क्या गृहस्थ भी मुक्त हो सकता है?
युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा — "क्या कोई गृहस्थ जीवन छोड़े बिना मोक्ष पा सका है?" उत्तर में भीष्म ने जनक और सुलभा का संवाद सुनाया।
मिथिला में जनक-वंश के धर्मध्वज नाम के राजा थे। वे वेद, मोक्ष-शास्त्र और राजधर्म, तीनों जानते थे। इंद्रियों को वश में रखकर राज करते थे।
उसी युग में सुलभा नाम की एक संन्यासिनी योग का अभ्यास करती हुई अकेली धरती पर घूमती थी।
राजसभा में परीक्षा
सुलभा ने कई संन्यासियों से सुना कि मिथिला के राजा मोक्ष-धर्म में लगे हैं। उसके मन में संदेह हुआ — "वे सचमुच मुक्त हैं या नहीं?"
योग-बल से उसने अपना रूप बदला, और सुंदर रूप धरकर पल भर में मिथिला पहुँची। फिर भिक्षुणी के वेश में राजा के सामने गई।
राजा ने उसका सत्कार किया — आसन, पैर धोने का जल, और भोजन। फिर मंत्रियों और विद्वानों के बीच सुलभा ने राजा से उनके मोक्ष के बारे में पूछा।
जाँचने के लिए सुलभा ने योग से अपनी बुद्धि राजा की बुद्धि में प्रवेश कराई। अपनी आँखों की किरणों से उसने राजा की दृष्टि को बाँध लिया।
जनक का दावा
जनक ने कहा — "मैं संन्यासी पञ्चशिख का प्रिय शिष्य हूँ। वे वर्षा के चार महीने मेरे घर रहे, और मुझे मोक्ष के उपाय सिखाए।"
"उन्होंने मुझसे राज्य छोड़ने को नहीं कहा। मैं राज करते हुए भी हर आसक्ति से मुक्त हूँ।"
"जो मेरे दाएँ हाथ पर चंदन लगाए, और जो बाएँ हाथ को घायल करे, मेरे लिए दोनों बराबर हैं। मिट्टी, पत्थर और सोना भी।"
"यदि ज्ञान से मोक्ष मिलता है, तो वह संन्यासी के त्रिदंड में ही क्यों, राजा के छत्र में क्यों नहीं?"
और फिर, राजा के आरोप
फिर जनक ने अपने उत्तर में सुलभा पर एक के बाद एक आरोप लगाए।
"तुम युवा और सुंदर हो, फिर भी संन्यासिनी? मेरी बुद्धि में प्रवेश करना तुम्हारे व्रत के विरुद्ध है।"
जनक ने उसे ब्राह्मणी मान लिया, और कहा — "तुम ब्राह्मणी हो, मैं क्षत्रिय। यह वर्णों का मेल है। तुम्हारा गोत्र भी मैं नहीं जानता।"
"तुम मुझे और इस सभा के विद्वानों को नीचा दिखाना चाहती हो। सच बताओ — तुम कौन हो, किसकी हो, कहाँ से आई हो, और किसके कहने पर?"
भीष्म कहते हैं कि राजा के ये शब्द अप्रिय और अनुचित थे। पर सुलभा ज़रा भी नहीं डगमगाई।
सुलभा का उत्तर: "तुम कौन हो" क्यों?
सुलभा ने पहले वाणी के गुण-दोष बताए। फिर पूछा — "जैसे अपने शरीर में अपनी आत्मा देखते हो, वैसे दूसरों में अपनी आत्मा क्यों नहीं देखते?"
"यदि तुम सचमुच 'यह मेरा, वह पराया' से मुक्त हो, तो ये प्रश्न क्यों? 'तुम कौन हो, किसकी हो, कहाँ से आई'।"
"यदि तुमने पञ्चशिख से पूरा मोक्ष-धर्म सुना है, तो छत्र और राजसी चीज़ों से फिर लगाव क्यों?"
"यदि तुम मुक्त हो, तो मैंने केवल बुद्धि से तुम्हारे भीतर आकर क्या बिगाड़ा? मैंने तुम्हें हाथ, पैर या शरीर के किसी अंग से नहीं छुआ।"
"और यह बात हम दोनों के बीच थी। इसे पूरी सभा में कहना क्या उचित था?"
"मैं तुम्हारे भीतर हूँ, पर तुम्हें छू नहीं रही, जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँद। तुम गृहस्थ-धर्म से हट गए हो, पर मोक्ष तक नहीं पहुँचे। बीच में खड़े हो।"
घड़ा, दूध और मक्खी
"मेरा शरीर तुम्हारे शरीर से अलग है, पर मेरी आत्मा तुम्हारी आत्मा से अलग नहीं।"
"हाथ में घड़ा है, घड़े में दूध, और दूध पर मक्खी। सब साथ हैं, फिर भी अलग हैं। घड़ा दूध नहीं बनता, न दूध मक्खी।"
"इसी तरह वर्ण और आश्रम किसी मुक्त व्यक्ति के साथ रहकर भी उससे नहीं चिपकते। तो मेरे-तुम्हारे मिलने से वर्णों का मेल कैसे होगा?"
"मैं कौन हूँ" — सुलभा का अपना परिचय
अंत में सुलभा ने बताया — "मैं वर्ण में तुमसे ऊँची नहीं, न वैश्य हूँ, न शूद्र। मैं तुम्हारे ही वर्ण की हूँ।"
"प्रधान नाम के एक राजर्षि थे, जिनका नाम तुमने अवश्य सुना होगा। मैं उन्हीं के कुल में जन्मी हूँ, और मेरा नाम सुलभा है।"
"मेरे पूर्वजों के यज्ञों में इन्द्र आते थे। ऐसे कुल में मेरे योग्य कोई पति नहीं मिला। तब मोक्ष-धर्म सीखकर मैं अकेली मुनि-व्रत में घूमती हूँ।"
"मैं संन्यास का दिखावा नहीं करती, पराया धन नहीं चाहती, धर्मों का मेल नहीं कराती। अपने व्रत पर दृढ़ हूँ, और बिना सोचे नहीं बोलती।"
"मैं जीतने के लिए नहीं आई थी। जो सचमुच मुक्त है, वह जीत-हार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ता।"
"जैसे संन्यासी किसी सूने घर में एक रात रुककर चला जाता है, वैसे ही आज रात मैं तुम्हारे भीतर रहूँगी। तुमने अतिथि-सत्कार किया है। कल सुबह चली जाऊँगी।"
तर्क और अर्थ से भरे ये वचन सुनकर राजा जनक कुछ भी उत्तर नहीं दे सके।
| जनक ने कहा | सुलभा ने उत्तर दिया | स्रोत |
|---|---|---|
| "मैं राज करते हुए भी मुक्त हूँ" | "तो छत्र से लगाव क्यों? तुम बीच में खड़े हो" | महाभारत (समीक्षित पाठ), 12.308.22, 163–164 |
| "तुम कौन हो, किसकी हो, कहाँ से आई?" | "मुक्त के लिए ये प्रश्न क्यों? मेरी-तुम्हारी आत्मा अलग नहीं" | महाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCXXI |
| "तुम ब्राह्मणी, मैं क्षत्रिय — वर्णों का मेल" | "घड़ा, दूध, मक्खी — साथ रहकर भी अलग; और मैं भी क्षत्रिय-कुल की हूँ" | महाभारत (समीक्षित पाठ), 12.308.178–182 |
| "सभा को नीचा दिखाना चाहती हो" | "मैं जीतने नहीं, पूछने आई थी" | महाभारत (Ganguli अनु.), शान्ति पर्व, Section CCCXXI |
