मौद्गल्य गोत्र

मौद्गल्य गोत्र आङ्गिरस-परंपरा का है। सूत्र इसका प्रवर आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य बताते हैं; मत्स्य पुराण के अनुवाद "मत्स्यदग्ध" पढ़ते हैं। जानिए सभी रूप, गण के 25 नाम और स्रोत।

संक्षेप में

मौद्गल्य (मुद्गल) गोत्र आङ्गिरस-परंपरा का गोत्र है। ग्रंथों में इसका अपना गण है — "मुद्गल", जिसमें 25 नाम दर्ज हैं। आश्वलायन, आपस्तम्ब और बौधायन इसका प्रवर बताते हैं — आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य। पर मत्स्य पुराण में इसके दो अलग रूप मिलते हैं, जो इस पृष्ठ पर दिए गए हैं।

मुख्य जानकारी

गोत्रमौद्गल्य (Maudgalya)
अन्य नाम / वर्तनीमुद्गल, मौद्गल, मौदगल्य, Mudgal, Moudgalya
ऋषि-कुलकेवल-आङ्गिरस
ऋषि-पृष्ठमहर्षि मुद्गल
गणगण 30 — मुद्गलाः
मुख्य प्रवरआङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण)
ग्रंथ-सूची मेंगण 30: "मुद्गलाः" (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन); गण 30: "मौद्गलः" (मत्स्य पुराण)

मौद्गल्य गोत्र — परिचय

ग्रंथ की तालिका में "मुद्गलाः" आश्वलायन, आपस्तम्ब और बौधायन — तीनों की सूची में है, और "मौद्गलः" मत्स्य पुराण की सूची में। आश्वलायन और आपस्तम्ब विकल्प में "तार्क्ष्य, भार्म्यश्व, मौद्गल्य" भी देते हैं।

मत्स्य पुराण (अध्याय 196) मुद्गल परिवारों के दो समूह बताता है, और दोनों का प्रवर अलग है।

मत्स्य पुराण के दो रूप

हंसजिह्व, देवजिह्व, अग्निजिह्व आदि परिवारों के लिए मत्स्य पुराण का प्रवर है — आङ्गिरस, ताण्डि, मौद्गल्य। सत्यमुग्रि, हिरण्यस्तम्ब आदि के लिए यह ग्रंथ "आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य" पढ़ता है, पर मत्स्य के अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों अनुवाद वहाँ "मत्स्यदग्ध" पढ़ते हैं।

यह पाण्डुलिपियों का अंतर है। हम कोई एक रूप सही नहीं ठहराते — परिवार में जो प्रवर चलता आया है, वही अपनाएँ।

प्रवर — गण 30 (मुद्गलाः)

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
आङ्गिरस · भार्म्यश्व · मौद्गल्य3आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
तार्क्ष्य · भार्म्यश्व · मौद्गल्य3आश्वलायन, आपस्तम्बविकल्प
आङ्गिरस · ताण्डि · मौद्गल्य3मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य
आङ्गिरस · मत्स्यदग्ध · मौद्गल्य3मत्स्य पुराणइस ग्रंथ का मुख्य

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Matsyadagdha, Mudgala · Angira, Tandya, Maudgalya”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।

इस गण में दर्ज नाम (25)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। नीचे की सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। मौद्गल्य गोत्र की पंक्तियाँ अलग रंग में है।

  1. 1अग्निजिह्वःम
  2. 2अपाग्नेयःम
  3. 3अश्वयुःम
  4. 4आयाग्नेयःम
  5. 5आलवालःम
  6. 6ऋश्यायणाःबो
  7. 7ऋषभाःबो
  8. 8जङ्घःबो
  9. 9तारणःबो
  10. 10तालिःम
  11. 11दीर्घजङ्घाःबो
  12. 12देवजिह्वःम
  13. 13परण्यःम
  14. 14पारण्यःम
  15. 15बिन्दुःबो
  16. 16मिताक्षाःबो
  17. 17मुद्गलाःआश्व, आप, बो
  18. 18मौद्गलःम
  19. 19विडादयःम
  20. 20विराडपःम
  21. 21सात्यमुग्रिःम
  22. 22सुग्रयःम
  23. 23हंसजिह्वःम
  24. 24हिरण्यस्तम्बिःम
  25. 25हिरिण्याक्षाःबो

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण.

गण 30 — मुद्गलाः का पूरा पृष्ठ

पूजा, संकल्प और विवाह में मौद्गल्य गोत्र

संस्काररत्नमाला (1899) के प्रयोगों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। मौद्गल्य गोत्र वाले परिवार में “अमुक गोत्र” की जगह मौद्गल्यआता है, और “अमुक प्रवर” की जगह परिवार का प्रवर — ग्रंथ की तालिका में इसका मुख्य रूप आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य है (आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण)।

ग्रंथ केवल यह ढाँचा देते हैं; प्रवर को वाक्य में जोड़ने का रूप शाखा और परंपरा से बदलता है, इसलिए पूरा संकल्प-वाक्य अपने कुल-पुरोहित से पक्का करें।

स्रोत

मौद्गल्य गोत्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न