महर्षि कपिल

सांख्य दर्शन के प्रवर्तक

संक्षेप में

कपिल मुनि की एक हुंकार से राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र राख हो गए थे। पर उन्हीं कपिल ने यज्ञ के लिए बँधी एक गाय को देखा, तो उनके मुँह से निकला — "हाय, ये वेद!" परंपरा उन्हें सांख्य दर्शन का प्रवर्तक मानती है, जिन्होंने संसार को दुख में देखकर करुणा से ज्ञान बाँटा।

रामायण के ऋषिमहाभारत के ऋषिज्ञान और दर्शन-परंपरा

एक नज़र में

महर्षि कपिल — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण के ऋषि, महाभारत के ऋषि, ज्ञान और दर्शन-परंपरावाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.39.22–28; महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CVII; शान्ति पर्व, Section CCCL; महाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCL; सांख्य कारिका और गौडपाद-भाष्य (Colebrooke–Wilson अनु.), कारिका 70 (p. 255)
आश्रम और स्थानधरती के नीचे, उत्तर-पूर्व दिशा मेंवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), बाल काण्ड 1.39.23–24; महाभारत (Ganguli अनु.), वन पर्व, Section CVII

नाम और अर्थ

"कपिल" का अर्थ है भूरा या पिंगल रंग। Wilson बताते हैं कि यह शब्द अग्नि के लिए भी आता है। शायद इसी से कुछ लोग कपिल और अग्नि को एक मानने लगे।

जीवन और पृष्ठभूमि

जन्म से ही ज्ञानी

सांख्य कारिका के भाष्यकार गौडपाद कपिल को ब्रह्मा का पुत्र बताते हैं। एक पुराने श्लोक के अनुसार सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, कपिल, वोढु और पञ्चशिख ब्रह्मा के सात महान पुत्र थे।

गौडपाद के अनुसार कपिल के साथ ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य जन्मे। संसार को अंधकार में डूबा देखकर उन्हें करुणा आई, और उन्होंने आसुरि को पच्चीस तत्वों का ज्ञान दिया।

रामायण कपिल को "सनातन वासुदेव" कहती है, और महाभारत भी उन्हें "कपिल वासुदेव" कहता है। Wilson के अनुसार वैष्णव परंपरा उन्हें विष्णु के अवतारों में गिनती है।

प्रमुख कथाएँ

सगर के साठ हज़ार पुत्र

राजा सगर के यज्ञ का घोड़ा चोरी हो गया। उसे खोजते हुए उनके साठ हज़ार पुत्र धरती खोदने लगे। वे वहाँ पहुँचे, जहाँ कपिल बैठे थे और पास में घोड़ा चर रहा था।

राजकुमार कपिल को ही चोर समझकर उन पर टूट पड़े। कपिल ने क्रोध में एक हुंकार भरी, और सब राख हो गए। महाभारत के अनुसार राजकुमारों ने कपिल की उपस्थिति की परवाह ही नहीं की थी।

महाभारत में आगे सगर का पोता अंशुमान कपिल के पास गया, और सिर झुकाकर प्रणाम किया। प्रसन्न कपिल ने उसे घोड़ा लौटा दिया, और आशीर्वाद दिया कि उसका पोता गंगा को धरती पर लाएगा।

पूरी गाथा पढ़ें: कपिल, सगर और भगीरथ: गंगा का अवतरण →

कपिल और गाय: "हाय, ये वेद!"

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म एक पुराना संवाद सुनाते हैं। राजा नहुष के यहाँ अतिथि आए थे, और सत्कार के लिए एक गाय को वध के लिए बाँधा गया था। यह वैदिक विधि के अनुसार था।

बँधी गाय को देखकर संयमी, निर्भय और सत्य में स्थित कपिल के मुँह से एक ही शब्द निकला — "हाय, ये वेद!"

तभी ऋषि स्यूमरश्मि योग-बल से उस गाय के शरीर में प्रवेश कर गए, और कपिल से बोले — "रुको कपिल! ऋषि वेदों को ईश्वर के वचन मानते हैं। तुम उन पर उँगली कैसे उठाते हो?"

कपिल ने उत्तर दिया — "मैं वेदों की निंदा नहीं करता। चारों आश्रम एक ही ऊँचे लक्ष्य तक ले जाते हैं। वेद 'कर्म करो' भी कहते हैं, और 'कर्म मत करो' भी।"

"इसलिए किस वचन का बल कितना है, यह तय करना कठिन है। अगर तुम अहिंसा से बढ़कर कोई धर्म जानते हो, जो सीधे अनुभव पर टिका हो, तो मुझे बताओ।"

स्यूमरश्मि ने यज्ञ के पक्ष में तर्क दिए, और लंबा संवाद चला। कपिल का अंतिम उत्तर यह था — "कर्म केवल शरीर को शुद्ध करते हैं। सबसे ऊँचा लक्ष्य ज्ञान है।"

"जब मन के दोष दूर हो जाते हैं, तो ज्ञान, क्षमा, शांति, करुणा, सत्य, अहिंसा और विनम्रता आती हैं। यही ब्रह्म तक जाने का रास्ता है।"

ग्रंथों में अंतर

भीष्म यह संवाद किसी एक पक्ष को सही ठहराने के लिए नहीं सुनाते। वे पहले ही कहते हैं कि कर्म का मार्ग और कर्म-त्याग का मार्ग, दोनों को सज्जन अपनाते हैं। दोनों प्रमाणित हैं।

आसुरि को सांख्य का ज्ञान

सांख्य कारिका अपनी परंपरा स्वयं लिखती है — "यह पवित्र ज्ञान मुनि (कपिल) ने करुणा से आसुरि को दिया। आसुरि ने पञ्चशिख को, और पञ्चशिख ने इसे दूर-दूर तक फैलाया।"

योग-सूत्र के भाष्य में भी पञ्चशिख का एक वचन है — "प्रथम ज्ञानी ने करुणा से आसुरि को यह विद्या सिखाई।" टीकाकार वाचस्पति के अनुसार यह प्रथम ज्ञानी कपिल हैं। पूरी परंपरा "सांख्य दर्शन" लेख में है।

शिक्षाएँ

कर्म केवल शरीर को शुद्ध करते हैं, सबसे ऊँचा लक्ष्य ज्ञान है।

अहिंसा पर कपिल का प्रश्न आज भी सोचने लायक है। अगर अहिंसा से बढ़कर कोई धर्म हो, जो सीधे अनुभव पर टिका हो, तो बताओ।

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंसांख्य दर्शन — महाभारत कहता है, "सांख्य के प्रवर्तक महर्षि कपिल हैं।" सांख्य कारिका भी अपनी परंपरा कपिल से शुरू करती है।

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंधरती के नीचे, उत्तर-पूर्व दिशा में — रामायण के अनुसार सगर-पुत्रों ने कपिल को उत्तर-पूर्व दिशा में धरती खोदकर पाया। महाभारत के अनुसार समुद्र के उत्तर-पूर्वी भाग में, पाताल तक खोदने पर। इन ग्रंथों में किसी आज के तीर्थ का नाम नहीं दिया गया।

संबंधित गाथाएँ

ऋषियों का योगदान

स्रोत

महर्षि कपिल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न