महर्षि कुत्स

ऋग्वेद के सूक्त-द्रष्टा, आङ्गिरस-परंपरा

संक्षेप में

महर्षि कुत्स ऋग्वेद के सूक्त-द्रष्टा हैं। सर्वानुक्रमणी ऋग्वेद 1.94 (अग्नि के सोलह मन्त्र) और 1.101 का ऋषि कुत्स बताती है, और 10.105 का ऋषि "कौत्स दुर्मित्र" — यानी कुत्स के वंशज। गोत्र-प्रवर ग्रंथों में "कुत्स" नाम केवल-आङ्गिरस परंपरा के यौवनाश्व गण में दर्ज है, और प्रवरमञ्जरी के अनुसार हरित और कुत्स आपस में विवाह नहीं करते।

मंत्रद्रष्टा ऋषि

ग्रंथों में

  • "इमं षोळश कुत्स आग्नेयं" — ऋग्वेद 1.94 के सोलह मन्त्र कुत्स के, अग्नि-देवता के।
  • "प्र मंदिन एकादश कुत्स" — ऋग्वेद 1.101 के ग्यारह मन्त्र भी कुत्स के।
  • "कौत्सो दुर्मित्रो नाम्ना सुमित्रो गुणतः" — ऋग्वेद 10.105 का ऋषि कौत्स (कुत्स का वंशज) दुर्मित्र, जो गुण से सुमित्र था।
  • यौवनाश्व गण (गण 32) में "कुत्स" नाम; प्रवर: आङ्गिरस, आम्बरीष, यौवनाश्व।
  • "हरितकुत्सानां परस्परमविवाहः" — हरित और कुत्स आपस में विवाह नहीं करते; कण्व आदि कर सकते हैं।

कुत्स से जुड़े गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

स्रोत

महर्षि कुत्स — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न