तपस्वी के लिए बंद पितृलोक
खाण्डव-दाह के बाद जनमेजय ने पूछा — "उस आग में शार्ङ्ग पक्षी क्यों नहीं जले?" उत्तर में वैशम्पायन ने मन्दपाल की कथा सुनाई।
मन्दपाल शास्त्रों के ज्ञाता, कठोर व्रती और तपस्वी ऋषि थे। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का मार्ग चुना था।
तप पूरा करके वे शरीर छोड़कर पितृलोक पहुँचे। पर वहाँ उन्हें अपने तप का फल नहीं मिला।
उन्होंने देवताओं से पूछा — "मेरे तप से कमाए लोक मेरे लिए बंद क्यों हैं?"
देवताओं ने कहा — "मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्मता है। यज्ञ, तप और संतान से वे चुकते हैं। तुमने तप और यज्ञ किए, पर संतान नहीं।"
"वेद कहता है कि पुत्र पिता को 'पुत्' नाम के नरक से तारता है। इसलिए संतान के लिए यत्न करो।"
शार्ङ्ग पक्षी का रूप
मन्दपाल ने सोचा कि कम समय में सबसे अधिक संतान किसकी होती है। उत्तर मिला — पक्षियों की।
वे शार्ङ्ग पक्षी बने, और जरिता नाम की शार्ङ्गी से उनके चार पुत्र हुए। चारों वेद-पाठी थे।
बच्चे अभी अंडों में ही थे। तभी मन्दपाल उन्हें माँ के साथ खाण्डव वन में छोड़ गए। वे लपिता नाम की दूसरी पत्नी के पास चले गए।
जरिता अकेली रह गई। पर ममता के कारण उसने बच्चों को नहीं छोड़ा, और उन्हें पाला।
पिता ने जाते हुए कहा था — "बड़ा जरितारि वंश चलाएगा। सारिसृक्व पितरों का वंश बढ़ाएगा। स्तम्बमित्र तपस्वी होगा। और छोटा द्रोण वेदज्ञों में श्रेष्ठ होगा।"
पिता का अग्नि से वचन
एक दिन लपिता के साथ घूमते हुए मन्दपाल ने अग्नि को खाण्डव जलाने आते देखा। उन्हें बच्चों की याद आई।
उन्होंने अग्नि की स्तुति की — "तुम सब लोकों का मुख हो। तुम्हारे बिना यह संसार एक दिन में नष्ट हो जाए।"
प्रसन्न अग्नि ने पूछा — "मैं तुम्हारा क्या भला करूँ?" मन्दपाल ने हाथ जोड़े — "खाण्डव जलाते समय मेरे बच्चों को छोड़ देना।" अग्नि बोले — "ऐसा ही होगा।"
माँ की दुविधा
आग भड़की, तो नन्हे पक्षी घबरा गए। जरिता रो पड़ी — "इनके पंख नहीं, पैर नहीं। मैं किसे ले जाऊँ, किसे छोड़ूँ?"
"कोई उपाय नहीं दिखता। मैं तुम्हें पंखों से ढककर तुम्हारे साथ ही मर जाऊँगी।"
बच्चों ने कहा — "माँ, मोह छोड़कर जहाँ आग न हो, वहाँ चली जाओ। हम मरे, तो तुम्हें और संतान होगी। तुम मरीं, तो वंश ही रुक जाएगा।"
माँ ने उपाय बताया — "पेड़ के पास एक चूहे का बिल है। उसमें घुस जाओ, मैं मुँह पर मिट्टी डाल दूँगी।"
बच्चों ने मना किया — "बिना पंख के हम माँस के लोथड़े हैं। बिल में चूहा हमें खा जाएगा। चूहे का भोजन बनने से आग में जलना अच्छा है।"
माँ बोली — "उस चूहे को तो बाज़ पकड़ ले गया, मैंने स्वयं देखा।" बच्चे बोले — "और चूहे भी हो सकते हैं। बिल में मृत्यु पक्की है, यहाँ नहीं। हवा भी आग को उलटी ओर ले जा रही है।"
अंत में उन्होंने कहा — "तुम युवा हो, पति के पास जाओ। आग ने हमें न जलाया, तो लौटकर हमें फिर पा लेना।" भारी मन से जरिता चली गई।
चार बाल-ऋषियों की अग्नि-स्तुति
आग उनके घोंसले की ओर बढ़ी। सबसे बड़े जरितारि ने कहा — "समझदार मृत्यु के सामने जागा रहता है। इसलिए अंत समय उसे पीड़ा नहीं होती।"
फिर चारों ने एक-एक करके अग्नि की स्तुति की। जरितारि ने कहा — "तुम वायु की आत्मा हो, वनस्पतियों का शरीर हो।"
सारिसृक्व बोले — "हमारी माँ नहीं दिखती, पिता को हम जानते नहीं, पंख अभी उगे नहीं। हम बालक हैं, और ऋषि हैं। हमें बचाओ, और दूसरे रास्ते से जाओ।"
स्तम्बमित्र ने कहा — "हे अग्नि, सब कुछ तुम ही हो। तुम तीनों लोक रचते हो, और समय आने पर फिर समेट लेते हो।"
द्रोण ने कहा — "तुम सूर्य बनकर धरती का जल खींचते हो, और वर्षा बनकर लौटाते हो। हमें छोड़कर दूर से निकल जाओ, जैसे सागर किनारे के घरों को छोड़ देता है।"
अग्नि प्रसन्न हुए — "द्रोण, तुम ऋषि हो। तुमने जो कहा, वह ब्रह्म-वचन है। मन्दपाल ने भी तुम्हारे लिए कहा था। दोनों बातें मेरे लिए भारी हैं। बोलो, क्या करूँ?"
द्रोण ने एक ही बात माँगी — "ये बिल्लियाँ हमें रोज़ सताती हैं। इन्हें जला दो।" अग्नि ने उन्हें छोड़ दिया, और खाण्डव जलाते हुए आगे बढ़ गए।
पिता की वापसी
उधर मन्दपाल बेचैन थे। उन्होंने लपिता से एक-एक बच्चे का नाम लेकर चिंता जताई।
लपिता ने ईर्ष्या से कहा — "अग्नि ने वचन दिया है, फिर चिंता क्यों? तुम्हें बच्चों की नहीं, जरिता की याद आ रही है।"
मन्दपाल बोले — "जो हाथ में है, उसे छोड़कर जो मिल सकता है उसके पीछे भागे, वह दुष्ट है। मैं जाऊँगा।"
आग जा चुकी थी। जरिता लौटी, तो चारों बच्चे सुरक्षित मिले। सब रो पड़े, और माँ ने एक-एक को गले लगाया।
तभी मन्दपाल पहुँचे। पर न बच्चे उनसे कुछ बोले, न जरिता। उन्होंने बार-बार बात की, फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला।
जरिता ने कहा — "बड़े-छोटे से तुम्हें क्या काम? उसी लपिता के पास जाओ।" मन्दपाल ने अपनी सफ़ाई दी। अंत में बच्चे आगे आए, उन्हें प्रणाम किया, और पिता ने उन्हें आश्वस्त किया।
ऋग्वेद में चारों के नाम
ऋग्वेद के दसवें मण्डल का 142वाँ सूक्त अग्नि की स्तुति है। Griffith की सूक्त-सूची में इसके ऋषि हैं — जरितार, द्रोण, सारिसृक्व और स्तम्बमित्र।
सूक्त में अग्नि से कहा गया है — "तुम झाड़-झंखाड़ खाते हुए भी पत्थरों को छोड़ देते हो।"
और अंत में — "यह जल का भंडार है। इस रास्ते से नहीं, दूसरे रास्ते से जाओ।" महाभारत में बच्चे अग्नि से लगभग यही कहते हैं।
Griffith की टिप्पणी है कि सातवाँ और आठवाँ मंत्र शायद किसी और सूक्त के हैं। उनमें वक्ता अग्नि से अपना घर बख्शने को कहता है।
| पुत्र | पिता ने क्या कहा था | अग्नि-स्तुति में | स्रोत |
|---|---|---|---|
| जरितारि (सबसे बड़ा) | वंश इसी पर टिका है | "समझदार मृत्यु के सामने जागा रहता है" | महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.221.8; 1.222.18 |
| सारिसृक्व | पितरों का वंश बढ़ाएगा | "हम बालक हैं, ऋषि हैं, दूसरे रास्ते जाओ" | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CCXXXII; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.223.10–11 |
| स्तम्बमित्र | तपस्वी होगा | "सब कुछ तुम ही हो" | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CCXXXII; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.223.12–14 |
| द्रोण (सबसे छोटा) | वेदज्ञों में श्रेष्ठ होगा | "सागर किनारे के घरों की तरह हमें छोड़ दो" | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CCXXXII; महाभारत (समीक्षित पाठ), 1.223.16–19 |
