कठोर तपस्वी जाजलि
यह कथा महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को सुनाते हैं। विषय है — धर्म का असली रूप।
जाजलि वन में रहने वाले ब्राह्मण थे। वे सुबह-शाम स्नान करते, अग्नि की सेवा करते, और वेद पढ़ते थे।
बरसात में वे खुले आकाश के नीचे सोते, शरद में जल में बैठते, और गर्मी में धूप और हवा सहते। फिर भी वे स्वयं को पुण्यवान नहीं मानते थे।
वर्षा और धूल से उनकी जटाएँ आपस में उलझ गई थीं। एक बार वे केवल वायु पीकर, बिना हिले, लकड़ी के खंभे की तरह वन में खड़े हो गए।
जटाओं में घोंसला
वे खंभे की तरह खड़े थे। तभी दो कुलिंग पक्षियों ने उनके सिर पर, जटाओं में, तिनकों से घोंसला बना लिया।
जाजलि को दया आई। उन्होंने घोंसला बनने दिया। दोनों पक्षी उनके सिर पर निश्चिंत होकर रहने लगे।
शरद आया, तो पक्षियों ने वहीं अंडे दिए। जाजलि यह जानते थे, फिर भी हिले नहीं। जिसमें किसी जीव को ज़रा भी चोट हो, ऐसा कोई काम उन्हें स्वीकार नहीं था।
अंडों की रक्षा के लिए वे उसी जगह, ध्यान में, बिना हिले खड़े रहे। अंडों से बच्चे निकले, और धीरे-धीरे उनके पंख उगे।
बच्चों की उड़ान
पंख उगे बच्चे शाम को उड़ते, और पास ही से लौट आते। जाजलि फिर भी नहीं हिले।
फिर वे सुबह जाते, और शाम को घोंसले में लौटते। फिर पाँच दिन बाहर रहकर छठे दिन लौटने लगे। जाजलि तब भी नहीं हिले।
अंत में वे एक महीने तक नहीं लौटे। तब जाजलि ने वह जगह छोड़ी।
घमंड, और आकाशवाणी
पक्षी चले गए, तो जाजलि को लगा कि उन्होंने तप में सिद्धि पा ली। उनके मन में घमंड आ गया।
नदी में स्नान करके, अग्नि में आहुति देकर, उन्होंने भुजाएँ ठोकीं, और आकाश में ज़ोर से कहा — "मैंने धर्म पा लिया!"
तभी आकाशवाणी हुई — "जाजलि, धर्म में तुम तुलाधार के बराबर नहीं हो। वे काशी में रहते हैं। वे भी ऐसी बात नहीं कहते, जैसी तुमने कही।"
जाजलि क्रोध से भर गए। मौन-व्रत रखकर, जहाँ शाम हो वहीं रात बिताते, वे तुलाधार को देखने निकल पड़े।
काशी का दुकानदार
बहुत समय बाद वे काशी पहुँचे। वहाँ तुलाधार दुकान पर तरह-तरह की चीज़ें बेच रहे थे।
तुलाधार ने उन्हें देखते ही उठकर आदर से प्रणाम किया — "मैं जानता हूँ, आप मेरे पास आए हैं।"
फिर उन्होंने जाजलि की पूरी कथा स्वयं सुना दी। समुद्र-तट का तप, सिर पर पक्षी, उनके उड़ने पर घमंड, और आकाशवाणी पर क्रोध। "बताइए, मैं क्या करूँ?"
जाजलि ने पूछा — "तुम रस, सुगंध, जड़ी-बूटियाँ बेचते हो। तुम्हें यह स्थिर बुद्धि कहाँ से मिली?"
"मेरा तराज़ू सबके लिए बराबर है"
तुलाधार बोले — "सनातन धर्म वही पुराना धर्म है, जिसे सब जानते हैं। सब जीवों से मैत्री, और सबका भला।"
"किसी जीव से द्रोह न करना, या ज़रूरत पड़ने पर कम से कम द्रोह करना — यही परम धर्म है। मैं इसी तरह जीता हूँ।"
"मेरा घर दूसरों के काटे लकड़ी-घास से बना है। मैं दूसरों से खरीदकर बेचता हूँ, बिना छल के। मदिरा मैं नहीं बेचता।"
"मैं किसी से माँगता नहीं, किसी से झगड़ता नहीं, किसी से द्वेष नहीं रखता। हे जाजलि, सब जीवों के लिए मेरा तराज़ू बराबर रहता है।"
"मैं दूसरों के कामों की न प्रशंसा करता हूँ, न निंदा। संसार की विविधता को वैसे देखता हूँ, जैसे आकाश की।"
"जिससे कोई न डरे, और जो किसी से न डरे, वह ब्रह्म को पाता है। जो मन, वाणी और कर्म से किसी का बुरा न करे, वह भी।"
हल, बैल और "अघ्न्या"
तुलाधार ने खेती पर भी प्रश्न उठाया — "लोहे के फाल वाला हल धरती और उसमें रहने वाले जीवों को घायल करता है। हल में जुते इन बैलों को देखो।"
"श्रुति गायों को 'अघ्न्या' कहती है, यानी जिन्हें मारा न जाए। फिर इन्हें कौन मार सकता है?"
जाजलि ने आपत्ति की — "तुम्हारा यह धर्म तो स्वर्ग का द्वार बंद करता है। यज्ञ पशु और अन्न से ही होते हैं।"
तुलाधार बोले — "मैं नास्तिक नहीं हूँ, यज्ञ की निंदा नहीं करता। पर सच्चा यज्ञ जानने वाले दुर्लभ हैं। फल की इच्छा के बिना, कर्तव्य मानकर किया यज्ञ ही श्रेष्ठ है।"
पक्षियों की गवाही, और श्रद्धा
अंत में तुलाधार बोले — "आकाश में ये पक्षी देखो। इनमें वे भी हैं, जिन्हें तुमने सिर पर पाला। तुम इनके पिता हो। अपने बच्चों को बुलाओ।"
जाजलि के बुलाने पर पक्षियों ने उत्तर दिया — "जो कर्म किसी जीव को चोट पहुँचाए बिना होते हैं, वही यहाँ और परलोक में काम आते हैं।"
"वाणी या मन की भूल को श्रद्धा बचा लेती है। पर श्रद्धा न हो, तो वाणी और मन कर्म को नहीं बचा सकते।"
"अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है, और श्रद्धा पाप से छुड़ाती है। श्रद्धावान पाप को ऐसे छोड़ देता है, जैसे साँप पुरानी केंचुली।"
"यह पुरुष श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है।" भगवद्गीता (17.3) में भी ठीक यही वाक्य आता है।
भीष्म ने कथा समेटी — कुछ समय बाद जाजलि और तुलाधार, दोनों अपने कर्मों से स्वर्ग गए। जाजलि ने शांति पाई।
| बात | जाजलि | तुलाधार | स्रोत |
|---|---|---|---|
| जीवन | वन और समुद्र-तट पर कठोर तप | काशी में दुकान, ईमानदार व्यापार | महाभारत (समीक्षित पाठ), 12.253.2, 45 |
| अहिंसा | पक्षियों के लिए हिले नहीं | किसी से द्रोह नहीं, तराज़ू सबके लिए बराबर | महाभारत (समीक्षित पाठ), 12.253.28; 12.254.6, 12 |
| भूल | तप के बाद घमंड — "मैंने धर्म पा लिया" | — | महाभारत (समीक्षित पाठ), 12.253.41 |
| मुख्य सीख | घमंड पुण्य को छोटा करता है | अहिंसा, समभाव और श्रद्धा | महाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCLXI–CCLXIV |
