हिरनी का पुत्र, सिर पर सींग
वनवास में ऋषि लोमश पाण्डवों को कौशिकी नदी पर ले गए। वहाँ उन्होंने एक पवित्र आश्रम दिखाया।
लोमश बोले — "यहाँ ऋष्यशृंग रहते थे। उनके तप से डरकर इन्द्र ने सूखे में भी वर्षा की थी।"
युधिष्ठिर ने पूछा कि हिरनी से ऋषि कैसे जन्मे। तब लोमश ने पूरी कथा सुनाई।
कश्यप-वंश के ऋषि विभाण्डक एक बड़ी झील के किनारे तप करते थे। उनका तप बहुत लंबा और कठोर था।
एक दिन जल में उन्हें अप्सरा उर्वशी दिखी, और उनका वीर्य जल में गिर गया। प्यासी हिरनी ने वही जल पी लिया।
वह हिरनी असल में एक देव-कन्या थी। ब्रह्मा ने उससे कहा था — "हिरनी बनकर एक मुनि को जन्म दोगी, तब मुक्त होगी।"
उसी हिरनी से विभाण्डक का पुत्र जन्मा। उसके सिर पर एक सींग था। इसीलिए नाम पड़ा ऋष्यशृंग — "हिरन के सींग वाला"।
ऋष्यशृंग वन में ही पले। पिता के सिवा उन्होंने कभी कोई मनुष्य नहीं देखा था। उनका मन पूरी तरह ब्रह्मचर्य में लगा था।
अंग देश का अकाल
उसी समय अंग देश में राजा लोमपाद राज करते थे। वे राजा दशरथ के मित्र थे।
महाभारत कहता है कि लोमपाद ने सुख के लोभ में एक ब्राह्मण से झूठ बोला था। इससे ब्राह्मण उनसे दूर हो गए।
राज्य में यज्ञ कराने वाला कोई पुरोहित नहीं बचा। फिर इन्द्र ने वर्षा रोक दी, और प्रजा भूख से तड़पने लगी।
राजा ने तपस्वी ब्राह्मणों से उपाय पूछा। एक श्रेष्ठ मुनि बोले — "पहले ब्राह्मणों को मनाओ। फिर ऋष्यशृंग को अपने राज्य में बुलाओ।"
मुनि ने कहा — "वह वन में रहता है, स्त्री को जानता तक नहीं। उसके आते ही आकाश बरसेगा।"
लोमपाद ने अपने अपराध का प्रायश्चित्त किया, और ब्राह्मणों को मना लिया। अब प्रश्न था — ऋष्यशृंग को लाया कैसे जाए?
रामायण में भी ब्राह्मण यही उपाय बताते हैं — "विभाण्डक के पुत्र को किसी भी उपाय से ले आओ, और उसे शान्ता ब्याह दो।"
तैरता हुआ आश्रम
राजा ने नगर की चतुर गणिकाओं को बुलाया। पर वे डर गईं — एक ओर राजा का क्रोध, दूसरी ओर ऋषि का शाप।
तब एक बूढ़ी स्त्री आगे आई। उसने कहा — "जो साधन चाहिए, वह दिला दीजिए। मैं उस तपस्वी को ले आऊँगी।"
उसने एक नाव पर पूरा आश्रम सजाया। उसमें बनावटी पेड़ थे, फूल-फल थे, और लताएँ थीं। देखने में वह जादू जैसा लगता था।
नाव विभाण्डक के आश्रम से थोड़ी दूर बाँधी गई। फिर उसने अपनी चतुर बेटी को ऋषि-पुत्र के पास भेजा।
ऋष्यशृंग ने उसे भी तपस्वी समझा। उन्होंने आदर से पैर धोने का जल, फल-मूल और मृगछाला वाला आसन दिया।
उसने कहा — "मेरे व्रत में प्रणाम लेना मना है।" फिर उसने ऋषि-पुत्र को गले लगाया, और उनके फल अलग रख दिए।
बदले में उसने स्वादिष्ट पकवान, सुगंधित मालाएँ और पेय दिए। ऋष्यशृंग ने ऐसी चीज़ें पहले कभी नहीं देखी थीं।
रामायण भी यही कहती है। गणिकाओं ने लड्डू दिए, और वन के भोले युवक ने उन्हें फल ही समझा।
जब ऋष्यशृंग का मन खिंचने लगा, वह स्त्री अग्निहोत्र का बहाना बनाकर चली गई।
भोला वर्णन और पिता की चेतावनी
उसके जाते ही ऋष्यशृंग उदास होकर बैठ गए। बार-बार लंबी साँसें भरते रहे। तभी पिता विभाण्डक लौटे।
पिता ने पूछा — "आज लकड़ी नहीं काटी? हवन नहीं किया? इतने उदास क्यों हो? आज यहाँ कौन आया था?"
ऋष्यशृंग ने स्त्री को कभी देखा ही नहीं था। इसलिए उन्होंने कहा — "आज एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था।"
फिर वे भोलेपन से उसके गहने, कपड़े और मीठी बोली का वर्णन करते रहे। बोले — "उसके फलों में न छिलका था, न गुठली।"
अंत में उन्होंने कहा — "पिताजी, मैं उसके पास जाना चाहता हूँ। उसके बिना मेरा मन तड़पेगा।"
विभाण्डक बोले — "बेटा, वे राक्षस हैं। सुंदर रूप धरकर तपस्वियों का तप भंग करते हैं। उनकी ओर देखना भी मत।"
फिर विभाण्डक ने तीन दिन तक उस स्त्री को खोजा, पर वह नहीं मिली। वे थककर आश्रम लौट आए।
नाव चली, और आकाश बरसा
एक दिन विभाण्डक फल लेने गए थे। तभी वह स्त्री फिर आई। ऋष्यशृंग दौड़कर बोले — "पिताजी के लौटने से पहले तुम्हारे आश्रम चलें।"
वे उन्हें नाव पर बिठाकर अंग देश ले गईं। राजा ने ऋषि-पुत्र को अपने अंतःपुर में ठहराया।
तभी अचानक आकाश से वर्षा होने लगी, और धरती जल से भर गई। लोमपाद की इच्छा पूरी हुई।
रामायण के अनुसार वर्षा उसी समय शुरू हुई, जब ऋष्यशृंग को लाया जा रहा था। राजा ने सिर झुकाकर उनका स्वागत किया।
राजा लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता का विवाह ऋष्यशृंग से कर दिया।
विभाण्डक का क्रोध, और गायों से भरा रास्ता
लोमपाद जानते थे कि विभाण्डक बहुत क्रोधी हैं। इसलिए उन्होंने ऋषि के रास्ते में गायें, जुते खेत और ग्वाले रखवा दिए।
ग्वालों से कहा गया — "ऋषि पूछें, तो हाथ जोड़कर कहना कि यह सब उनके पुत्र का है, और हम उनके सेवक हैं।"
विभाण्डक लौटे, तो आश्रम सूना था। उन्हें राजा पर संदेह हुआ। वे राजा और उसकी राजधानी चम्पा को भस्म करने चल पड़े।
रास्ते में वे थके और भूखे थे। ग्वालों ने उनका राजा जैसा सत्कार किया। पूछने पर बोले — "यह सब आपके पुत्र का है।"
नगर पहुँचकर उन्होंने पुत्र को इन्द्र जैसा तेजस्वी देखा, और बहू शान्ता को बिजली जैसी उज्ज्वल। उनका क्रोध शांत हो गया।
विभाण्डक ने पुत्र से कहा — "पुत्र होने पर, और राजा का काम पूरा करके, वन लौट आना।" ऋष्यशृंग ने ऐसा ही किया।
शान्ता वन में भी पति के साथ रहीं। महाभारत उनकी तुलना वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती और अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा से करता है।
रामायण: दशरथ का पुत्र-यज्ञ
रामायण में यह कथा अयोध्या से शुरू होती है। राजा दशरथ के कोई पुत्र नहीं था, और उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का निश्चय किया।
तब मंत्री सुमन्त्र ने एक पुरानी भविष्यवाणी सुनाई। सनत्कुमार ने ऋषियों के बीच कहा था कि ऋष्यशृंग दशरथ को पुत्र दिलाएँगे।
वसिष्ठ की अनुमति लेकर दशरथ स्वयं अंग देश गए। वहाँ वे सात-आठ दिन लोमपाद के अतिथि रहे।
फिर दशरथ बोले — "राजन्, तुम्हारी पुत्री शान्ता अपने पति के साथ मेरे नगर चले। एक बड़ा काम करना है।"
ऋष्यशृंग शान्ता के साथ अयोध्या आए। शंख और नगाड़ों से उनका स्वागत हुआ, और रानियाँ शान्ता को देखकर प्रसन्न हुईं।
अश्वमेध के बाद ऋष्यशृंग ने कहा — "आपके कुल को बढ़ाने वाले चार पुत्र होंगे।"
फिर उन्होंने अथर्ववेद के मंत्रों से पुत्र-प्राप्ति की इष्टि (छोटा यज्ञ) की। देवता, गन्धर्व और ऋषि अपना भाग लेने आए।
यज्ञ की अग्नि से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसके हाथों में दिव्य खीर से भरा सोने का पात्र था।
उसने कहा — "यह देवताओं की बनाई खीर अपनी रानियों को दो। इससे तुम्हें पुत्र मिलेंगे।" दशरथ ने वह खीर तीनों रानियों में बाँटी।
यज्ञ पूरा होने पर ऋष्यशृंग शान्ता के साथ लौट गए। उसके बाद कौसल्या ने राम को जन्म दिया।
दोनों ग्रंथों में अंतर
मूल कथा दोनों ग्रंथों में एक है। पर कई बातें अलग हैं। नीचे की तालिका में हर रूप अपने ग्रंथ के नाम से है।
शान्ता किसकी पुत्री थीं, इस पर पाठ अलग हैं। महाभारत और समीक्षित रामायण उन्हें लोमपाद की पुत्री कहते हैं। प्रचलित पाठ उन्हें दशरथ की पुत्री बताता है।
| बात | महाभारत (वन पर्व) | रामायण (बाल काण्ड) | स्रोत |
|---|---|---|---|
| कथा कौन सुनाता है | लोमश, युधिष्ठिर को | सुमन्त्र, दशरथ को (सनत्कुमार की भविष्यवाणी) | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CX; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.8.5–7 |
| जन्म | हिरनी से; सिर पर सींग | विभाण्डक के पुत्र; हिरनी का उल्लेख नहीं | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CX; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.8.7; 1.9.14 |
| योजना किसकी | एक बूढ़ी स्त्री; नाव पर आश्रम | पुरोहित और मंत्री; गणिकाएँ भेजी गईं | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CX–CXI; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.9.2–7 |
| वर्षा कब | अंतःपुर में पहुँचने पर | लाए जाते समय ही | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXIII; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.9.28 |
| शान्ता | लोमपाद की पुत्री | समीक्षित पाठ: लोमपाद की पुत्री; प्रचलित पाठ: दशरथ की पुत्री, लोमपाद को दी गई | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXIII; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.10.19; रामायण (Griffith अनु.), Canto X |
| आगे क्या | पुत्र होने पर पिता के पास वन लौटे | दशरथ का पुत्र-यज्ञ कराया | महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CXIII; वाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 1.14–1.17 |
