पूजा, संकल्प और संस्कार में गोत्र

संकल्प में गोत्र कैसे बोलें, गोत्र पता न हो तो क्या करें, यज्ञ, उपनयन, विवाह, श्राद्ध और पिंडदान में गोत्र — संस्काररत्नमाला, धर्मसिन्धु, प्रवरमञ्जरी और गृह्यसूत्रों के मूल वाक्यों से, पृष्ठ-संख्या सहित।

संक्षेप में

ग्रंथों में अपना परिचय इस ढाँचे में दिया जाता है: “अमुकप्रवरान्वितामुकगोत्रोत्पन्नोऽमुकशर्माऽहम्” — पहले प्रवर, फिर गोत्र, फिर नाम। यह उपनयन के अभिवादन, यज्ञ के आचार्य-वरण और कन्यादान के संकल्प में आता है; श्राद्ध में पितरों का संबंध, गोत्र और नाम बोला जाता है। विवाह में यह शास्त्र-वचन है, पर कई पूजाओं में केवल परंपरा।

लेख (10)

हर संस्कृत वाक्य मूल ग्रंथ की पृष्ठ-छवि से पढ़ा गया है। किसी विशेष गोत्र का पूरा संकल्प-वाक्य हमने स्वयं नहीं बनाया — उसके लिए अपने कुल-पुरोहित से पूछें।

आगे पढ़ें