 · archive.org leaf 176 — बौधायन का गोत्र-लक्षण: सात ऋषि और आठवें अगस्त्य
- Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886) · 12, 24 — 1.166; मण्डल 7
- The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.) (1917) · अध्याय 201 — वसिष्ठ-अरुन्धती, शक्ति, पराशर
- गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण — पी. चेन्सल राव (सं.) (1900) · 272–282 · archive.org leaf 312–322 — गण 63–67
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · आदि पर्व, Section CLXXVI; उद्योग पर्व, Section CXVII — नन्दिनी; अरुन्धती
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · बाल काण्ड 1.11, 1.20, 1.50–1.64 — समीक्षित संस्कृत पाठ
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · आदि पर्व CLXXVI–CLXXXII; वन पर्व CXXX — शबला/नन्दिनी, सौ पुत्र, पराशर
- The Ramayana, Book 7: Uttara Kandam — Manmatha Nath Dutt (अनु.) (1894) · Sections LXV–LXVI — निमि-वसिष्ठ (प्रचलित पाठ)
- The Markandeya Purana (Bibliotheca Indica) — F. Eden Pargiter (अनु.) (1904) · Canto IX — आडी-बक युद्ध
