गोत्र क्या है
विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः। अत्रिर्वसिष्ठः कश्यप इत्येते सप्त ऋषयः। सप्तानामृषीणामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तद्गोत्रमित्याचक्षते॥ … अत एव पाणिनिः "अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्" इत्याह।बौधायन: विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप — ये सात ऋषि हैं; इन सात और आठवें अगस्त्य की जो संतान है, उसे गोत्र कहते हैं। … इसीलिए पाणिनि ने कहा — "पौत्र से आगे की संतान गोत्र है"।
संस्काररत्नमाला गोत्र का लक्षण बौधायन से देती है, और साथ में पाणिनि का सूत्र: "अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्" — यानी ऋषि का केवल पुत्र नहीं, पौत्र और आगे की पूरी संतान गोत्र है। वह यह भी लिखती है कि विज्ञानेश्वर, माधव और मदनपारिजात जैसे निबन्धों में "गोत्र वंश-परंपरा से प्रसिद्ध" बताया गया है — यानी गोत्र परिवार की परंपरा से जाना जाता है।
विवाह में महत्व: क्या वर्जित है
यस्या वध्वा येन वरेण सह प्रवरैक्यं गोत्रैक्यं वा नास्ति सा वधूस्तेन सह विवाहमर्हति। क्वचिद्गोत्रभेदेऽपि प्रवरैक्यमस्ति… क्वचित्प्रवरभेदेऽपि गोत्रैक्यम्।जिस वधू का जिस वर के साथ न प्रवर एक हो, न गोत्र — वही उससे विवाह के योग्य है। कहीं गोत्र अलग होने पर भी प्रवर एक होता है… और कहीं प्रवर अलग होने पर भी गोत्र एक।
नियम दोहरा है: न गोत्र एक हो, न प्रवर। संस्काररत्नमाला इसके उदाहरण भी देती है — वाधूल, मौन, मौक जैसे अलग गोत्रों का प्रवर एक ("भार्गव, वैतहव्य, सावेदस") है, इसलिए वे आपस में विवाह नहीं करते; और यौवनाश्व गोत्र दो अलग प्रवरों में भी एक ही गोत्र है।
बौधायन का नियम इसे और साफ़ करता है: आठ गोत्रकार ऋषियों में से कोई एक दोनों के प्रवर में हो, तो दोनों सगोत्र हैं — भृगु और आङ्गिरस के गणों को छोड़कर।
कन्यादान में गोत्र क्यों बोला जाता है
विवाह आर्षगोत्रोच्चारणं तु वाचनिकं, तच्च सप्रवरत्वसगोत्रत्वशङ्कानिवारणार्थमदृष्टार्थं च भवति।विवाह में आर्षेय (प्रवर) और गोत्र बोलना शास्त्र-वचन से है; यह समान प्रवर या समान गोत्र की शंका दूर करने के लिए, और अदृष्ट फल के लिए है।
यानी विवाह के मंच पर ही, सबके सामने, वर और कन्या दोनों के प्रवर और गोत्र बोले जाते हैं। संस्काररत्नमाला (p. 551) के कन्यादान-वाक्य में दोनों पक्षों के प्रवर, गोत्र और तीन पीढ़ियों के नाम आते हैं।
शास्त्र, परंपरा और कानून
तीनों अलग बातें हैं, और यह लेख उन्हें मिलाता नहीं। विवाह के कानूनी नियमों (सपिण्ड, निषिद्ध संबंध) पर "सगोत्र विवाह और सपिण्ड" लेख में विस्तार है।
| स्तर | क्या कहता है | स्रोत |
|---|---|---|
| शास्त्र | सगोत्र और सप्रवर विवाह वर्जित; अपवाद भृगु-आङ्गिरस के कुछ गण | बौधायन; प्रवरमञ्जरी pp. 3–4, 26; मनु III.5 |
| परंपरा | कन्यादान में दोनों के गोत्र-प्रवर का उच्चारण; परिवार और क्षेत्र की अपनी रीतियाँ | संस्काररत्नमाला pp. 416, 551 |
| कानून | समान गोत्र या प्रवर से विवाह अवैध नहीं | Act XXVIII of 1946; हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 |
