आचार्य का गोत्र — और उसका विवाह-नियम
असंप्रज्ञातबन्धूनामाचार्यप्रवरास्स्मृताः। पक्षे चास्मिन्विवाहोऽपि तद्गोत्रैस्सह नेष्यते॥जिनके बन्धु अज्ञात हैं, उनके लिए आचार्य का प्रवर माना गया है; और इस पक्ष में उस (आचार्य के) गोत्र वालों से विवाह भी नहीं किया जाता।
प्रवरमञ्जरी (p. 128) के अनुसार जिसे अपने बन्धु (गोत्र-प्रवर) पता न हों, वह आचार्य का गोत्र बताए और आचार्य का प्रवर बोले; उदाहरण सत्यकाम जाबाल का है। अगले पृष्ठ का यह श्लोक विवाह का परिणाम बताता है: तब आचार्य के गोत्र वालों से विवाह नहीं होता, क्योंकि गोत्र-प्रवर एक हो गए।
संस्काररत्नमाला (p. 426) भी "अनाज्ञात-बन्धु" का सूत्र देती है: पुरोहित के प्रवर से, या आचार्य के प्रवर से।
"काश्यप" विवाह के लिए नहीं
यत्तु—"गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते" इति तत्पुरोहिताचार्ययोर्गोत्राज्ञाने सत्येव विवाहातिरिक्तविषयम्।और जो कहा गया है — "गोत्र का ज्ञान न हो तो काश्यप गोत्र कहा जाता है" — वह तभी लागू है जब पुरोहित और आचार्य का गोत्र भी ज्ञात न हो, और विवाह को छोड़कर दूसरे कर्मों के लिए है।
धर्मसिन्धु यह वचन श्राद्ध के प्रसंग में देता है, और वहाँ यह ठीक है। पर संस्काररत्नमाला इसका क्षेत्र "विवाहातिरिक्त" — विवाह से बाहर — बताती है। इसलिए विवाह के सगोत्र-विचार में अज्ञात गोत्र को "कश्यप" मान लेना इस ग्रंथ के अनुसार ठीक नहीं।
आचार्य का गोत्र भी पता न हो
संस्काररत्नमाला (p. 427) एक स्मृति-वचन देती है: जो द्विज आचार्य के गोत्र-प्रवर भी न जानता हो, वह स्वयं को किसी को दे दे (उसका दत्तक बने) और उसके गोत्र-प्रवर वाला हो जाए। दत्तक का गोत्र गोद लेने वाले का होता है — यह कन्यादान-प्रयोग (p. 552) में भी है।
व्यवहार में
- पहले परिवार, कुल-पुरोहित, तीर्थ-पुरोहितों की बहियों से गोत्र खोजें (अलग guide देखें)।
- न मिले तो कुल-पुरोहित या आचार्य का गोत्र-प्रवर — और तब उस गोत्र से विवाह नहीं।
- विवाह के लिए "कश्यप" या "मानव" मान लेना इन ग्रंथों के अनुसार ठीक नहीं।
- कानूनी रूप से विवाह गोत्र पर निर्भर नहीं (हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955)।
