गोत्र पता न हो तो विवाह में क्या करें?

गोत्र अज्ञात हो तो विवाह में ग्रंथ क्या कहते हैं: आचार्य या पुरोहित का प्रवर, उस गोत्र से विवाह-निषेध, सब वर्णों का "मानव" प्रवर विवाह में नहीं, और "काश्यपं गोत्रमुच्यते" विवाह पर लागू नहीं — प्रवरमञ्जरी और संस्काररत्नमाला से।

संक्षेप में

गोत्र पता न हो तो विवाह के लिए ग्रंथ आचार्य या पुरोहित का गोत्र-प्रवर अपनाने को कहते हैं, और तब उस आचार्य के गोत्र वालों से विवाह नहीं होता। संस्काररत्नमाला साफ़ कहती है कि "गोत्र न पता हो तो काश्यप" वाला वचन विवाह पर लागू नहीं, और सब वर्णों का "मानव" प्रवर भी विवाह में नहीं लिया जाता।

आचार्य का गोत्र — और उसका विवाह-नियम

असंप्रज्ञातबन्धूनामाचार्यप्रवरास्स्मृताः। पक्षे चास्मिन्विवाहोऽपि तद्गोत्रैस्सह नेष्यते॥

जिनके बन्धु अज्ञात हैं, उनके लिए आचार्य का प्रवर माना गया है; और इस पक्ष में उस (आचार्य के) गोत्र वालों से विवाह भी नहीं किया जाता।

— गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (The Principles of Pravara and Gotra), द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 129 (प्रवरमञ्जरी) (archive.org leaf 169)

प्रवरमञ्जरी (p. 128) के अनुसार जिसे अपने बन्धु (गोत्र-प्रवर) पता न हों, वह आचार्य का गोत्र बताए और आचार्य का प्रवर बोले; उदाहरण सत्यकाम जाबाल का है। अगले पृष्ठ का यह श्लोक विवाह का परिणाम बताता है: तब आचार्य के गोत्र वालों से विवाह नहीं होता, क्योंकि गोत्र-प्रवर एक हो गए।

संस्काररत्नमाला (p. 426) भी "अनाज्ञात-बन्धु" का सूत्र देती है: पुरोहित के प्रवर से, या आचार्य के प्रवर से।

"काश्यप" विवाह के लिए नहीं

यत्तु—"गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते" इति तत्पुरोहिताचार्ययोर्गोत्राज्ञाने सत्येव विवाहातिरिक्तविषयम्।

और जो कहा गया है — "गोत्र का ज्ञान न हो तो काश्यप गोत्र कहा जाता है" — वह तभी लागू है जब पुरोहित और आचार्य का गोत्र भी ज्ञात न हो, और विवाह को छोड़कर दूसरे कर्मों के लिए है।

— संस्काररत्नमाला (आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली 39, दो भाग), भाग 1, p. 427 (archive.org leaf n430)

धर्मसिन्धु यह वचन श्राद्ध के प्रसंग में देता है, और वहाँ यह ठीक है। पर संस्काररत्नमाला इसका क्षेत्र "विवाहातिरिक्त" — विवाह से बाहर — बताती है। इसलिए विवाह के सगोत्र-विचार में अज्ञात गोत्र को "कश्यप" मान लेना इस ग्रंथ के अनुसार ठीक नहीं।

सब वर्णों का "मानव" प्रवर भी विवाह में नहीं

संस्काररत्नमाला (pp. 426–427) ताण्डिन आचार्यों का सब वर्णों के लिए एक-ऋषि "मानव" प्रवर बताती है, पर साथ ही कहती है: "अयं च प्रवरः श्रौतकर्मप्रवरणाभिवादादिष्वेव न विवाहे" — यह केवल श्रौत कर्म और अभिवादन आदि में है, विवाह में नहीं; वरना सब समान-प्रवर हो जाएँगे और विवाह ही न हो सकेगा।

आचार्य का गोत्र भी पता न हो

संस्काररत्नमाला (p. 427) एक स्मृति-वचन देती है: जो द्विज आचार्य के गोत्र-प्रवर भी न जानता हो, वह स्वयं को किसी को दे दे (उसका दत्तक बने) और उसके गोत्र-प्रवर वाला हो जाए। दत्तक का गोत्र गोद लेने वाले का होता है — यह कन्यादान-प्रयोग (p. 552) में भी है।

व्यवहार में

  • पहले परिवार, कुल-पुरोहित, तीर्थ-पुरोहितों की बहियों से गोत्र खोजें (अलग guide देखें)।
  • न मिले तो कुल-पुरोहित या आचार्य का गोत्र-प्रवर — और तब उस गोत्र से विवाह नहीं।
  • विवाह के लिए "कश्यप" या "मानव" मान लेना इन ग्रंथों के अनुसार ठीक नहीं।
  • कानूनी रूप से विवाह गोत्र पर निर्भर नहीं (हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955)।

स्रोत

गोत्र पता न हो तो विवाह — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न