महर्षि मुद्गल

ऋग्वेद 10.102 के ऋषि; मौद्गल्य गोत्र

संक्षेप में

सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद 10.102 के ऋषि "मुद्गल भार्म्यश्व" हैं, जिन्होंने लकड़ी के मुद्गर (द्रुघण) और बैल के सहारे दौड़ जीती। गोत्र-प्रवर ग्रंथों में मुद्गल गण का प्रवर है — आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य — यानी वही "भार्म्यश्व" नाम। महाभारत में कुरुक्षेत्र के एक मुद्गल की कथा है, पर ग्रंथ दोनों को एक नहीं कहते।

मंत्रद्रष्टा ऋषिमहाभारत के ऋषि

ग्रंथों में

  • "प्र ते मुद्गलो भार्म्यश्वो द्रुघणेन वृषभेण चाजिं जिगायेति" — ऋग्वेद 10.102 के ऋषि मुद्गल भार्म्यश्व।
  • मुद्गल गण (गण 30) का प्रवर: आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य।
  • कुरुक्षेत्र में शिलोञ्छ-वृत्ति से जीने वाले सत्यवादी मुद्गल; दुर्वासा ने बार-बार उनका अन्न खाकर परीक्षा ली, पर उनका मन विचलित नहीं हुआ।
  • मत्स्य पुराण इस गण की सूची देता है; इसके प्रवर के एक नाम पर मत्स्य के अंग्रेज़ी अनुवाद और गोत्र-ग्रंथ की तालिका में अंतर है।

मुद्गल से जुड़े गोत्र-पृष्ठ

कुल और प्रवर

ऋषि से गोत्र — हर गोत्रकार के प्रवर वाले गण

संबंधित गाथाएँ

स्रोत

महर्षि मुद्गल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न