महर्षि दुर्वासा
क्रोध के लिए प्रसिद्ध, पर धैर्य पर वरदान देने वाले ऋषि
संक्षेप में
दुर्वासा के क्रोध से राजा भी डरते थे। वे कभी आधी रात भोजन माँगते, कभी परोसा भोजन छोड़ देते, कभी बिना कारण हँसते-रोते। पर जिसने उनकी हर परीक्षा में धैर्य रखा, उसे उन्होंने बड़े वरदान दिए। कुन्ती, कृष्ण और रुक्मिणी — तीनों को ऐसे ही वरदान मिले।
महाभारत के ऋषिरामायण के ऋषि
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | महाभारत के ऋषि, रामायण के ऋषि | महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CXI; वन पर्व, Section CCLX–CCLXI; रामायण, उत्तर काण्ड (Dutt अनु.), Section CXVIII |
| पिता | महर्षि अत्रि | रामायण, उत्तर काण्ड (Dutt अनु.), Section CXVIII; मार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Canto XVII (p. 99) |
जीवन और पृष्ठभूमि
अत्रि और अनसूया के पुत्र
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अनसूया के वरदान से ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अंश उनके पुत्र बने। वे थे — सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा। दुर्वासा शिव के अंश थे।
पुराण कहता है कि गर्भ में लंबे समय तक रहने के कष्ट से वह अंश क्रोध से भरा था। इसलिए दुर्वासा में तमस की प्रधानता थी। रामायण भी उन्हें "अत्रि का पुत्र" कहती है।
महाभारत में कृष्ण उनका रूप बताते हैं। हरा-पीला रंग, फटे वस्त्र, और बेल की लकड़ी का डंडा। लंबी दाढ़ी, बहुत दुबला शरीर, और सबसे ऊँचा कद।
वे सभाओं और चौराहों पर गाते फिरते — "कौन है, जो दुर्वासा को अपने घर अतिथि बनाकर रखे? मैं छोटी-सी भूल पर भी क्रोधित हो जाता हूँ। यह जानकर भी कौन मुझे शरण देगा?"
प्रमुख कथाएँ
कुन्ती को मंत्र
कुन्ती (पृथा) अपने दत्तक पिता कुन्तिभोज के घर ब्राह्मणों और अतिथियों की सेवा करती थीं। एक बार क्रोधी दुर्वासा आए, और पृथा ने पूरी सावधानी से उनकी सेवा की।
प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया — "इससे तुम जिस देवता को बुलाओगी, वह आएगा, और उसकी कृपा से तुम्हें संतान होगी।"
महाभारत एक बात और कहता है। दुर्वासा ने अपनी शक्ति से आगे आने वाली कठिनाई पहले ही देख ली थी। पाण्डु को मिलने वाला शाप, जिसके कारण उन्हें संतान नहीं हो सकती थी। इसीलिए उन्होंने यह मंत्र दिया।
इसी मंत्र से आगे कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन का जन्म हुआ।
कृष्ण और रुक्मिणी की परीक्षा
अनुशासन पर्व में कृष्ण स्वयं अपने पुत्र प्रद्युम्न को यह कथा सुनाते हैं। जब कोई दुर्वासा को घर रखने को तैयार नहीं हुआ, तो कृष्ण ने उन्हें अपने घर बुलाया।
दुर्वासा कभी हज़ारों लोगों जितना खाते, कभी बहुत थोड़ा। कभी घर से निकल जाते, कभी बिना कारण हँसते या रोते। एक दिन उन्होंने अपने कमरे के बिस्तर और सामान जला दिए।
फिर उन्होंने खीर माँगी। थोड़ी खाकर कृष्ण से कहा — "बची खीर अपने पूरे शरीर पर लगा लो।" कृष्ण ने बिना झिझके लगा ली। फिर उन्होंने रुक्मिणी पर भी खीर लगाई, और उन्हें रथ में जोतकर नगर की सड़क पर चल पड़े।
रुक्मिणी लड़खड़ाती रहीं, और ऋषि क्रोध में चाबुक चलाते रहे। यादव वीर क्रोधित हो उठे। पर कृष्ण कहते हैं — "मेरे मन में न दुख आया, न ऋषि को हानि पहुँचाने की इच्छा।"
अंत में दुर्वासा रथ से कूदे, और बिना रास्ते के दक्षिण की ओर भागे। खीर से सने कृष्ण पीछे-पीछे दौड़े — "प्रसन्न हो जाइए!" तब ऋषि रुके — "कृष्ण, तुमने अपने स्वभाव से क्रोध को जीत लिया। मुझे तुममें कोई दोष नहीं मिला।"
फिर उन्होंने वरदान दिए। जहाँ-जहाँ खीर लगी थी, वहाँ से कृष्ण को मृत्यु का भय नहीं होगा। पर उन्होंने पूछा — "तलवों पर खीर क्यों नहीं लगाई?" रुक्मिणी को सदा युवा रहने और कृष्ण की सबसे प्रिय पत्नी होने का वर मिला।
कृष्ण बताते हैं कि घर लौटे, तो ऋषि का जलाया-तोड़ा हर सामान पहले से नया और अच्छा होकर मिला।
दुर्योधन की चाल, और द्रौपदी की थाली
वनवास के दिनों में दुर्वासा दस हज़ार शिष्यों के साथ हस्तिनापुर आए। दुर्योधन ने सेवक बनकर उनकी सेवा की। ऋषि कभी आधी रात भोजन बनवाते और फिर नहीं खाते, पर दुर्योधन कभी नाराज़ नहीं हुआ।
प्रसन्न दुर्वासा ने वर माँगने को कहा। दुर्योधन ने कर्ण और दुःशासन के साथ पहले ही योजना बना ली थी। उसने माँगा — "आप युधिष्ठिर के भी अतिथि बनें, पर तब जाएँ, जब द्रौपदी सबको खिलाकर स्वयं भी खा चुकी हो।"
दुर्वासा पहुँचे, और युधिष्ठिर ने उन्हें स्नान करके आने को कहा। द्रौपदी के पास भोजन नहीं बचा था। उसने कृष्ण को पुकारा। कृष्ण आए, और बोले — "मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को दो।"
द्रौपदी की थाली के किनारे चावल और साग का एक कण लगा था। कृष्ण ने वही खाया, और कहा — "इससे विश्वात्मा हरि तृप्त हों।" उधर नदी में नहाते ऋषियों का पेट अचानक भर गया।
शिष्यों ने कहा — "अब हम खा नहीं सकते, भोजन बेकार होगा।" दुर्वासा डर गए — "हमने धर्मात्मा युधिष्ठिर का अपमान किया है। हरि के भक्तों से मैं डरता हूँ। चलो, भाग चलें।" और सब भाग गए।
राम के द्वार पर, और लक्ष्मण का त्याग
रामायण के उत्तर काण्ड में काल-देवता राम से अकेले में बात करने आए। उनकी शर्त थी कि जो उन्हें बात करते सुने या देखे, उसका वध राम करें। राम ने लक्ष्मण को द्वार पर खड़ा किया।
तभी दुर्वासा आए — "तुरंत राम से मिलाओ।" लक्ष्मण ने विनम्रता से थोड़ा रुकने को कहा। दुर्वासा क्रोध से लाल हो गए — "अभी नहीं गए, तो राम, भरत, शत्रुघ्न, तुम्हारे वंश और पूरे राज्य को शाप दे दूँगा।"
लक्ष्मण ने सोचा — "सबके नाश से अच्छा है, अकेले मेरा नाश हो।" वे भीतर गए। राम बाहर आए। दुर्वासा ने बताया — "हज़ार वर्ष का उपवास आज पूरा हुआ है, भोजन दो।" भोजन करके वे लौट गए।
पर वचन टूट चुका था। वसिष्ठ ने कहा कि वचन तोड़ना धर्म का नाश है। राम बोले — "सज्जनों के लिए त्याग और वध एक समान हैं।" और उन्होंने लक्ष्मण का त्याग किया। लक्ष्मण सरयू के तट पर योग से शरीर छोड़कर देवलोक गए।
ग्रंथों में अंतर
कालिदास के नाटक "अभिज्ञान शाकुन्तलम्" में दुर्वासा शकुन्तला को शाप देते हैं, जिससे दुष्यन्त उसे भूल जाते हैं। पर महाभारत की शकुन्तला-कथा में दुर्वासा नहीं हैं। यह अंतर "कण्व और शकुन्तला" गाथा में विस्तार से है।
शिक्षाएँ
दुर्वासा की कथाओं का केंद्र धैर्य है। कुन्ती, कृष्ण और रुक्मिणी ने उनकी कठोर परीक्षाओं में भी क्रोध नहीं किया, और बड़े वरदान पाए।
पर दुर्योधन की कथा एक चेतावनी भी है। धैर्य से पाए वरदान को भी बुरी नीयत से माँगा जा सकता है। फिर भी द्रौपदी की सच्ची पुकार के आगे वह चाल टिक नहीं पाई।
संबंधित ऋषि
- महर्षि अत्रि — पिता
संबंधित गाथाएँ
- कण्व और शकुन्तला — पूरी गाथा
- अणी-माण्डव्य: शूली पर बैठे ऋषि और धर्मराज का दंड — पूरी गाथा
- मुद्गल: एक द्रोण अनाज, दुर्वासा की परीक्षा, और ठुकराया स्वर्ग — पूरी गाथा
स्रोत
- The Mahabharata of Krishna-Dwaipayana Vyasa — Kisari Mohan Ganguli (अनु.) (1896) · आदि पर्व LXVII, CXI; वन पर्व CCLX–CCLXI; अनुशासन पर्व CLIX — कुन्ती, पाण्डव, कृष्ण-रुक्मिणी
- The Ramayana, Book 7: Uttara Kandam — Manmatha Nath Dutt (अनु.) (1894) · Section CXVI–CXIX — राम का द्वार, लक्ष्मण
- The Markandeya Purana (Bibliotheca Indica) — F. Eden Pargiter (अनु.) (1904) · Canto XVII (p. 99) — अत्रि-अनसूया के पुत्र
