क्रम से
- दोनों परिवारों से गोत्र के साथ पूरा प्रवर (ऋषियों के नाम) लिखवाएँ।
- देखें कि गोत्र-नाम ग्रंथ में एक ही गण में है या दो में — गालव, मार्कण्डेय जैसे नाम दो-दो गणों में हैं।
- प्रवर मिलाएँ: आठ गोत्रकारों में से कोई ऋषि दोनों में है? है तो सगोत्र (बौधायन)।
- भृगु या आङ्गिरस कुल हो तो कुल-दर-कुल नियम देखें (प्रवरमञ्जरी pp. 3–4)।
- क्षत्रिय परिवार हो तो देखें कि गोत्र पुरोहित का है या अपना (प्रवरमञ्जरी p. 4)।
- अंतिम पुष्टि कुल-पुरोहित से।
नाम एक, गण अलग — क्या होता है
इस साइट के आधार-ग्रंथ की तालिका में कई गोत्र-नाम दो गणों में दर्ज हैं: गालव विश्वामित्र-कुल के औदल गण में भी है और भृगु-कुल के वत्स गण में भी; मार्कण्डेय भृगु-कुल के वत्स गण में भी और आङ्गिरस के काण्व गण में भी। ऐसे में दोनों परिवारों का प्रवर अलग निकल सकता है।
उलटा भी होता है: संस्काररत्नमाला (p. 415) के अनुसार वाधूल, मौन, मौक जैसे अलग गोत्रों का प्रवर एक है। इसलिए "गोत्र एक है या नहीं" का उत्तर प्रवर से मिलता है।
क्षत्रिय परिवारों के लिए
क्षत्रियाणामात्मीयप्रवरः पुरोहितप्रवरश्चोपदिष्टः। पुरोहितगोत्रैः पुरोहितप्रवरैश्च सह क्षत्रियाणामविवाहो नोपदिष्टः, प्राप्त्यभावात्॥क्षत्रियों के लिए उनका अपना प्रवर, और पुरोहित का प्रवर — दोनों बताए गए हैं। पुरोहित के गोत्र-प्रवर वालों से क्षत्रियों का विवाह-निषेध नहीं बताया गया, क्योंकि वह नियम उन पर लागू ही नहीं होता।
यानी जिन परिवारों का गोत्र-प्रवर पुरोहित का है, उनके लिए प्रवरमञ्जरी पुरोहित-गोत्र से विवाह का निषेध नहीं बताती। यह ग्रंथ का मत है; अपनी परंपरा कुल-पुरोहित से पूछें।
अगर विवाह अनजाने में हो चुका हो
प्रवरमञ्जरी के आरंभिक श्लोक (4–5) अनजाने में हुए सगोत्र विवाह के लिए चान्द्रायण व्रत का प्रायश्चित्त बताते हैं, और कहते हैं कि ऐसी संतान दोषी नहीं — उसे काश्यप गोत्र का कहा गया है। इन श्लोकों पर "सगोत्र विवाह से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएँ" लेख में विस्तार है।
कानून
Hindu Marriage Disabilities Removal Act, 1946 (Act XXVIII of 1946) ने कहा कि हिन्दुओं में समान गोत्र या प्रवर होने से विवाह अवैध नहीं होगा। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में भी सगोत्र विवाह पर रोक नहीं; रोक सपिण्ड और निषिद्ध संबंधों पर है। यानी सगोत्र विवाह कानूनन वैध है — शास्त्र का निषेध धार्मिक है, कानूनी नहीं।
