महर्षि वेदव्यास

वेदों के विभाजक, महाभारत के रचयिता

संक्षेप में

महर्षि वेदव्यास वही ऋषि हैं, जिन्होंने देखा कि युग के साथ मनुष्य की शक्ति और आयु घट रही है। तब उन्होंने एक वेद को चार भागों में बाँटा, ताकि लोग उसे सँभाल सकें। यमुना के एक द्वीप पर जन्मे इस ऋषि ने महाभारत रची। माँ की एक पुकार पर वे लौटे, और कुरुवंश को आगे बढ़ाया।

महाभारत के ऋषिपुराणों के ऋषि

एक नज़र में

महर्षि वेदव्यास — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीमहाभारत के ऋषि, पुराणों के ऋषिमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section I, LXIII; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 3–4 और 6 (vol. 3, pp. 33–42, 64)
पितामहर्षि पराशरमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXIII; विष्णु पुराण (Wilson अनु.), अंश 3, अध्याय 4 (p. 41)
पितामहमहर्षि शक्तिमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section CLXXIX
पुत्रमहर्षि शुकदेवमहाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCXXV; महाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXIII
आश्रम और स्थानयमुना का द्वीप, मेरु पर्वत का शिखरमहाभारत (Ganguli अनु.), आदि पर्व, Section LXIII; महाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCXXIV–CCCXXV

नाम और अर्थ

वेदव्यास के कई नाम हैं, और हर नाम उनकी एक पहचान बताता है। पूरा नाम है कृष्ण द्वैपायन व्यास। आइए इसे तीन हिस्सों में समझें।

"द्वैपायन" का अर्थ है द्वीप में जन्मा। उनकी माँ सत्यवती ने उन्हें यमुना नदी के बीच एक छोटे द्वीप पर जन्म दिया था। महाभारत स्वयं बताता है कि इसी से उनका नाम द्वैपायन पड़ा।

"कृष्ण" का अर्थ है साँवला। महाभारत में उन्हें बार-बार "साँवले रंग वाले, द्वीप में जन्मे व्यास" कहा गया है।

"व्यास" का अर्थ है बाँटने और सजाने वाला। उन्होंने एक वेद को चार भागों में बाँटकर सजाया, इसलिए वे व्यास कहलाए, और "वेदव्यास" भी।

एक बात कम लोग जानते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार "व्यास" एक पद भी है। हर द्वापर युग में एक व्यास वेद को बाँटते हैं। अब तक 28 व्यास हुए हैं, और महाभारत वाले कृष्ण द्वैपायन 28वें व्यास हैं।

जीवन और पृष्ठभूमि

माता-पिता और वंश

वेदव्यास के पिता महर्षि पराशर थे, और माता सत्यवती। पराशर, महर्षि शक्ति के पुत्र और वसिष्ठ के पौत्र थे। इस तरह व्यास वसिष्ठ के वंश में आते हैं।

सत्यवती मछुआरों के बीच पली थीं। वे पिता की सेवा के लिए यमुना में नाव चलाती थीं। उस समय उनके शरीर से मछली जैसी गंध आती थी। बाद में पराशर के वरदान से उनका शरीर सुगंधित हो गया, और वे "गन्धवती" कहलाईं।

बाद में सत्यवती का विवाह हस्तिनापुर के राजा शान्तनु से हुआ। इस रिश्ते से व्यास, भीष्म के सौतेले भाई और कुरुवंश के बड़े बेटे बने। सत्यवती स्वयं कहती हैं — "जैसे भीष्म पिता की ओर से भाई हैं, वैसे तुम माँ की ओर से।"

जन्म से ही तपस्वी

व्यास का जन्म यमुना के एक द्वीप पर, उसी दिन हुआ। जन्म लेते ही उनका मन तप में लग गया। माँ से आज्ञा लेकर वे वन की ओर चल पड़े।

जाते समय उन्होंने माँ से एक वचन दिया — "स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येषु।" यानी जब भी ज़रूरत हो, मुझे याद करना, मैं आ जाऊँगा। यही वचन आगे चलकर पूरे कुरुवंश की कहानी बदल देता है।

प्रमुख कथाएँ

एक वेद, चार भाग: वेदव्यास का सबसे बड़ा काम

महाभारत बताता है कि व्यास ने एक गहरी बात देखी। हर युग में धर्म का एक पैर कमज़ोर होता जाता है। मनुष्य की आयु और शक्ति भी युग के साथ घटती जाती है।

इतने विशाल वेद को कम शक्ति वाले मनुष्य कैसे सँभालेंगे? इसी चिंता से उन्होंने वेद को चार भागों में बाँटा — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। विष्णु पुराण भी यही कारण देता है: मनुष्यों की सीमित क्षमता।

हर वेद उन्होंने एक योग्य शिष्य को सौंपा। ऋग्वेद पैल को, यजुर्वेद वैशम्पायन को, सामवेद जैमिनि को, और अथर्ववेद सुमन्तु को। इतिहास और पुराण की परंपरा उन्होंने सूत लोमहर्षण को दी।

फिर इन शिष्यों ने आगे अपने-अपने शिष्यों को सिखाया, और वेद की अनेक शाखाएँ बनीं। आज जो वेद हम तक पहुँचे हैं, वे इसी गुरु-शिष्य परंपरा से आए हैं।

माँ की पुकार और कुरुवंश

हस्तिनापुर में एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई। सत्यवती के दोनों पुत्र, चित्रांगद और विचित्रवीर्य, बिना संतान के चल बसे। भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य का प्रण ले रखा था। कुरुवंश के आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

तब सत्यवती को अपने बड़े बेटे का वचन याद आया। उन्होंने मन में व्यास को याद किया। उस समय व्यास वेदों की व्याख्या में लगे थे, पर माँ की पुकार सुनते ही तुरंत आ पहुँचे।

इतने बरसों बाद बेटे को देखकर सत्यवती की आँखें भर आईं। उन्होंने व्यास को गले लगा लिया और रो पड़ीं। व्यास ने ठंडे जल से माँ के आँसू पोंछे, प्रणाम किया और बोले — "माँ, मैं आपकी इच्छा पूरी करने आया हूँ। आज्ञा दीजिए।"

माँ की आज्ञा से, उस समय की नियोग-परंपरा के अनुसार, व्यास से विचित्रवीर्य की दोनों रानियों के पुत्र हुए। अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु। रानी की एक दासी से विदुर जन्मे।

जाते समय व्यास ने उस दासी से कहा — "अब तुम दासी नहीं रहोगी। तुम्हारा पुत्र धर्मात्मा होगा, और धरती के सबसे बुद्धिमान लोगों में गिना जाएगा।" वही पुत्र महात्मा विदुर हुए।

महाभारत की रचना

महाभारत के अनुसार व्यास ने यह ग्रंथ तीन वर्ष में रचा। वे रोज़ सुबह उठते, शुद्ध होकर तप करते, और फिर रचना में लगते।

उपकथाओं के बिना, मूल "भारत" 24,000 श्लोकों का था। इसके बाद उन्होंने 150 श्लोकों में पूरी कथा का सार भी बनाया, जो सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को सिखाया।

महाभारत अपने बारे में यह भी कहता है कि व्यास ने इसका 6 लाख श्लोकों वाला रूप रचा। इसमें से 1 लाख श्लोक मनुष्य-लोक में हैं, जिन्हें व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने सुनाया।

वैशम्पायन ने यह कथा राजा जनमेजय के सर्प-यज्ञ में पूरी सुनाई। बाद में सूत उग्रश्रवा ने नैमिषारण्य में शौनक और दूसरे ऋषियों को सुनाई। आज की महाभारत इसी सुनाने की परंपरा से आई है।

गणेश बने लेखक: एक प्रसिद्ध कथा

महाभारत के प्रचलित पाठ में एक सुंदर कथा है। रचना पूरी करके व्यास चिंता में थे कि इतना बड़ा काव्य लिखेगा कौन। तभी ब्रह्मा उनके पास आए। व्यास बोले, "मैंने यह काव्य मन में रच लिया है, पर धरती पर इसे लिखने वाला कोई नहीं।"

ब्रह्मा ने कहा — "इसे लिखने के लिए गणेश को याद करो।" व्यास ने गणेश का स्मरण किया, और वे तुरंत आ गए। व्यास ने प्रार्थना की, "मैं बोलता जाऊँ, आप लिखते जाइए।"

गणेश ने एक शर्त रखी — "मेरी कलम एक पल भी नहीं रुकनी चाहिए।" व्यास ने भी शर्त रखी — "जो श्लोक समझ न आए, उसे समझे बिना मत लिखिएगा।" गणेश ने "ॐ" कहकर हामी भरी।

सोचने का समय पाने के लिए व्यास बीच-बीच में बहुत गूढ़ श्लोक बोलते। गणेश उन्हें समझने में एक पल रुकते, और उतने में व्यास आगे के कई श्लोक रच लेते। कथा कहती है कि ऐसे 8,800 कठिन श्लोक हैं।

ग्रंथों में अंतर

यह कथा भक्तों में बहुत प्रिय है, और Ganguli के अनुवाद वाले प्रचलित पाठ में है। पर महाभारत के समीक्षित संस्करण (BORI) ने इसे मूल पाठ में नहीं, परिशिष्ट में रखा है।

कारण यह है कि ब्रह्मा और गणेश वाला यह प्रसंग दक्षिण भारत की पाण्डुलिपियों में नहीं मिलता। कश्मीरी और बंगाली पाठ में भी यह नहीं है। इसलिए विद्वान इसे बाद में जुड़ा प्रसंग मानते हैं।

पुत्र शुकदेव का जन्म

शान्ति पर्व में भीष्म यह कथा सुनाते हैं। व्यास ऐसा पुत्र चाहते थे जो अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश जैसा पवित्र हो। इसके लिए वे मेरु पर्वत की चोटी पर तप करने बैठे।

वे सौ वर्ष तक केवल हवा पीकर भगवान शिव की आराधना करते रहे। अंत में शिव प्रसन्न हुए और वरदान दिया — "तुम्हें वैसा ही पुत्र मिलेगा, जैसा तुम चाहते हो।"

एक दिन व्यास यज्ञ के लिए अरणि (आग जलाने की लकड़ियाँ) रगड़ रहे थे। ग्रंथ के अनुसार उसी समय अप्सरा घृताची को देखकर उनका मन क्षण भर विचलित हुआ। तभी उन्हीं अरणियों से एक तेजस्वी बालक प्रकट हुआ। यही शुकदेव थे।

शुक के जन्म पर गंगा ने स्वयं उन्हें स्नान कराया। शिव-पार्वती ने उन्हें जनेऊ पहनाया, और इन्द्र ने कमण्डलु दिया। कथा कहती है कि जन्म लेते ही सारे वेद उनमें वैसे ही आ बसे, जैसे उनके पिता में थे।

संजय को दिव्य दृष्टि

कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होने वाला था। व्यास अपने बेटे धृतराष्ट्र के पास आए, जो अपने पुत्रों की गलत नीति पर दुखी बैठे थे। व्यास बोले — "राजन्, तुम्हारे पुत्रों का समय आ गया है। अगर युद्ध देखना चाहो, तो मैं तुम्हें आँखें दे सकता हूँ।"

धृतराष्ट्र ने मना कर दिया — "मैं अपने ही परिवार का संहार नहीं देखना चाहता। हाँ, सब सुनना चाहता हूँ।" तब व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि दी।

व्यास ने कहा कि संजय युद्ध की हर बात देख सकेगा — दिन हो या रात, खुली हो या छिपी, यहाँ तक कि मन में सोची गई बात भी। कोई हथियार उसे नहीं काटेगा, और वह युद्ध से जीवित लौटेगा।

और जाते-जाते उन्होंने वह बात कही जो आज भी लोगों की ज़बान पर है — "यतो धर्मस् ततो जयः।" यानी जीत वहीं होती है, जहाँ धर्म होता है।

युद्ध के बाद: एक रात का मिलन

युद्ध के कई वर्ष बाद धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती वन में रह रहे थे। पाण्डव उनसे मिलने गए। सबके मन में युद्ध में मारे गए अपनों का दुख बाकी था। तब व्यास ने एक अद्भुत काम किया।

शाम को व्यास ने गंगा में स्नान किया, और युद्ध में मारे गए सभी योद्धाओं को पुकारा। पानी के भीतर से वैसा ही शोर उठा, जैसा युद्ध में सेनाओं का होता था। भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन, अभिमन्यु — सब गंगा से बाहर निकल आए।

पर अब उनके मन में न क्रोध था, न घमंड, न ईर्ष्या। व्यास ने धृतराष्ट्र को उस रात दिव्य दृष्टि दी, और गान्धारी ने भी अपने सारे पुत्रों को देखा।

उस रात बेटे पिता से मिले, पत्नियाँ पतियों से, भाई भाई से। पाण्डव कर्ण से प्रेम से मिले, और उनसे मेल कर लिया। उस रात न कोई दुख था, न डर। सुबह होते ही सब योद्धा पलक झपकते ही लौट गए।

त्याग और तप

व्यास ने जन्म लेते ही घर का सुख छोड़ दिया और तप के लिए वन चले गए। राजपरिवार से रिश्ता होते हुए भी उन्होंने कभी राजसुख नहीं चुना।

पुत्र के लिए उन्होंने मेरु पर्वत पर सौ वर्ष तक केवल हवा पीकर तप किया।

वे वेदों की व्याख्या जैसे बड़े काम में लगे थे। फिर भी माँ के एक बार याद करते ही सब छोड़कर आ गए। यह उनके दिए वचन का मान था।

शिक्षाएँ

ऊर्ध्वबाहुर् विरौम्य् एष न च कश् चिच् छृणोति मे। धर्माद् अर्थश् च कामश् च स किमर्थं न सेव्यते॥

मैं भुजाएँ उठाकर पुकार रहा हूँ, पर कोई नहीं सुनता। धर्म से ही धन मिलता है, और धर्म से ही सुख। फिर लोग धर्म का पालन क्यों नहीं करते?

— महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text, पृष्ठ 18.5.49

महाभारत के अंत में व्यास अपने पुत्र शुकदेव को यही बात सिखाते हैं। वे कहते हैं — सुख, डर या लालच, किसी के लिए भी धर्म मत छोड़ो। जान बचाने के लिए भी नहीं, क्योंकि धर्म हमेशा रहता है, सुख-दुख नहीं।

वे यह भी याद दिलाते हैं कि संसार में हज़ारों माता-पिता, बेटे और पत्नियाँ आते-जाते रहते हैं। खुशी और डर के मौके भी आते-जाते हैं। ये सब नासमझ को ही डिगाते हैं, समझदार को नहीं।

यतो धर्मस् ततो जयः।

जहाँ धर्म है, वहीं जीत है।

— महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text, पृष्ठ 6.2.14

ग्रंथों और ज्ञान-परंपरा में योगदान

ग्रंथ मेंवेदों का चार भागों में विभाजन, और चार शिष्यों के ज़रिए उनकी परंपरा को आगे बढ़ाना।

ग्रंथ मेंमहाभारत की रचना, जिसे ग्रंथ स्वयं "पाँचवाँ वेद" कहता है। व्यास ने वेदों के साथ महाभारत भी अपने शिष्यों को सिखाया।

ग्रंथ मेंपुराणों का ज्ञान सूत लोमहर्षण को सौंपना, जिनके छह शिष्यों ने आगे पुराण-संहिताएँ बनाईं।

ग्रंथ मेंव्यास ने महाभारत में स्वयं इसके विषय गिनाए हैं। इनमें वेदों का रहस्य, उपनिषद, पुराण और युगों का माप है। तीर्थ, नदियाँ, पर्वत, युद्ध-कला और अलग-अलग देशों के लोग भी हैं।

आधुनिक विद्वानों का मतमहाभारत के समीक्षित संस्करण के संपादक Sukthankar के अनुसार गणेश के लेखक बनने वाला प्रसंग बाद में जुड़ा है। परंपरा में यह कथा आज भी बहुत प्रिय है।

संबंधित ऋषि

आश्रम और स्थान

ग्रंथ मेंयमुना का द्वीप — जन्म-स्थान। सत्यवती ने यमुना के एक द्वीप पर व्यास को जन्म दिया।

ग्रंथ मेंमेरु पर्वत का शिखर — जहाँ उन्होंने पुत्र के लिए सौ वर्ष तप किया, और जहाँ शुकदेव का जन्म हुआ।

संबंधित गाथाएँ

ऋषियों का योगदान

संबंधित पर्व

स्रोत

महर्षि वेदव्यास — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न