गण 30 — मुद्गलाः
मुद्गलाः गण केवल-आङ्गिरस ऋषि-कुल का गण है। आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य। सूत्रों में इसके 3 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 25 नाम दर्ज किए हैं।
संक्षेप में
मुद्गलाः गण केवल-आङ्गिरस ऋषि-कुल का गण है। आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — आङ्गिरस, भार्म्यश्व, मौद्गल्य। सूत्रों में इसके 3 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 25 नाम दर्ज किए हैं।
प्रवर
| प्रवर | ऋषि | किस ग्रंथ के अनुसार | |
|---|---|---|---|
| आङ्गिरस · भार्म्यश्व · मौद्गल्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, मत्स्य पुराण | तालिका का मुख्य |
| तार्क्ष्य · भार्म्यश्व · मौद्गल्य | 3 | आश्वलायन, आपस्तम्ब | विकल्प |
| आङ्गिरस · ताण्डि · मौद्गल्य | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
| आङ्गिरस · मत्स्यदग्ध · मौद्गल्य | 3 | मत्स्य पुराण | इस ग्रंथ का मुख्य |
स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 196 — “Angira, Matsyadagdha, Mudgala · Angira, Tandya, Maudgalya”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।
मत्स्य पुराण के दो रूप हैं: हंसजिह्व आदि के लिए "आङ्गिरस, ताण्डि, मौद्गल्य" (ग्रंथ में छपाई अस्पष्ट, "ताव्य" जैसी; अनुवादों में ताण्डि/Tandya), और सत्यमुग्रि आदि के लिए — जहाँ यह ग्रंथ "भार्म्यश्व" पढ़ता है, पर मत्स्य के अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों अनुवाद "मत्स्यदग्ध" पढ़ते हैं.
इस गण के गोत्र-पृष्ठ
इस गण में दर्ज नाम (25)
गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। नाम के आगे लिखे संकेत बताते हैं कि वह नाम किस ग्रंथ की सूची में है।
- 1अग्निजिह्वःम
- 2अपाग्नेयःम
- 3अश्वयुःम
- 4आयाग्नेयःम
- 5आलवालःम
- 6ऋश्यायणाःबो
- 7ऋषभाःबो
- 8जङ्घःबो
- 9तारणःबो
- 10तालिःम
- 11दीर्घजङ्घाःबो
- 12देवजिह्वःम
- 13परण्यःम
- 14पारण्यःम
- 15बिन्दुःबो
- 16मिताक्षाःबो
- 17मुद्गलाःआश्व, आप, बो
- 18मौद्गलःम
- 19विडादयःम
- 20विराडपःम
- 21सात्यमुग्रिःम
- 22सुग्रयःम
- 23हंसजिह्वःम
- 24हिरण्यस्तम्बिःम
- 25हिरिण्याक्षाःबो
संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण.
केवल-आङ्गिरस-कुल के अन्य गण
स्रोत
पी. चेन्सल राव (सं.), गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (1900), "प्रवराः, गोत्रगणाश्च", पृष्ठ 241–242 (archive.org leaf 281–282)।
