प्रवरमञ्जरी, श्लोक 4
कन्यामूढ्वा स्वगोत्रप्रवरपुरुषजां मातृवद्दोषदण्डप्रायश्चित्तादिभाक्स्यात्… अज्ञात्वोढ्वोपगम्य प्रतिगमनमर्हत्यैन्दवं सा च भार्या। गर्भश्चेत्स्याददुष्टस्स मुनिभिरुदितः काश्यपो गोत्रविद्भिः॥अपने गोत्र-प्रवर के पुरुष से जन्मी कन्या से विवाह करने वाला माता-गमन जैसे दोष, दण्ड और प्रायश्चित्त का भागी होता है… जो अनजाने में विवाह कर ले, वह चान्द्रायण (ऐन्दव) व्रत करे; और यदि गर्भ हो, तो वह (संतान) दोषी नहीं — गोत्र जानने वाले मुनियों ने उसे काश्यप कहा है।
यह श्लोक पूरा उद्धृत करने पर उसमें ऐसी संतान के लिए एक बहुत कठोर जाति-सूचक शब्द भी है, जो जानकर किए गए विवाह के प्रसंग में है। हमने वह अंश यहाँ नहीं दोहराया; मूल पृष्ठ स्रोत-सूची में है। श्लोक का अगला हिस्सा अनजाने में हुई भूल के बारे में है, और उसमें संतान को "अदुष्ट" (निर्दोष) कहा गया है।
प्रवरमञ्जरी, श्लोक 5
कृत्वा चान्द्रायणानि प्रतिहतदुरितो मातृवत्पुत्रवच्चाप्यन्योन्यं मन्यमानौ सह परिचरतां दम्पती यावदायुः। अज्ञात्वाऽन्यस्वगोत्रप्रवरमुनिगणान्प्रत्यवाये पतन्तः स्युर्ज्ञात्वाऽन्यस्वगोत्रप्रवरमुनिगणान्ब्रह्मलोके वसन्ति॥चान्द्रायण व्रत करके, पाप से मुक्त होकर, वे दम्पती एक-दूसरे को माता और पुत्र की तरह मानते हुए जीवन-भर साथ रहें। जो अपने और दूसरे के गोत्र-प्रवर-ऋषियों को न जानकर (विवाह करते हैं) वे दोष में गिरते हैं; जो उन्हें जानकर (विवाह करते हैं) वे ब्रह्मलोक में बसते हैं।
यानी प्रायश्चित्त के बाद भी ग्रंथ उस विवाह को सामान्य दाम्पत्य नहीं मानता — पति-पत्नी साथ रहें, पर माता-पुत्र की तरह। और श्लोक का अंत उलटी दिशा से कहता है: गोत्र-प्रवर जानकर विवाह करने वाले ब्रह्मलोक पाते हैं।
मनुस्मृति
मनुस्मृति (III.5) के अनुसार विवाह के योग्य कन्या वह है जो पिता की ओर उसी गोत्र (कुल) की न हो, और माता की ओर सपिण्ड न हो। मनु यहाँ कारण नहीं देते, केवल नियम।
जो मान्यताएँ इन ग्रंथों में नहीं मिलीं
- "सगोत्र विवाह से संतान में रोग होते हैं" — कोई genetics या "वैज्ञानिक" कारण इन ग्रंथों में नहीं है। उनका कारण धार्मिक है।
- "माता का गोत्र भी टालना चाहिए" — मनु माता की ओर केवल सपिण्ड टालने को कहते हैं। पर संस्काररत्नमाला (p. 451) का स्मृति-वचन माता के गोत्र की कन्या को भी वर्जित करता है; ग्रंथकार इसे ब्राह्म आदि विवाहों में केवल माध्यन्दिन शाखा वालों पर लागू मानते हैं, और कुछ आचार्य सब पर। Russell (1916) ने भी अपने समय में माता और नाना के गोत्र से बचने का नियम दर्ज किया। यानी यह मान्यता शास्त्र में है — पर हर परिवार पर एक-सी लागू नहीं।
- "गोत्र न पता हो तो कश्यप मानकर विवाह" — संस्काररत्नमाला (p. 427) के अनुसार कश्यप-वचन विवाह पर लागू नहीं।
आज
शास्त्र की मान्यता और कानून अलग हैं: 1946 का Act XXVIII और हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 सगोत्र विवाह को वैध मानते हैं। जो परिवार शास्त्र की परंपरा मानते हैं, उनके लिए यह लेख बताता है कि मूल ग्रंथ वास्तव में क्या कहते हैं — न उससे कम, न उससे ज़्यादा।
