गोत्र और विवाह

सगोत्र विवाह, प्रवर का महत्व, विवाह के बाद स्त्री का गोत्र, गोत्र एक हो या पता न हो तो क्या करें, और पारंपरिक मान्यताएँ — प्रवरमञ्जरी, संस्काररत्नमाला, मनुस्मृति और कानून के मूल पाठ से, पृष्ठ-संख्या सहित।

संक्षेप में

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार वर और कन्या का न गोत्र एक हो, न प्रवर; बौधायन के अनुसार आठ गोत्रकार ऋषियों में से कोई एक दोनों के प्रवर में हो तो वे सगोत्र हैं। कन्यादान में दोनों के गोत्र-प्रवर इसी शंका को दूर करने के लिए बोले जाते हैं। कानून (1946 और 1955) सगोत्र विवाह को वैध मानता है — इन लेखों में शास्त्र, परंपरा और कानून अलग-अलग लिखे गए हैं।

लेख (7)

जाति और उपनाम से जुड़े प्रश्न (अलग जाति में एक गोत्र, एक उपनाम में अलग गोत्र) कुल और उपनाम वाले खंड में आएँगे।

आगे पढ़ें